पाकिस्तान में हिंदुओं के अधिकतर मंदिर खंडहर में हो चुके तब्दील

    दिनांक 11-फ़रवरी-2021
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मीम अलिफ हाशमी
पाकिस्तान में हिंदू समाज के साथ उनकी संस्कृति को मिटाने की भी साजिश चल रही है। यह किसी का आरोप नहीं, बल्कि सचाई है और इस सचाई से पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट भी सहमत है।
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अब इस अवस्था में है लाहौर का शीतला माता मंदिर।

पाकिस्तान में हिंदू समाज के साथ उनकी संस्कृति को मिटाने की भी साजिश चल रही है। यह किसी का आरोप नहीं, बल्कि सचाई है और इस सचाई से पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट भी सहमत है। सुप्रीम कोर्ट की पहल पर एक सदस्यीय आयोग गठित कर यह पता लगाने का प्रयास किया गया था कि देश में हिंदू धर्मस्थलों की क्या स्थिति है ? मगर इसके परिणाम पाकिस्तान को शर्मसार करने वाले हैं।

आयोग की रिपोर्ट कहती है कि गिनती के कुछ मंदिरों को छोड़ दें तो लगभग सभी खंडहर में तब्दील हो चुके हैं। यह तब है, जब कि इमरान खान की पार्टी पीटीआई अल्पसंख्यकों के कल्याण और उत्थान के दावे  की सीढ़ियां चढ़कर सत्ता में आई है।

1_1  H x W: 0 xरावलपिंडी में राजा बाजार स्थित मंदिर, जिसके अधिकांश हिस्सों पर अवैध कब्जे हो गए हैं।
पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के धर्मस्थलों के रख-रखाव की जिम्मेदारी इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ईटीपीबी) के पास है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित आयोग की रिपोर्ट आने के बाद सत्तारूढ़ दल के कुछ लोग झेंप मिटाने के लिए इस कोशिश में हैं कि मंदिरों की बदहाली का ठीकरा ईटीपीबी के अधिकारियों के सिर फोड़ दिया जाए, जबकि हकीकत इसके विपरीत है। पाकिस्तान की सत्ता की बागडोर चाहें किसी भी पार्टी के हाथ हो, सबका रवैया अल्पसंख्यक विरोधी ही रहा है।

पाकिस्तान के सिंध प्रांत में सर्वाधिक हिंदू रहते हैं और इस प्रदेश में सत्ता इमरान खान की विरोधी पार्टी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के पास है। मगर अल्पसंख्यकों को सर्वाधिक निशाना सिंध में ही बनाया जा रहा है। वहां से आए दिन हिंदू लड़कियों के अपहरण, कन्वर्जन और जबरन निकाह की शिकायतें आती रहती हैं। बलूचिस्तान में हाल ही में एक मंदिर को आग के हवाले कर ध्वस्त कर दिया था।

वैसे, हिंदू और हिंदू मंदिरों की बदहाली केवल सिंध में नहीं, पाकिस्तान के तकरीबन सभी हिस्से में है। पाकिस्तान के चर्चित अखबार डॉन के मुताबिक, हिंदू मंदिरों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश की गई रिपोर्ट निराशाजनक तस्वीर प्रस्तुत करती है। आयोग के अध्यक्ष डॉ. शोहेब सुदाब कहते हैं कि चकवाल स्थित कटास राज मंदिर, मुल्तान स्थित प्रह्लाद मंदिर तथा हिंगलाज मंदिर (लसबेला) की हालत कुछ बेहतर है। बाकी लगभग सभी खंडहर में तब्दील हो चुके हैं।
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मीरपुर में अली बेग स्थित गुरुद्वारा, जो अब बिल्कुल जर्जर हो गया है।

1400 मंदिरों का रास्ता बंद किया
सिंध प्रांत के चर्चित कवि शाह अब्दुल लतीफ भित्तिई सूबे के लाकी शहर से किर्धर पर्वत तक 60 किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैली पर्वतमाला और प्राकृतिक झील के इर्दगिर्द फैले शिवालयोंं की निशानियां मिटने पर, अपनी पीड़ा व्यक्त कर चुके हैं। फ्रांसीसी शोधकर्ता मिशेल बोइविन अपनी पुस्तक ‘सिंध हिस्ट्री एवं रिप्रेजेंटेशंस’ में लाकी के बारे में लिखा है कि पाकिस्तान के सिंध प्रांत का पूरा क्षेत्र कभी शिवमय हुआ करता था। बलूचिस्तान के हिंगलाज माता मंदिर तक तीर्थयात्रा करने वाले इधर से गुजरते समय इस इलाके में अपना काफी समय ध्यान, साधना और पूजा-पाठ में बिताते थे। पहाड़ों की गुफाओं में शिवभक्त साधु-संत का डेरा हुआ करता था। चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रावृतांत के अनुसार, सातवीं शताब्दी में लाकी में 273 मंदिर थे, जिनमें से 235 केवल पशुपति और शिव जी के थे। 19 वीं शताब्दी में इसे दुनिया के नक्शे पर लाने वाले ब्रिटिश विद्वान और यात्री रिचर्ड बर्टन की मानें तो पूरे विश्व में लाकी इकलौता स्थान था, जहां इतनी बड़ी संख्या में शिवालय हुआ करते थे। मगर यह सब इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह गया है। अब तक की पाक सरकारों की गलत नीतियों और बहुसंख्यकों के कुदृष्टिकोण के कारण लाकी के अधिकतर शिवालय एवं गुफाएं अवशेष में बदल चुके हैं। यहां तक पहुंचने का इकलौता रास्ता भी जर्जर और खतरनाक है। थोड़ी सी असावधानी किसी को मौत के मुंह में पहुंचा सकती है।
 
पाकिस्तान के ऐतिहासिक मंदिरों पर शोध करने वाली पत्रकार रीमा अब्बासी की मानें तो मंदिरोंं को देश की धरोहर न मानकर इसे संक्रीणता से देखने के चलते इनके बचे-कुचे अवशेष भी मिटने के कगार पर हैं। पाकिस्तान के संवदेनशील प्रांतों खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में अब गिनती के मंदिर और धर्मस्थल बचे हैं। लाहौर में केवल दो मंदिर हैं, जिनमें से एक का कपाट बंद रहता है। रीमा अब्बासी के शोध से खुलासा हुआ कि लाहौर में पिछले कुछ वर्षों में एक हजार मंदिर नेस्त-नाबूद किए गए हैं।
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लाहौर स्थित प्राचीन जैन मंदिर, जिसे अयोध्या आंदोलन के समय ढहा दिया गया था। यह आज भी उसी हालत में है।
 
पाकिस्तान में कई मंदिरों का रास्ता ही बंद कर दिया गया है। यानी मंदिर में कोई जाना भी चाहे तो नहीं जा सकता। पाकिस्तान सरकार की अदूरदर्शिता के कारण यह नौबत आई है। भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद भारत जाने वाले हिदुआें की संपत्ति दस हजार रुपए की कीमत में देने की योजना 1961 में लागू किए जाने पर हिदुआेंं के धर्मस्थलों को तो इससे अलग रखा गया। मगर योजना में त्रुटि के चलते इसके आसपास की  हिंदुओं की तमाम संपत्तियां दस-दस हजार रुपए में आवंटित कर दी गर्इं। इसके बाद हिदुआेंं के धर्मस्थलोंं के करीब मकान, गोदाम बना दिए गए और वहां जाने का रास्ता तक नहीं छोड़ा गया। रास्ता बंद कर देने से रावलपिंडी के पुराना बाजार स्थित 1929 में निर्मित यमुना देवी मंदिर में श्रद्धालु अनाज की बोरियों पर चढ़कर मंदिर के छत से अंदर जाते हैं। बीबीसी उर्दू की पत्रकार रहीं नुखबत मलिक के मुताबिक, सबसे पहले ऐसा  एक मामला 2015 में तब प्रकाश में आया जब खैबर पख्तूनख्वा के कर्क जिले के गांव टेरी स्थित हिंदुओं के परमश्रद्धेय परम हंस महाराज की समाधि के चारों ओर मकान बनाकर वहां पहुुंचने का रास्ता अवरुद्ध कर दिया गया। समाधि में एक कृष्ण मंदिर था। उसे तोड़ कर वहां बिल्डिंग खड़ी कर दी गई। समाधि के ईदगिर्द मकान बनाने वालों में एक मुफ्ती इफ्तिखारुद्दीन का  कहना है कि पाक सरकार के 1961 की योजना के तहत जमीन खरीदकर उसने यहां 1998 में मकान बनाया है। 1929 में परमहंस के स्वर्गवास के बाद तकरीबन प्रत्येक वर्ष देश-दुनिया के हिंदू उनकी समाधि के दर्शन करने आया करते थे। मगर रास्ता बंद होने से उनका यहां आना कम हो गया।

    पाकिस्तान हिंदू परिषद के अध्यक्ष एवं नेशनल असेंबली के सदस्य रहे डॉक्टर रमेश ने इस मसले को सुप्रीम कोर्ट और तमाम बड़े नेताओं के दरबार में उठाया, पर कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई। पाकिस्तान हिंदू काउंसिल का दावा है कि देश में ऐसे 1400 मंदिर और धर्मस्थल हैं, जहां तक पहुंचना अब संभव नहीं। इनके रास्ते बंद कर वहां गोदाम या पशु बाड़ा बना दिया गया है। पाकिस्तान के अखबार ‘डेली टाइम्स’ की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि कराची के मनोरा स्थित एक हजार साल पुराने प्रसिद्ध वरुण मंदिर के एक हिस्से को शौचालय में बदल दिया गया है। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप मेंं यह इकलौता और अतिप्राचीन मंदिर है। मगर इसकी दशा अब बेहद खराब है। पहले यहां प्रत्येक वर्ष लाल साईं वरुणदेव उत्सव मनाया जाता था। कई वर्षों से यह भी बंद है। पंजाब के चकवाल शहर से 30 किलोमीटर दूर कटासराज गांव के प्रसिद्ध शिव मंदिर के साथ भी यही कुछ हुआ। इसके इर्द-गिर्द के सारे भूखंड पर सीमेंट फैक्ट्रियों ने कब्जा कर लिया। साथ ही मंदिर की प्राकृति झील से पानी निकाल कर फैक्ट्रियों में इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके कारण झील सूखने के कगार पर है। हिंदुओं की ओर से इसके खिलाफ पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट में अपील करने पर इस वर्ष मई में झील के पानी के दोहन पर रोक लगाकर सीमेंट फैक्ट्रियों के लिए पंजाब सरकार को  वैकल्पिक व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए थे। मगर कोर्ट के आदेश का अनुपालन नहीं हुआ। कोर्ट की ओर से 10 जुलाई को इसको लेकर फिर सख्त निर्देश दिए हैं। बावजूद इसके स्थिति याथवत बनी हुई है। पाकिस्तान वक्फ बोर्ड के पुजारी रहे जयराम कहते हैं कि 1971 में सरकार ने ऐसी नीतियां अपनाईं कि देश से हिंदू संस्कृति ही मिट गई। अब यहां न शास्त्र बढ़ाये जाते हैं और न ही यहां कोई संस्कृत पढ़ाने वाला बचा है। वर्षों पूर्व सिंध प्रांत के स्कूलों में हिंदी टीचर नियुक्त करने की मांग उठाई गई थी, जिसपर आज तक अमल नहीं हुआ है।

नेपाल से सीख ले पाकिस्तान
पाकिस्तान की पत्रकार रीमा अब्बासी ने अपने लंबे शोध-अध्ययन पर आधारित एक पुस्तक लिखी है ‘पाकिस्तान के ऐतिहासिक मंदिर।’ अंग्रेजी में लिखी गई 296 पृष्ठों की इस पुस्तक में चार सौ से अधिक मंदिरों के चित्र हैं। पाक के मंदिरों के बारे में किसी पाकिस्तानी लेखक द्वारा लिखी गई यह पहली पुस्तक है। इस बारे में लेखिका कहना है कि इस पर शोध करने के दौरान उन्हें लंबी यात्राएं करनी पड़तीं और कई जगह कटरपंथियों के विरोध का सामना करना पड़ा। अफगानिस्तान से सटे इलाकों में तथ्य इकत्रित करने में उन्हें सर्वाधिक दुश्वारियां पेश आईं। रीमा अब्बासी अपनी पुस्तक में आलोचनात्मक अंदाज में एक जगह लिखती हैं कि पाकिस्तान सरकार की अनदेखी और बहुसंख्यकों के गलत आचरण के चलते मंदिरों एवं धर्मस्थलों को नुकसान पहुंचा है। हिंदू बहुल सिंध को छोड़कर खैबर पख्तूनख्वाह और बलूचिस्तान में इनके नाम-ओ-निशान मिटा दिए गए हैं। लेखिका का सुझाव है कि मंदिरों को देश की प्राचीन धरोहर मानकर इसकी देखभाल करनी चाहिए। उनके कहने का तात्पर्य यह है कि नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर की तरह पाकिस्तान भी अपने देश के प्राचीन मंदिरों को सुसज्जित पर्यटनस्थल के रूप में विकसित करे, ताकि यह सरकार को तंगहाली के दलदल से बाहर निकालने में मददगार साबित हों।
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कराची के मनोरा में एक हजार साल पुराने प्रसिद्ध श्री वरुणदेव मंदिर के एक हिस्से को शौचालय में बदल दिया गया है

पाकिस्तान के 10 ऐतिहासिक मंदिर
तमाम दुश्वारियों के बावजूद पाकिस्तान में अभी भी कई ऐतिहासिक मंदिर शेष है। सिंधु नदी का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान में बहता है। यकीनन सिंधु के बगैर हिन्द की संस्कृति अधूरी मानी जाती है। पाकिस्तान में हड़प्पा और मोहनजोदाड़ो के प्राचीन नगर के अवशेष भी हैं। बंटवारे के बाद पाकिस्तान में भारी संख्या में मंदिर ध्वस्त कर दिए गए थे। बड़ी तादाद में प्राचीन मंदिरों को अयोध्या आंदोलन के दौरान भी नुकसान पहुंचाया गया। इसके बावजूद आज भी वहां कई ऐतिहासिक एवं प्राचीन मंदिर मौजूद हैं। अलग बात है कि उनमें से अधिकांश उपेक्षा का शिकार होने के कारण जर्जर हो चुके हैं। आइए रू-ब-रू कराते हैं पाकिस्तान के ऐसे ही दस चर्चित मंदिरों से-

हिंगलाज का शक्तिपीठ
सिन्ध की राजधानी कराची जिले के बाड़ीकलां में माता का मंदिर सुरम्य पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है। ये पहाड़ियां पाकिस्तान द्वारा जबरन कब्जाए गए बलूचिस्तान में हिंगोल नदी के समीप हिंगलाज क्षेत्र में स्थित हैं। यहां का मंदिर प्रधान 51 शक्तिपीठों में एक है। यहां माता का सिर गिरा था।

कटासराज का शिव मंदिर
 पंजाब प्रांत के जिला चकवाल शहर के दक्षिण में कोहिस्तान नमक पर्वत श्रृंखला में महाभारतकालीन कटासराज नाम का एक गांव है। इस गांव में एक विशाल परिसर है जिसमें राम, हनुमान और शिव मंदिर स्थित है। मान्यता के अनुसार जब सती के वियोग में भगवान शंकर रोए। उन्हीं आंसुओं से दो तालाब बन गए, जिनमें एक राजस्थान के पुष्कर में और दूसरा यहां कटासराज में।

नृसिंह मंदिर
भक्त प्रह्लाद ने भगवान नृसिंह के सम्मान में एक मंदिर बनवाया था, जो वर्तमान में पाकिस्तान स्थित पंजाब के मुल्तान शहर में है। इसे प्राचीनकाल में श्रीहरि के भक्त प्रह्लाद का मंदिर के रूप में जाना जाता था। इस मंदिर का नाम प्रह्लादपुरी मंदिर है। मुल्तान के विश्वप्रसिद्ध किले के अंदर बना यह मंदिर किसी जमाने में मुल्तान शहर की पहचान हुआ करता था।

पंचमुखी हनुमान मंदिर
कराची के इस 1500 साल पुराने पंचमुखी हनुमान मंदिर में आज भी लोग जाते हैं। नागरपारकर के इस्लामकोट में पाकिस्तान का यह इकलौता ऐतिहासिक राम मंदिर है। एक और पंचमुखी हनुमान मंदिर कराची के शॉल्जर बाजार में बना है। यहां के पंचमुखी हनुमान की मूर्ति अद्भुत है।

गोरखनाथ मंदिर
पाकिस्तान के पेशावर में गोरखनाथ मंदिर है। यह मंदिर 160 साल पुराना है। मंदिर बंटवारे के बाद से बंद पड़ा था, लेकिन पेशावार हाईकोर्ट के आदेश पर नवंबर 2011 में इसे दोबारा खोला गया।

गौरी मंदिर
यह सिन्ध प्रांत के थारपारकर जिले में है। पाकिस्तान के इस जिले में अधिकतर आदिवासी हैं जिन्हें थारी हिन्दू कहा जाता है। मध्यकाल में बने इस मंदिर में हिन्दू और जैन मत के अनेक देवी-देवताओं और महापुरुषों की मूर्तियां रखी हुई हैं।
 
मरी इंडस मंदिर
पंजाब के कालाबाग में स्थित यह मंदिर मरी नामक जगह पर है, जो कभी गांधार प्रदेश का हिस्सा था। चीनी यात्री ह्वेनसांग की पुस्तक में भी मरी का जिक्र है। 5वीं सदी में बना यह मंदिर स्थापत्य की दृष्टि से अद्भुत है।

श्री वरुणदेव मंदिर
1,000 साल पुराने इस अद्भुत मंदिर को 1947 में बंटवारे के बाद भू-माफियाओं ने अपने कब्जे में ले लिया था। 2007 में पाकिस्तान हिन्दू काउंसिल ने इस बंद पड़े और क्षतिग्रस्त मंदिर को फिर से तैयार करने का फैसला किया। जून 2007 में इसका नियंत्रण पीएचसी को मिल गया, लेकिन अभी भी देखरेख नहीं है।

स्वामीनारायण मंदिर
स्वामीनारायण मंदिर सिंध प्रांत के कराची के एमए जिन्ना रोड पर स्थित है। मंदिर स्थित धर्मशाला में ठहरने की भी व्यवस्था है। इस मंदिर के बारे में चर्चित है कि यहां हिन्दुओं के साथ मुस्लिम भी माथा टेकने आते हैं।

साधु बेला मंदिर, सुक्कुर
8वें गद्दीनशीं बाबा बनखंडी महाराज की मृत्यु के बाद संत हरनामदास ने इस मंदिर का निर्माण 1889 में कराया। सिन्ध प्रांत के सुक्कुर में बाबा बनखंडी महाराज 1823 में आए थे।

राम मंदिर, सैदपुर
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में पुराने समय के तीन मंदिर हुआ करते थे। एक सैयदपुर, दूसरा रावल धाम और तीसरा गोलरा के मशहूर दारगढ़ के पास है। सैयदपुर गांव में स्थित राम मंदिर राजा मानसिंह के समय में 1580 में बनवाया गया था।



मंदिरों के लिए ‘काला दिवस’ढांचा ढहने के बाद पाकिस्तान में 120 से अधिक मंदिरों को तोड़ा गया। 2 से 8 दिसंबर, 1992 के दौरान हिंदुओं को सर्वाधिक तबाही पाकिस्तान में झेलनी पड़ी थी। पाकिस्तान में बीबीसी के लिए काम करने वाले फोटो पत्रकार शिराज हसन का कहना है कि ढांचा ध्वंस के बाद पाकिस्तान में लोग मंदिरों में पर टूट पड़े और सौ से अधिक मंदिरों को जमींदोज कर दिया। मंदिरों में लूट-पाट मचाई गई। देवी-देवताओं की प्रतिमाएं खंडित कर दी गईं और वहां रहने वालों को प्रताड़ना दी गई। पाक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, उत्पात से 500 से अधिक हिंदू परिवार प्रभावित हुए थे। इस दौरान उपद्रवियों ने लोरलिया में छह हिंदुआेंं को मौत के घाट उतार दिया था। पाकिस्तानी पत्रकार शिराज हसन अपने एक ट्वीट में लिखते हैं कि 1947 के बंटवारे के बाद से कई हिंदू परिवार मंदिरों में रहते हैं। ढांचा ध्वंस के समय पाकिस्तान में सर्वाधिक यही परिवार प्रताड़ित किए गए। इस दौरान रावलपिंडी के कृष्णा मंदिर का गुबंद दंगाइयों ने क्षतिग्रस्त कर दिया था। इसी शहर के कल्याण दास मंदिर को भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई थी, पर उसे किसी तरह बचा लिया गया। इस मंदिर में अब दृष्टिहीनों का  सरकारी स्कूल चलता है।