अब आपकी सेहत को संभालेगी तकनीक

    दिनांक 11-फ़रवरी-2021
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बालेन्दु शर्मा दाधीच
‘डीप लर्निंग सॉफ्टवेयर’ अस्पतालों या डॉक्टरों के क्लिनिक में आने वाले फोन पर नजर रखते हुए इस बात का अंदाजा लगा लेता है कि किस इनसान को दिल का दौरा पड़ा होगा या पड़ सकता है
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 ‘द विंची’ रोबोट से आंखों की शल्य चिकित्सा करते डॉक्टर        (फाइल चित्र)

 ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (एआई) की बदौलत जिन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा बदलाव होने वाला है, उनमें से एक है चिकित्सा और स्वास्थ्य का क्षेत्र। जिन कामों का तरीका पूरी तरह बदल जाएगा वे हैं-रोगों की समय पूर्व पहचान, बेहतर जांच, दवाओं का विकास, आॅपरेशन जैसी जटिल प्रक्रियाओं में तकनीकी सहयोग, रोगियों की सेहत की निगरानी और देखभाल। दर्जनों दूसरे क्षेत्रों का भी कायाकल्प हो जाएगा। वैसे, यह बदलाव आना शुरू हो चुका है। ‘एआई’ की बदौलत न सिर्फ जिंदगियां बचाना संभव होगा बल्कि चिकित्सा पर होने वाले खर्च को भी बचाया जा सकेगा, लोगों की तकलीफें भी कम की जा सकेंगी।

अग्रिम जांच
‘एआई’ लाखों-करोड़ों रोगियों के मामलों के पैटर्न, डेटा, लक्षणों आदि का विश्लेषण कर इन बीमारियों पर ऐसी पकड़ हासिल कर लेती है जो इनसान के लिए संभव नहीं है। हालांकि डॉक्टर भी अपने जीवनकाल में हजारों मरीजों को देखते हैं और उन अनुभवों से अपने ज्ञान को बेहतर बनाते हैं। लेकिन वे ‘एआई’ का मुकाबला नहीं कर सकते जिसकी क्षमताएं असीम हैं। मरीजों के डेटा के पैटर्न का विश्लेषण करते हुए वह पिछले कई साल की किसी व्यक्ति की स्थिति के साथ तुलना करते हुए आगे की संभावनाओं को भांप सकती है। माइक्रोसॉफ्ट ने दो साल पहले अपोलो समूह के साथ एक ऐसी ही परियोजना शुरू की थी जिसके तहत मरीजों के शरीर के शुरुआती लक्षणों के आधार पर इस बात की भविष्यवाणी की जा सकती है कि इस व्यक्ति को कितने साल बाद दिल की बीमारी होने की आशंका है। मरीज की पृष्ठभूमि, जीवनशैली, उसकी आदतों व शारीरिक लक्षणों आदि के डेटा का इस्तेमाल करते हुए हर मरीज को एक अंक दिया जाता है जो आने वाली बीमारी की तरफ संकेत करता है। इस परियोजना के तहत ‘एआई’ का प्रयोग करके पांच-सात साल पहले ही बताया जा सकेगा कि किस रोगी को कब दिल का दौरा पड़ सकता है।

गूगल की एआई रिसर्च परियोजना के तहत भी दिल की बीमारियों तथा डायबिटिक रेटिनोपैथी (मधुमेह के मरीजों में आंख की बीमारी) जैसे रोगों का बहुत पहले पता लगाया जा रहा है। ऐसी ही एक अन्य परियोजना एलवी प्रसाद आइ हॉस्पिटल और माइक्रोसॉफ्ट के सहयोग से शुरू हुई है जिसमें रेटिना के पिछले लाखों चित्रों के विश्लेषण के आधार पर किसी मरीज की आंखों का विश्लेषण करते हुए मोतियाबिंद, काला मोतिया, अंधेपन या आंखों की दूसरी बीमारियों के बारे में बरसों पहले बताया जा सकता है।

शल्य चिकित्सा में सहयोग

ऐसे रोबोट भी मौजूद हैं जो खुद ही नसों के जरिए शरीर में सही जगह पर जाकर डॉक्टरों की देखरेख में सर्जरी को अंजाम देते हैं। हार्टलैंडर ऐसा ही एक सूक्ष्म रोबोट है जिसे दिल की बीमारियों में इस्तेमाल किया जाता है। द विंची नामक एक रोबोट आंखों की सर्जरी ज्यादा सटीक ढंग से करता है।शल्य चिकित्सा में रोबोट का इस्तेमाल अब सामान्य होता जा रहा है। ये रोबोट मरीज के पुराने रिकॉर्ड के विश्लेषण के साथ, उसकी दूसरे लाखों मामलों के साथ तुलना करते हुए सर्जन के उपकरण को एकदम सटीक जगह पर इस्तेमाल करने में मदद कर सकते हैं। इससे अकारण लंबा चीरा लगाने की जरूरत नहीं होती और सर्जरी भी सटीक होती है। मरीज के ज्यादा समय तक अस्पताल में रुकने की जरूरत नहीं होती। इसकी बदौलत, सर्जरी के बाद पैदा होने वाली जटिलताओं को बहुत कम किया जा सकता है। ऐसे रोबोट भी मौजूद हैं जो खुद ही नसों के जरिए शरीर में सही जगह पर जाकर डॉक्टरों की देखरेख में सर्जरी को अंजाम देते हैं। हार्टलैंडर ऐसा ही एक सूक्ष्म रोबोट है जिसे दिल की बीमारियों में इस्तेमाल किया जाता है। द विंची नामक एक रोबोट आंखों की सर्जरी ज्यादा सटीक ढंग से करता है।

कौन-सी औषधि अनुकूल?
किस रोगी के लिए कौन-सी दवा ज्यादा सटीक बैठेगी, इसका पता लगाना एक मुश्किल काम है। इसमें भी ‘एआई’ इसलिए जरूरी है क्योंकि आज एक ही बीमारी के  लिए दर्जनों दवाइयां उपलब्ध हैं। लेकिन हर व्यक्ति जिस माहौल में रहता है, उसकी जैसी जीवनशैली और खान-पान है, जैसी आनुवंशिक पृष्ठभूमि है, आयु है, शरीर में मौजूद दूसरे रोग या समस्याएं हैं और ऐसी ही दूसरी बहुत सारी बातों को ध्यान में रखते हुए अगर दवा दी जाए तो वह बेहतर काम करेगी। ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ इनसान के शरीर का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए हर व्यक्ति के लिए अलग और एकदम सटीक दवा सुझाती है। इससे इलाज की सफलता निश्चित होती है।

आभासी नर्स
आज ऐसे रोबोट उपलब्ध हैं जो ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ की मदद लेते हुए मरीजों के स्वास्थ्य की उसी तरह देखभाल करते हैं जैसे कि नर्स करती हैं। इन्हें वर्चुअल नर्सिंग असिस्टेंट कहा जाता है। ये चौबीसों घंटे बिना थके अनवरत काम कर सकते हैं। ये न सिर्फ मरीज की सेहत पर नजर रख सकते हैं बल्कि उसके पूछे सवालों के जवाब भी दे सकते हैं और लगातार डॉक्टरों के संपर्क में रह सकते हैं। कोई भी असामान्य गतिविधि होने पर वे पूरे विवरण के साथ डॉक्टरों को सूचित कर सकते हैं और मरीज को तुरंत सहायता मिल सकती है। वे न सिर्फ तापमान, रक्तचाप , आॅक्सीजन का स्तर, मधुमेह का स्तर, दिल की धड़कन और ऐसे ही दूसरे पैमानों पर नजर रख सकते हैं बल्कि मरीज के हावभाव, बोलने के तरीके आदि की भी निगरानी कर सकते हैं और अपनी पिछली जानकारी के आधार पर यह पता लगा सकते हैं कि वह किस स्थिति में है।

निदान के नए तरीके
डेनमार्क में एक कंपनी ने ऐसा ‘डीप लर्निंग सॉफ्टवेयर’ बनाया है जो अस्पतालों या डॉक्टरों के क्लिनिक में आने वाले फोन पर नजर रखते हुए इस बात का अंदाजा लगा लेता है कि किस इनसान को दिल का दौरा पड़ा होगा या पड़ रहा है। वह उनकी आवाज के स्तर, बोलने के तरीके, पीछे की आवाजों और ऐसी ही दूसरी चीजों पर ध्यान देते हुए यह पता लगा लेता है कि कहीं फोन करने वाले शख्स को दिल का दौरा तो पड़ा है। ऐसे मामलों में उसकी कामयाबी की दर 93 फीसदी आंकी गई है। जैसे ही उसे किसी व्यक्ति की बीमारी की गंभीरता का अंदाज लगता है, डॉक्टर को सतर्क कर दिया जाता है और तुरत मरीज का इलाज शुरू हो जाता है।

स्वास्थ्य जांच के नए आयाम

इसी तरह कैंसर के मरीजों की मैमोग्राफी के विश्लेषण के सहारे ‘एआई’ इंसानों की तुलना में ज्यादा सटीक ढंग से इस बात का पता लगा लेती है कि किस मरीज को कैंसर है या हो सकता है। वैसे मैमोग्राम के विश्लेषण में इंसानों की सटीकता की दर बहुत अच्छी नहीं है। लेकिन ‘एआई’ 99 फीसदी सटीक नतीजे देती है। कैंसर के मेटास्टेटिस के मामलों, जब कैंसर एक से दूसरे अंग तक पहुंच जाता है, में भी एआई द्वारा बेहतर भविष्यवाणी तथा पहचान संभव है। स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में त्वचा कैंसर के मामलों में ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ से भी निष्कर्ष पूछे गए और डॉक्टरों से भी। दोनों के नतीजे करीब-करीब समान आए। लेकिन अंतर यह था कि ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ ने यह काम पलक झपकते कर दिया। इसी तरह एक्सरे, सीटी स्कैन, एमआरआई और ऐसे ही दूसरे परीक्षणों को जांचने के काम में भी वह मददगार साबित हो रही है।

आपका उपकरण, आपका सहयोगी
क्या आप यकीन करेंगे कि ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ मात्र आपकी सेल्फी देखकर यह अंदाजा लगा सकती है कि आपको कोई बीमारी तो नहीं है और अगर है तो वह कितनी बिगड़ रही है या बेहतर हो रही है। इंग्लैंड में ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ पर आधारित ऐसा ‘टूल’ बनाया गया है जो बच्चों के चेहरे के चित्रों को देखकर त्वचा और आंखों के रोगों सहित 90 तरह की बीमारियों का पता लगा सकता है। आज लगभग हर व्यक्ति के हाथ में मोबाइल फोन है। जरा सोचिए कि सिर्फ सेल्फी लेने भर से अगर जांच हो जाए तो खुद को स्वस्थ रखना और जल्द सटीक इलाज पाना कितना आसान हो जाएगा। वहीं धन की बचत, समय की बचत, बीमारियों से शरीर पर होने वाले प्रतिकूल असर आदि से सुरक्षा जैसे बहुत सारे दूसरे लाभ तो
हैं ही।  (लेखक सुप्रसिद्ध तकनीक विशेषज्ञ हैं)