“नो वन डिड एनी थिंग इन डेल्ही” भारत में हुआ "नो वन" का अविष्कार

    दिनांक 12-फ़रवरी-2021   
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रवनीत सिंह बिट्टू अभी चर्चा में इसलिए हैं, क्योंकि 10 फरवरी को राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर लोकसभा में चर्चा के दौरान रवनीत सिंह बिट्टू ने प्रख्यात आंदोलनजीवी योगेंद्र यादव पर किसानों को भड़काने का आरोप लगाया। उन्होंने लाल किला मामले में हुई हिंसा के लिए भी योगेंद्र यादव को ही जिम्मेदार ठहराया।
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भारत में जिसे किसान आंदोलन कहा जा रहा है, उसे समझने का एक सबसे सरल तरीका यह है कि आप यह देखें कि व्यापक राजनीतिक षड़यंत्र में उसके तार विदेशों से भी जुड़े हैं और ऐसे गिरोहों से भी जुड़े हैं, जो कोरोना वायरस की तरह अब किसी एक देश के नहीं हैं। इस षड़यंत्र में कोई गतिविधि, कोई बयान, भाषण या हरकत किस तरह फिट हो रही है। ऐसा करने से अपने आप सारी परतें खुलती चली जाती हैं।

एक उदाहरण देखिए, पंजाब के लुधियाना से कांग्रेस के सांसद हैं रवनीत सिंह बिट्टू। वास्तव में उन्हें सिर्फ कांग्रेस के बजाय पूरे यूपीए का सांसद कहा जाए, तो ज्यादा उचित होगा। खांटी कांग्रेसी परम्परा के अनुरुप रवनीत सिंह बिट्टू मूलतः इसलिए नेता हैं, क्योंकि वे दिवंगत बेअंत सिंह के पोते हैं।

पुनः खांटी कांग्रेसी परम्परा के अनुरुप एक ही जाति से संबंधित होने के नाते वह पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के भी प्रतिद्वंद्वी हैं और बादल परिवार के भी प्रतिद्वंदी हैं। यूपीए की आरजेडी परम्परा के अनुरूप वह शिक्षा-दीक्षा के मामलों में लालू प्रसाद परिवार को भी कड़ी टक्कर दे रहे हैं।

खांटी कांग्रेस परम्परा या यूपीए परम्परा का एक और लक्षण होता है, “नो वन किल्ड जेसिका”। जैसे 10 हजार कमाने वाला नौकर मालिक की बेटी को करोड़ों रुपए शगुन में दे लेता है। वैसे ही अब “नो वन डिड एनी करप्शन” और “नो वन डिड एनी थिंग इन डेल्ही”अब चल रहा है।

इनके पहले और इनके बीच भी असंख्य उदाहरण हैं। नो वन.. नो वन फ्रॉम इंडिया, नो वन फ्रॉम माय फैमिली.... बोफोर्स वाला तो याद ही होगा, लेकिन इस “नो वन” का अविष्कार करने के लिए जरूर थोड़ी मेहनत करनी पड़ती है। 

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फिर रवनीत सिंह बिट्टू पर लौटते हैं। पंजाब, खालिस्तान, जाति, कांग्रेस, आदि-इत्यादि कारणों से रवनीत सिंह बिट्टू शुरु से ही कृषि सुधार के इन प्रयासों पर राजनीति करते रहे हैं और अपने प्रतिद्वंद्वियों के लिए परेशानी की स्थिति पैदा करते रहे हैं, लेकिन इसे सिर्फ उनकी अपनी राजनीति से जोड़कर देखना गलत होगा। एक व्यापक व्यूह में उनकी भूमिका साफ महसूस की जा सकती है।

रवनीत सिंह बिट्टू अभी चर्चा में इसलिए हैं, क्योंकि 10 फरवरी को राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर लोकसभा में चर्चा के दौरान रवनीत सिंह बिट्टू ने प्रख्यात आंदोलनजीवी योगेंद्र यादव पर किसानों को भड़काने का आरोप लगाया। उन्होंने लाल किला मामले में हुई हिंसा के लिए भी योगेंद्र यादव को ही जिम्मेदार ठहराया। बिट्टू के अनुसार गणतंत्र दिवस पर किसान ट्रैक्टर रैली में हुई हिंसा के पीछे भी योगेंद्र यादव की ही साजिश थी। उन्होंने यह भी कहा कि किसान आंदोलन में खालिस्तानी फंडिंग हो रही है।

अच्छी बात है, लेकिन इन्हीं रवनीत सिंह बिट्टू ने 26 जनवरी को कहा था कि दिल्ली में जो कुछ हुआ, उसकी योजना तीन दिन पहले बना ली गई थी और इस किसान आंदोलन के पीछे खालिस्तानी नेता दीप सिद्धू अपना एजेंडा चला रहा है। बिट्टू के अनुसार गणतंत्र दिवस पर उपद्रव और हिंसा की योजना भी दीप सिद्धू ने बनाई थी, और उसके लोगों ने 25 जनवरी की रात को ही किसानों के ट्रैक्टरों पर कब्जा कर लिया था।

माने, जो व्यक्ति 10 फरवरी को वाई. सलीम उर्फ योगेन्द्र था, वही व्यक्ति 25 जनवरी की रात से दीप सिद्धू था और उस समय तक खालिस्तानी था। गत 26 जनवरी की दोपहर के बाद से वह व्यक्ति भाजपा का एजेंट था, जिसके बचाव के लिए टिकैत का धरना चल रहा था और फिर पंजाब से कांग्रेस वकीलों की तैनाती कर रही थी।

नोट करने लायक बिन्दु गत 25 जनवरी की अंधेरी रात का है। मतलब कि रवनीत सिंह बिट्टू के सिंघु बॉर्डर पर पहुंचने के कम से कम सवा दिन बाद की बात। दरअसल, उस अंधेरी रात से सवा दिन पहले रवनीत सिंह बिट्टू के सिंघु बॉर्डर पर पहुंचे थे। बताया गया कि वहां उनके साथ “कुछ लोगों ने कुछ हुज्जत” की थी।

मीडिया में प्रकाशित रवनीत सिंह बिट्टू के बयान के अनुसार उन पर “बड़ी प्लानिंग के तहत हमला किया गया था, उनको मारने की प्लानिंग थी। उन पर और उनके साथ गए लोगों पर कातिलाना हमला किया गया था। लाठी से हमला हुआ था।” रवनीत सिंह बिट्टू ने यह भी कहा कि उनकी पगड़ी पर हमला किया गया। सबसे बड़ा सवाल किसने किया? शायद नो वन ने किया होगा?