जय श्री राम बोलना तो अपराध नहीं, फिर क्‍यों रिंकू को मार डाला गया ?

    दिनांक 12-फ़रवरी-2021   
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जय श्री राम बोलने और राममंदिर के लिए रैली निकालने के लिए दिल्‍ली के मंगोलपुरी में रिंकू शर्मा की बर्बरता से हत्‍या कर दी गई। पिछले साल अक्‍टूबर में राहुल राजपूत की और उससे पहले मुस्लिम लड़की से मित्रता के कारण अंकित सक्सेना का गला रेत दिया गया था। ध्रुव त्यागी की हत्या इसलिए हुई थी क्योंकि वह अपनी बेटी से छेड़छाड़ विरोध कर रहे थे। इन तीनों घटनाओं में एक बात समान है यहां अपराधी मुसलमान हैं, अब इसे जिहादी सोच न कहें तो क्‍या कहें

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जय श्री राम कहोगे, मार दिए जाओगे। वे लड़कियां छेड़ेंगे यदि जुबान खोली तो कत्‍ल कर दिए जाओगे। एक के बाद एक घटनाओं को अंजाम दिया जाएगा और सेकुलर मीडिया खामोश रहेगा। कोई कुछ नहीं बोलेगा। दिल्‍ली के मंगोलपुर में रहने वाले रिंकू शर्मा (26 ) को बर्बरता से मार डाला गया। उन्‍हें मार डालने वाले पड़ोसी मुसलमान परिवार के लोग थे। पुलिस ने चार आरोपियों जाहिद, मेहताब, दानिश व इस्‍लाम को गिरफ्तार कर लिया है। परिजनों का कहना है कि कुछ माह पहले राममंदिर के लिए रैली निकालने के चलते ये लोग उससे दुश्‍मनी रखते थे। रिंकू बजरंग दल के सक्रिय कार्यकर्ता थे। पूरा परिवार बजरंग दल से जुड़ा है। वह राममंदिर निर्माण के लिए रामनिधि संग्रह के काम में भी जुटे हुए थे।
परिजनों की माने तो परिवार की महिलाएं भी इस हत्‍याकांड में शामिल रही जैसे बेटी से छेड़छाड़ का विरोध करने पर दिल्‍ली में धुव्र त्‍यागी की हत्‍या में चाकू मुस्लिम परिवार की महिलाओं ने ही लाकर दिया था। ऐसे ही राहुल की हत्‍या में भी हुआ। लेकिन यहां सेकुलर मीडिया खामोश है क्‍योंकि मरने वाला वाला हिंदू है और मारने वाले मुसलमान। तो आप समझ सकते हैं लुटियन मीडिया, खान मार्केट गैंग खामोश है। स्क्रीन काली कर डालने वालों, हर चीज में लिंचिंग ढूंढने वाले मीडिया के एक खास वर्ग के लिए यह खबर नहीं है। सेकुलरिज्म का चश्मा लगाए चैनलों पर बहस करने वाले पत्रकार ऐसी घटनाओं पर खामोश हो जाते हैं। कथित बुद्धिजीवी दलीलें देते हैं कि मामले को हिंदू—मुस्लिम के नजरिए से न देखा जाए. सलेक्टिव जर्नलिज्म (मजहब, जात, सुविधा देखकर होने वाली पत्रकारिता) और सलेक्टिव क्रिटिसिज्म (सुविधा के हिसाब से मुद्दों को आलोचना के लिए चुनना) वाला एक तबका लंबे समय से देश के मीडिया पर काबिज है। अपराध में जहां मुसलमान शामिल हों, उसके लिए इनकी परिभाषा बहुत सरल होती है। अपराध का और अपराधियों का कोई मजहब नहीं होता। आखिर ये किस हिसाब से कथ्य निर्धारित करते हैं।
फरवरी 2018 में दिल्ली में एक मुस्लिम परिवार द्वारा अंकित सक्सेना की सरेराह हत्या कर दी गई थी। मुसलमान लड़की से दोस्ती के चलते दिल्ली में अंकित की हत्या को लेकर कथित सेकुलर मीडिया ने जिस तरह रिपोर्टिंग की थी उसे देखकर मीडिया का पक्षपातपूर्ण रवैया स्पष्ट नजर आता है। क्योंकि यहां मरने वाला हिंदू युवक था और मारने वाले मुसलमान, इसलिए यह खबर सेकुलर मीडिया के एजेंडे में फिट नहीं बैठी। इस खबर पर न चैनलों में पैनल बिठाए गए, न ही संपादकीय लिखे गए। वहीं 22 जून 2017 को ट्रेन में सीट के विवाद के चलते जुनैद की हत्या को तुरंत असहिष्णुता करार दे दियागया था। मीडिया ने इस मामले में यह धारणा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी कि भीड़ द्वारा नफरत के चलते मुसलमान युवक की हत्या की गई। ऐसा ही अखलाक और पहलू खान की हत्या के मामले में भी मीडिया ने किया था और मामले को पूरी तरह हिंदू और मुस्लिम बना दिया था।
इस तरह 11 मई 2019 को बेटी से हुई छेड़खानी का विरोध करने पर दिल्ली के बसईदारापुर में ध्रुव त्यागी की हत्या कर दी गई थी। मोहल्ले के ही एक आपराधिक मुस्लिम परिवार के युवकों ने ध्रुव त्यागी की बेटी से छेड़छाड़ की। जब उन्होंने एतराज किया, तो पूरा परिवार उन पर टूट पड़ा। 11 लोगों ने घेरकर ध्रुव त्यागी और उनके बेटे को चाकुओं से गोद दिया। चार महिलाएं भी इसमें शामिल थीं। ध्रुव का पेट चीर डालने के लिए बड़ा चाकू एक महिला ने ही घर से लाकर दिया था। रमजान के महीने में पूरा परिवार इस हत्या को अंजाम देने में जुटा था, लेकिन यहां किसी को ‘मॉब लिचिंग’ नहीं दिखाई दी थी।
जहां आरोपी मुसलमान होता है उसमें इस देश की कथित सेकुलर लॉबी एक साथ उठ खड़ी होती है। अख़लाक़ और तबरेज की हत्या पर राजनीतिक रोटियां सेकने वाले लोग रिंकू शर्मा, अंकित सक्‍सेना और ध्रुव त्‍यागी की बर्बरता से की गई हत्‍याओं के बाद भी हिंदुओं के पक्ष में आवाज नहीं उठाते हैं।
हिन्दुओं के मारे जाने पर ये लोग चुप्पी साधे रहते हैं। हिन्दुओं की हत्याओं पर खास किस्म के संगठन कोई आंदोलन नहीं करते हैं। सेकुल मीडिया भी खामोश रहता है। आखिर यह दोहरा मानदंड कब तक चलेगा ?