किसानों के साथ नहीं कैप्टन

    दिनांक 15-फ़रवरी-2021
Total Views |
 राकेश सैन
 
मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पिछले साल अप्रैल में कोरोना वायरस के बाद राज्य की आर्थिक रणनीति तैयार करने के लिए कमेटी गठित की थी। इसमें मोंटेक सिंह आहलूवालिया व अशोक गुलाटी थे। इनके सुझाव बहुत कुछ केन्द्रीय कृषि सुधार कानूनों से मिलते-जुलते हैं, इसलिए कैप्टन ने किए निरस्त 
amren_1  H x W:
कांग्रेस पार्टी राजनीतिक स्वार्थ के चलते कृषि सुधार कानूनों का चाहे जितना विरोध करे, परंतु कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए विशेषज्ञ जो-जो परामर्श दे रहे हैं वे इन्हीं कानूनों की छायाप्रति जान पड़ते हैं। जैसा कि सभी जानते हैं, केंद्र सरकार के तीन नए कृषि सुधार कानूनों का पंजाब की सरकार ने भी मुखर रूप से विरोध किया और विधानसभा में इसके खिलाफ प्रस्ताव भी पारित किया। पंजाब सरकार कहती आई है कि ये किसानों के लिए काले कानून हैं, लेकिन राज्य के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह द्वारा गठित विशेषज्ञ समूह ने कृषि क्षेत्र में सुधारों की बात कही है। इस समूह ने कृषि क्षेत्र में जिन सुधारों की बात कही उसके कई प्रावधान केंद्र सरकार के तीन नए कृषि सुधार कानूनों से मिलते-जुलते हैं। इस समूह ने जो रिपोर्ट सौंपी वह लोकसभा से तीनों नए कृषि कानूनों के पारित होने से 45 दिन पहले दी गई थी, जिसके अब प्रकाश में आने के बाद मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने ट्वीट करके इन्हें निरस्त कर दिया है।
मुख्यमंत्री ने पिछले साल अप्रैल में कोरोना वायरस के बाद राज्य की आर्थिक रणनीति तैयार करने के लिए यह कमेटी गठित की थी। योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष व पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के आर्थिक मामलों के सहयोगी रहे प्रसिद्ध अर्थशास्त्री स. मोंटेक सिंह आहलूवालिया इसके अध्यक्ष थे। समिति ने अगस्त में प्रारंभिक रिपोर्ट सौंप दी थी। समिति में कृषि विशेषज्ञ और अर्थशास्त्री श्री अशोक गुलाटी भी शामिल रहे हैं। बता दें कि दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे कथित किसान आंदोलन के बीच सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र और किसानों के बीच बातचीत के लिए जिस चार सदस्यीय वार्ता समूह का गठन किया, उसमें अशोक गुलाटी भी शामिल हैं। इस समिति ने ‘ट्रांसफॉर्मिंग पंजाब एग्रीकल्चर’ शीर्षक से अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें विशेषज्ञ पैनल ने विपणन सुधारों और एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्किट कमेटी (एपीएमसी) से परे कृषि विपणन खोलने का सुझाव दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य सरकार ने पंजाब एपीएमसी अधिनियम में संशोधन के लिए कदम उठाए हैं, लेकिन अभी भी कई नियम और अधिनियम ऐसे हैं जिसमें बहुत सारे प्रतिबंधात्मक प्रावधान हैं, जैसे उच्च लाइसेंस शुल्क, कई फसलों का बहिष्कार जिसमें विविधता की संभावना है, लाइसेंस की वैधता की अवधि की अनिश्चितता और लाइसेंस प्राधिकारी के रूप में मंडी बोर्ड का होना, जिसमें हितों के टकराव का होना स्वाभाविक है।
विशेषज्ञों ने प्रस्तावित किया है कि राज्य सरकार को अन्य राज्यों के कानूनों और पंजाब के प्रावधानों की सावधानीपूर्वक तुलना करनी चाहिए। रिपोर्ट में उल्लेख है कि अगर हरियाणा और उत्तर प्रदेश अधिक उदार व्यवस्था की ओर बढ़ते हैं, तो पंजाब प्रसंस्करणकर्ताओं, निर्यातकों, संगठित खुदरा विक्रेताओं आदि के संभावित निवेश खोने का जोखिम उठाता है। इससे रोजगार और कर राजस्व का नुकसान भी हो सकता है। इसलिए राज्य सरकार को जल्दी से इन नियमों को लागू करना चाहिए और बाजार शुल्क, कमीशन शुल्क, लाइसेंसिंग आदि से संबंधित संशोधनों को अधिसूचित करना चाहिए, जो पंजाब को अन्य राज्यों के साथ प्रतिस्पर्धी बनाते हैं।
रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई है कि कृषि भूमि हेतु पट्टे पर बाजार खोलने के लिए राज्य कानूनों को बदला जाना चाहिए ताकि निजी क्षेत्र भाग ले सके। विशेषज्ञों ने पंजाब की कृषि सब्सिडी की आलोचना की है और राज्य को सीधे तौर पर लाभकर्ता को पैसा स्थानांतरित करने का सुझाव दिया है। इतना ही नहीं, इस समिति ने कृषि के लिए निशुल्क बिजली देने का विरोध भी किया है। विशेषज्ञों केअनुसार इससे बजट पर निरंतर बोझ पैदा हो गया है और इसके पर्यावरण के लिए बहुत हानिकारक परिणाम हैं, क्योंकि इससे धान की खेती को बढ़ावा मिलता है, जिसके कारण भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है।
केंद्र के कृषि सुधारों पर कांग्रेस के साथ-साथ अकाली दल बादल के विरोध की पोल अब खुलती जा रही है क्योंकि पंजाब में जो अनुबंध कृषि अधिनियम बना है उसमें तो किसानों को सख्त सजा तक का प्रावधान है। इस अधिनियम को अकाली दल ने लागू किया, जिसे कांग्रेस सरकार आज भी जारी रखे हुए है। अगर पंजाब के अनुबंध कृषि अधिनियम की तुलना केंद्रीय कानून से की जाए तो कांग्रेस व अकाली दल वाला कानून थोथा साबित होता है।
बता दें कि तत्कालीन मुख्यमंत्री स. प्रकाश सिंह बादल की सरकार ने 2013 में पंजाब अनुबंध कृषि अधिनियम पारित किया था। इसके तहत अनुबंध करने वाली कंपनी या किसान में से कोई भी अनुबंध को तोड़ता है तो एक महीने की कैद की सजा हो सकती है। व्यापारी के लिए एक महीने की सजा के साथ एक लाख रुपये जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। इस जुर्माने की राशि दस लाख रुपये तक बढ़ाई जा सकती है। अगर किसान समझौता तोड़ता है तो उसे भी न्यूनतम पांच हजार रुपये जुर्माना होगा जिसे पांच लाख रुपये तक बढ़ाया जा सकता है। दूसरी ओर, केंद्र के कृषि कानून में किसान को सजा का का प्रावधान नहीं है और दोनों के बीच विवाद होने पर किसान को ही अधिमान दिए जाने की व्यवस्था है।
पंजाब की कांग्रेस सरकार ने केंद्र के कृषि कानून के विरोध में तो विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर दिया लेकिन पहले से पंजाब में बने इस कानून को रद्द करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है। इससे भी उसका दोहरा चेहरा ही सामने आता है।
सभी जानते हैं कि इस समिति में शामिल विशेषज्ञ, मोंटेक सिंह आहलूवालिया व श्री अशोक गुलाटी की विगत कांग्रेस सरकार में क्या भूमिका व स्थिति रही है। केवल इतना ही नहीं, इन्हीं विशेषज्ञों की सिफारिश के आधार पर कांग्रेस पार्टी अपने चुनावी घोषणापत्र में कृषि सुधार लाने व मुक्त बाजार व्यवस्था लागू करने का वायदा कर चुकी है परंतु अब केवल विरोध के लिए विरोध करती दिख रही है। केंद्र के इन कृषि सुधार कानूनों का विरोध कर रहे किसानों को भी समझना चाहिए कि अगर कृषि व कृषकों को दशा सुधारनी है तो पुराने ढर्रे पर चली आ रही व्यवस्था का कोई न कोई विकल्प ढूंढ़ना ही होगा। किसानों को यह भी समझना होगा कि जो पार्टियां आज उनके कंधे से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पर निशाना लगा रही हैं, अगर केंद्र में सत्ता इन्हीं दलों के हाथों में होती तो उनकी सरकारों ने भी यही कदम उठाने थे जो वर्तमान सरकार उठा रही है। आंदोलनकारी किसान संगठनों को कृषि के क्षेत्र में न केवल वर्तमान समय की मांग को पहचानना चाहिए बल्कि विशेषज्ञों की राय पर भी चिंतन-मनन करना चाहिए।