#चमोली विभीषिका और जिजीविषा

    दिनांक 15-फ़रवरी-2021
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दिनेश मानसेरा
 
पहले उत्तरकाशी, फिर केदारनाथ और अब जोशीमठ में जल प्रलय आने के पीछे की वजह प्राकृतिक है या फिर इनसान की प्रकृति के साथ छेड़छाड़, इस सवाल पर बराबर बहस होती रही है। अदालतों में दाखिल याचिकाएं लंबे वक्त से लटकी हैं, तो उधर एक अंतराल के बाद अचानक कोई हादसा घट जाता है

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उत्तराखण्ड के चमोली जिले में जोशीमठ के पास ग्लेशियर के टूटने से ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट में आए अथाह पानी ने न सिर्फ ऋषिगंगा, बल्कि उससे करीब 15 किलोमीटर आगे एनटीपीसी के तपोवन पावर प्रोजेक्ट को भी मलबे में बदल दिया। अपुष्ट सूत्रों के अनुसार इस दुर्घटना में अभी तक करीब 32 लोगों के मरने और करीब 176 के लापता होने की सूचना है।
यह वीभत्स हादसा गत 7 फरवरी की सुबह करीब दस बजे हुआ। जानकारी के मुताबिक नन्दादेवी हिमालय क्षेत्र में अचानक ग्लेशियर फटा। उसके वेग से ऋषिगंगा नदी पर बना पावर प्रोजेक्ट पहले मलबे में बदल गया, फिर इसी मलबे के वेग ने धौलीगंगा नदी की धारा पर बने तपोवन पावर प्रोजेक्ट को तहस-नहस कर दिया। इस विध्वंस से न सिर्फ वहां काम कर रहे मजदूरों की जान चली गई, बल्कि करीब सात सौ करोड़ रु. का नुकसान भी हुआ। पानी के तेज बहाव में 7 बड़े-छोटे पुल भी बह गए, जिससे नीति घाटी के सीमांत गांवों के लिए राहत आपूर्ति प्रभावित हो गयी है। इस विपदा के दौरान तपोवन पावर प्रोजेक्ट की सुरंगों में मलबे के घुस आने से उनमें काम कर रहे करीब 45 मजदूरों को राष्ट्रीय आपदा अनुक्रिया बल (एसडीआरएफ), भारत तिब्बत सीमा बल (आईटीबीपी) और सेना के जवानों की मदद से सुरक्षित बाहर निकाला गया। सुरंग में फंसे अन्य 37 श्रमिकों को निकालने के प्रयास जारी हैं। जल प्रलय इतना भयंकर था कि ऋषि गंगा से तपोवन तक करीब 20 से 30 मीटर ऊंची गाद से भरा पानी अपने साथ छोटे-बड़े भवनों तक को बहा ले गया। दुघर्टना के तत्काल बाद हरकत में आई उत्तराखण्ड सरकार ने सबसे पहले जल प्रलय को ऋषिकेश-हरिद्वार तक न जाने देने के लिए, टिहरी बांध की टरबाइन बन्द की ताकि मंदाकनी नदी के जल को टिहरी झील में ही रोका जा सके। वहीं, श्रीनगर पावर प्रोजेक्ट के पानी को तत्काल छोड़ा गया ताकि अलकनन्दा में जोशीमठ से आने वाले जल को रोका जा सके अन्यथा जलप्रवाह का रौद्र रूप और भारी तबाही का कारण बनता। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने तुरंत हवाई सर्वेक्षण कर जोशीमठ-चमोली में अधिकारियों के साथ राहत कार्यों की समीक्षा की और केंद्र सरकार से बात की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री से चार बार बात की और विश्वास दिलाया कि इस दुर्घटना को लेकर सरकार हर संभव मदद कर रही है। केंद्र की तरफ से तुरंत एनडीआरएफ, सेना, आईटीबीपी की टुकड़ियां घटना स्थल पर पहुंचीं और एसडीआरएफ के कार्यों में सहयोग दिया। गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री से लगातार बातचीत कर राहत कार्यों की जरूरतों के बारे में जानकारी ली। प्रधानमंत्री कार्यालय से मृतकों के आश्रितों को दो-दो लाख रु., मुख्यमंत्री की तरफ से चार-चार लाख रु. की राहत राशि दिए जाने की भी घोषणा की गई। ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट में कार्यरत अधिकांश श्रमिक उत्तर प्रदेश से थे। अत: उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से हरिद्वार में एक नियंत्रण कक्ष स्थापित करके तीन मंत्रियों सहित एक नोडल अधिकारी की तैनाती की गई है। उत्तर प्रदेश और हरियाणा की सरकारों ने उत्तराखंड त्रासदी कोष के लिए 11 करोड़ रु. की सहायता भेजी है। केन्द्रीय ऊर्जा मंत्री आर.के. सिंह ने घोषणा की है कि एनटीपीसी मृतकों के आश्रितों को 20-20 लाख रु. की राहत राशि दी जाएगी।

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पहले उत्तरकाशी, फिर केदारनाथ और अब चमोली में जल प्रलय आने के पीछे की वजह प्राकृतिक है या फिर इनसान की प्रकृति के साथ छेड़छाड़, इस पर बराबर बहस होती रही है। लेकिन जब विभीषिका आती है तो ऐसे सारे सवालों को पीछे छोड़कर बडेÞ पैमाने पर तबाही मचा देती है। केदारनाथ की घटना एक सबक थी। चमोली में आई यह जल प्रलय जहां भारी तबाही मचा गई, वहीं राहतकर्मियों की मदद से स्थानीयजन और परियोजनाओं में काम कर रहे कामगारों ने गजब की जिजीविषा भी दर्शायी। ल्ल
राहत में जुटे स्वयंसेवक
उत्तराखण्ड आपदा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा सहायता केन्द्र बनाया गया है। स्वयंसेवकों ने रैणी गांव में बचाव दल के जवानों के लिए भोजन, चाय, पानी आदि की व्यवस्था की है। आपदा से प्रभावित आमजनों के लिए भी भोजन और गर्म कपड़ों की व्यवस्था की गई है। संघ के प्रान्त प्रचारक श्री युद्धवीर बराबर हालात की समीक्षा कर रहे हैं। उन्होंने राहत कार्यों के लिए सेवा प्रमुखों को नियुक्त कर उनके फोन नम्बर भी जारी किए हैं।