सद्ज्ञान और शौर्य का महापर्व

    दिनांक 16-फ़रवरी-2021
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पूनम नेगी
 
वसंत केवल ज्ञान और भक्ति का ही पर्व नहीं है, बल्कि शौर्य व बलिदान की कई गाथाएं भी इससे जुड़ी हैं। यह पर्व जीवन में नए रंग और उल्लास भरता है। हिन्दू वर्ष का अंत और शुरुआत वसंत ऋतु में ही होती है

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बृहदारण्यक उपनिषद् में विदेहराज जनक महर्षि याज्ञवल्क्य से पूछते हैं, ‘‘जब सूर्य अस्त हो जाता है, चंद्र्रमा की चांदनी भी नहीं रहती और आग भी बुझ जाती है, उस समय मनुष्य को प्रकाश देने वाली कौन-सी वस्तु है?’’ तब ऋषि उत्तर देते हैं, ‘‘वह शक्ति है बुद्धि, ज्ञान और विवेक की।’’ सनातन दर्शन में मां सरस्वती को मनुष्य की चेतना में निहित चैतन्य शक्ति का प्रतीक माना गया है जो उसे अज्ञान के अंधकार से सद्ज्ञान के प्रकाश की ओर अग्रसर करती है। वसंत पंचमी मां सरस्वती के अर्चन-वंदन का पावन पर्व है। ऋग्वेद के अनुसार, सृष्टि की रचना के बाद जीव जगत को स्वर देने के लिए ब्रह्मा के आवाहन पर माघ शुक्ल पंचमी तिथि को वरमुद्राधारी मां सरस्वती अवतरित हुर्इं और मौन सृष्टि को स्वर दिया। 
ऋषि मनीषा कहती है कि जीभ केवल रसास्वादन के लिए नहीं है; यह वाग्देवी का सिंहासन है। हम वाणी की महत्ता पहचानें तथा सोच-समझ कर बोलें। वाणी का संयम और सदुपयोग ही वाग्देवी की आराधना का मूलमंत्र और वसंत पर्व का आध्यात्मिक संदेश है। हमारा जीवन सद्ज्ञान व विवेक से सतत संचरित होता रहे, इस दिव्य भाव के साथ मां सरस्वती की उपासना से न केवल व्यक्ति का अंतस सात्विक विचारों से भर जाता है, बल्कि उसकी वाणी भी सिद्ध हो जाती है। श्रीकृष्ण को वसंत का अग्रदूत माना जाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, सर्वप्रथम श्रीकृष्ण ने ही वसंत पंचमी के दिन ज्ञान व कला की देवी सरस्वती का पूजन कर वसंत पर्व की परंपरा का शुभारंभ किया था। इसीलिए वैष्णव धर्मावलंबी वसंत पंचमी को ‘श्रीपंचमी’ के रूप में मनाते हैं। राधा-कृष्ण का प्रथम मिलन इसी शुभ दिन हुआ था। इस दिन वृंदावन के श्रीराधा श्यामसुंदर मंदिर में राधा-कृष्ण महोत्सव का भव्य आयोजन होता है। राजा भोज के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘सरस्वती कण्ठाभरण’ में वसंत ऋतु में मनाए जाने वाले ‘सुवसन्तक’ एवं ‘वसन्तावतार’ नामक उत्सवों का सुंदर वर्णन मिलता है। साथ ही, इसका उल्लेख है कि भोज अपने जन्मोत्सव पर वसंत ऋतु में 40 दिवसीय राजकीय उत्सव का आयोजन कराते थे, जिसमें पूरी प्रजा के लिए प्रीतिभोज रखा जाता था। इस अवसर पर पूरा राज्य आमोद-प्रमोदमय होता था तथा राजधानी का राजपथ केसर मिश्रित अबीर-गुलाल से नहा उठता था। इसी तरह, महाकवि कालिदास के ग्रंथ ‘ऋतु संहार’ में भी वसन्तोत्सव का मनभावन वर्णन है।
वसंत उत्सव केवल हिन्दू धर्मावलंबियों तक ही सीमित नहीं है। बौद्ध व जैन मतावलंबी भी इसे हर्षोल्लास से मनाते हैं। बौद्ध ग्रंथ ‘साधनमाला’ में सरस्वती की ‘वज्रशारदा’ और ‘वीणा सरस्वती’ आदि के रूप में उपासना का उल्लेख मिलता है। वसंत पंचमी के दिन गुरुद्वारों में गुरु ग्रंथ साहिब में प्रयुक्त 31 शास्त्रीय रागों में से एक ‘राग वसंत’ का मनोहारी कीर्तन श्रद्धालुओं के मन में भक्ति, स्नेह, प्रेम और श्रद्धा भाव जागृत कर देता है। छोटे बच्चों को इसी पवित्र दिन कागज-कलम पकड़ा कर लिखना सिखाया जाता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। पं. मदन मोहन मालवीय ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की नींव बसंत पंचमी के दिन ही रखी थी।
वसंत पंचमी वसंत की आरंभिकी है। इस दिन को अबूझ मुहूर्त वाला माना जाता है अर्थात् सब कुछ शुभ व मांगलिक। वसंत दु:ख को दूर कर गहन प्राकृतिक राग देता है। भारतीय वर्ष का अंत और आरंभ, दोनों ही वसंत ऋतु में होते हैं। इस ऋतु में वसंत पंचमी, महाशिवरात्रि, होली, नव-संवत्सर, चैत्र नवरात्र, रामनवमी व हनुमान जयंती जैसे पर्व-त्योहार जनजीवन में नव उल्लास भरते हैं। होलिका दहन के लिए होलिकाओं की स्थापना भी वसंत पंचमी से ही होती है। माघ का महीना लगते ही शरद ऋतु की विदाई शुरू हो जाती है तथा वसंत के आगमन के साथ समूची प्रकृति रम्य व नयनाभिराम लगने लगती है। वसंत ऋतु में एक अनूठा लालित्य है। हम चाहे ग्रामीण अंचल में रह रहे हों या महानगरीय परिवेश में, ध्यान दें तो हवा के मस्ती भरे झोंके ही नहीं; गुनगुनी धूप, चंद्रमा की धवल चांदनी, पीली सरसों की मनमोहक चादर ओढ़े हरे-भरे खेत, आम की गदराई मंजरियां, खिलखिलाते फूलों का मोहक सौंदर्य, कोयल की कल-कूजन आह्लादकारी लगते हैं। इसी कारण वसंत को कविता व कला का घर कहा जाता है। वसंत के खान-पान, गीत-संगीत, साज-सज्जा, वस्त्र-विन्यास सब में एक अलग सौंदर्य दिखता है। होली गीतों व फाग की ठिठोली में समाहित मस्ती और उल्लास के साथ लोकजीवन में नयापन आ जाता है।
क्षत्रियों के लिए विजयादशमी, व्यापारियों के लिए दीपावली का जो महत्व है, वही शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों व कलाकारों के लिए वसंत पंचमी का है। इस पर्व से ज्ञान व भक्ति की ही नहीं, शौर्य व बलिदान की भी अनेक घटनाएं जुड़ी हैं। कहते हैं कि त्रेता युग में श्रीराम ने इसी दिन शबरी के जूठे बेर खाकर उन्हें नवधा भक्ति का ज्ञान दिया था। दंडकारण्य क्षेत्र के वनवासी आज भी उस शिला को पूजते हैं, जिसके बारे में मान्यता है कि श्रीराम वहीं बैठे थे और शबरी उन्हें देखकर सुध-बुध खो बैठी और चख-चखकर मीठे बेर राम जी को खिलाने लगी। यहां शबरी माता का मंदिर भी है। यह शुभ दिन पृथ्वीराज चौहान के बलिदान की भी याद दिलाता है। पृथ्वीराज चौहान से 16 बार पराजित होने के बाद मोहम्मद गोरी उन्हें 17वीं बार छल से बंदी बनाकर अफगानिस्तान ले गया और उनकी आंखें फोड़ दीं। गोरी ने मृत्युदंड देने से पूर्व उनकी निशानेबाजी का कमाल देखना चाहा। तब अपने कवि मित्र चंदबरदाई के संकेत ‘चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण। ता ऊपर सुल्तान है, मत चूके चौहान।।’ के संकेत को पढ़कर जो भाला मारा, वह गोरी के सीने में जा धंसा। इसके बाद चंदबरदाई और पृथ्वीराज ने भी एक-दूसरे के पेट में छुरा भोंककर आत्म बलिदान दे दिया। 1192 ई. की यह घटना वसंत पंचमी की है।
यह तिथि लाहौर (वर्तमान पाकिस्तान) के आठ वर्षीय वीर बालक हकीकत राय के अनूठे बलिदान से भी जुड़ी है जिसने बलिदान दे दिया, पर धर्म नहीं त्यागा। कहते हैं उसके भोले मुख को देखकर जल्लाद के हाथ से तलवार गिर गई थी। तब हकीकत ने तलवार उठाकर उसे थमाते हुए कहा कि जब मैं बच्चा होकर अपने धर्म का पालन कर रहा हूं, तो तुम बड़े होकर अपने धर्म से क्यों विमुख हो रहे हो? वसंत पंचमी गोहत्या के खिलाफ आंदोलन चलाने वाले गुरु रामसिंह कूका की भी याद दिलाती है। 1816 ई. में वसंत पंचमी के दिन लुधियाना के भैणी ग्राम में
जन्मी इस महान विभूति ने अंग्रेजों की सत्ता की चूलें हिला दी थीं। यह पावन तिथि महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की भी याद
दिलाती है। उनका जन्म वसंत पंचमी के दिन ही उन्नाव जिले में हुआ था। 
 
अस्तित्व का सृजनात्मक राग है वसंत
वसंत पर्व को अपने आध्यात्मिक बोध दिवस के रूप में मनाने वाले गायत्री महाविद्या के महापंडित युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य कहा करते थे, ‘‘वसंत मनुष्य की आभा का सर्वोत्तम प्राणकेंद्र है। वसंत का वास्तविक अर्थ है-अस्तित्व का सृजनात्मक राग। यह पर्व जीवन को उत्सव बनाना सिखाता है। यह पर्व धरती पर जीवन के नवोदय व अभ्युदय का एक अनूठा सुअवसर है, जिसका लाभ हर भावनाशील मनुष्य को उठाना ही चाहिए।’’ उनका कहना था कि इस युग में वसंत ऋतु हममें से हरेक से प्रश्न करना व जानना चाहती है कि मनुष्य से मनुष्य का, मनुष्य से समाज का तथा मनुष्य व समाज का प्रकृति से अलगाव आखिर हमें कहां ले जा रहा है? क्या हमारी नई विचार-प्रणाली ने हमारी जीवन जीने की कला विस्मृत कर दी है? यदि ऐसा है तो हमें फिर से अपने दोष देखने होंगे, उन्हें दूर करना होगा और अपने जीवन में ज्ञान, तप व प्रेम की महत्ता पहचाननी होगी।