मंदिर नहीं, अब बचे हैं बस खंडहर!

    दिनांक 16-फ़रवरी-2021
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मीम अलिफ हाशमी 
पाकिस्तान में लंबे समय से हिंदू समाज को निशाना बनाया जा रहा है। उनकी संस्कृति को मिटाने के लिए मंदिरों को ध्वस्त किया जा रहा है। इस परिस्थिति का संज्ञान अंतत: वहां के सर्वोच्च न्यायालय ने लिया है

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कराची के मनोरा में एक हजार साल पुराने श्री वरुणदेव मंदिर के एक हिस्से को शौचालय में बदल दिया गया है 
 
पाकिस्तान में हिंदू समाज के साथ उनकी संस्कृति को मिटाने की भी साजिश चल रही है। यह किसी का आरोप नहीं, बल्कि सचाई है और इस सचाई से पाकिस्तान का सर्वोच्च न्यायालय भी सहमत है। सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले दिनों एक सदस्यीय आयोग गठित कर यह पता लगाने का प्रयास किया था कि देश में हिंदू धर्मस्थलों की क्या स्थिति है? साफ है कि इसके परिणाम पाकिस्तान को शर्मसार करने वाले हैं।
आयोग की रिपोर्ट कहती है कि गिनती के कुछ मंदिरों को छोड़ दें तो लगभग सभी खंडहर में तब्दील हो चुके हैं। यह तब है, जब कि इमरान खान की पार्टी पीटीआई अल्पसंख्यकों के कल्याण और उत्थान के दावे की सीढ़ियां चढ़कर सत्ता में आई है।
पाकिस्तान में हिन्दुओं (अल्पसंख्यकों) के धर्मस्थलों के रख-रखाव की जिम्मेदारी इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ईटीपीबी) के पास है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित आयोग की रिपोर्ट आने के बाद सत्तारूढ़ दल के कुछ लोग झेंप मिटाने के लिए इस कोशिश में हैं कि मंदिरों की बदहाली का ठीकरा ईटीपीबी के अधिकारियों के सिर फोड़ दिया जाए, जबकि हकीकत इसके विपरीत है। पाकिस्तान की सत्ता की बागडोर चाहे किसी भी पार्टी के हाथ में हो, सबका रवैया अल्पसंख्यक विरोधी ही रहा है।
पाकिस्तान के सिंध प्रांत में सर्वाधिक हिंदू रहते हैं और इस प्रदेश में सत्ता इमरान खान की विरोधी पार्टी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के पास है। मगर अल्पसंख्यकों को सर्वाधिक निशाना सिंध में ही बनाया जा रहा है। वहां से आएदिन हिंदू लड़कियों के अपहरण, कन्वर्जन और जबरन निकाह की शिकायतें आती हैं। बलूचिस्तान में हाल ही में एक मंदिर को आग के हवाले कर ध्वस्त कर दिया गया था।
वैसे, हिंदुओं और हिंदू मंदिरों की बदहाली केवल सिंध में नहीं, पाकिस्तान के तकरीबन सभी हिस्सों में है। पाकिस्तान के चर्चित अखबार डॉन के मुताबिक, हिंदू मंदिरों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के सामने पेश की गई रिपोर्ट निराशाजनक तस्वीर प्रस्तुत करती है। आयोग के अध्यक्ष डॉ. शोहेब सुदाब कहते हैं कि चकवाल स्थित कटासराज मंदिर, मुल्तान स्थित प्रह्लाद मंदिर तथा हिंगलाज मंदिर (लसबेला) की हालत कुछ बेहतर है। बाकी लगभग सभी खंडहर में तब्दील हो चुके हैं।
1400 मंदिरों का रास्ता बंद किया
सिंध प्रांत के चर्चित कवि शाह अब्दुल लतीफ भित्तिई सूबे के लाकी शहर से किर्धर पर्वत तक 60 किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैली पर्वतमाला और प्राकृतिक झील के इर्दगिर्द फैले शिवालयोंं की निशानियां मिटने पर अपनी पीड़ा व्यक्त कर चुके हैं। फ्रांसीसी शोधकर्ता मिशेल बोइविन अपनी पुस्तक ‘सिंध हिस्ट्री एंड रिप्रेजेंटेशंस’ में लाकी के बारे में लिखा है कि पाकिस्तान के सिंध प्रांत का पूरा क्षेत्र कभी शिवमय हुआ करता था। बलूचिस्तान में हिंगलाज माता मंदिर तक तीर्थयात्रा करने वाले इधर से गुजरते समय इस इलाके में अपना काफी समय ध्यान, साधना और पूजा-पाठ में बिताते थे। पहाड़ों की गुफाओं में शिवभक्त साधु-संतों का डेरा हुआ करता था। चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांत के अनुसार, सातवीं शताब्दी में लाकी में 273 मंदिर थे, जिनमें से 235 केवल शिवजी के थे। 19वीं शताब्दी में इसे दुनिया के नक्शे पर लाने वाले ब्रिटिश विद्वान और यात्री रिचर्ड बर्टन की मानें तो पूरे विश्व में लाकी इकलौता स्थान था, जहां इतनी बड़ी संख्या में शिवालय हुआ करते थे। मगर यह सब इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह गया है। अब तक की पाकिस्तानी सरकारों की गलत नीतियों और बहुसंख्यकों की टेढ़ी नजरों के कारण लाकी के अधिकतर शिवालय एवं गुफाएं अवशेष में बदल चुके हैं। यहां तक पहुंचने का इकलौता रास्ता भी जर्जर और खतरनाक है। थोड़ी सी असावधानी किसी को मौत के मुंह में पहुंचा सकती है।
पाकिस्तान के ऐतिहासिक मंदिरों पर शोध करने वाली पत्रकार रीमा अब्बासी की मानें तो मंदिरोंं को देश की धरोहर न मानकर, इसे संकीर्ण नजर से देखने के चलते इनके बचे-खुचे अवशेष भी मिटने की कगार पर हैं। पाकिस्तान के संवदेनशील प्रांतों खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में अब गिनती के मंदिर और धर्मस्थल बचे हैं। लाहौर में केवल दो मंदिर हैं, जिनमें से एक का कपाट बंद रहता है। रीमा अब्बासी के शोध से खुलासा हुआ कि लाहौर में पिछले कुछ वर्षों में एक हजार मंदिर नेस्तोनाबूद किए गए हैं।
पाकिस्तान में कई मंदिरों का रास्ता ही बंद कर दिया गया है। यानी मंदिर में कोई जाना भी चाहे तो नहीं जा सकता। पाकिस्तान सरकार की अदूरदर्शिता के कारण यह नौबत आई है। भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद भारत जाने वाले हिदुआें की संपत्ति दस हजार रुपए की कीमत में देने की योजना 1961 में लागू किए जाने पर हिदुआेंं के धर्मस्थलों को तो इससे अलग रखा गया, मगर योजना में त्रुटि के चलते इनके आसपास की हिंदुओं की तमाम संपत्तियां दस-दस हजार रुपए में आवंटित कर दी गर्इं। इसके बाद हिदुआेंं के धर्मस्थलोंं के करीब मकान, गोदाम बना दिए गए और वहां जाने का रास्ता तक नहीं छोड़ा गया। रास्ता बंद कर देने से रावलपिंडी के पुराना बाजार स्थित 1929 में निर्मित यमुना देवी मंदिर में श्रद्धालु अनाज की बोरियों पर चढ़कर मंदिर की छत से अंदर जाते हैं। बीबीसी उर्दू की पत्रकार रहीं नुख्बत मलिक के मुताबिक, सबसे पहले ऐसा एक मामला 2015 में तब प्रकाश में आया जब खैबर पख्तूनख्वा के कर्क जिले के गांव टेरी स्थित हिंदुओं के परमश्रद्धेय परमहंस महाराज की समाधि के चारों ओर मकान बनाकर वहां पहुुंचने का रास्ता अवरुद्ध कर दिया गया। समाधि में एक कृष्ण मंदिर था। उसे तोड़ कर वहां इमारत खड़ी कर दी गई। समाधि के इर्दगिर्द मकान बनाने वालों में एक मुफ्ती इफ्तिखारुद्दीन का कहना है कि पाक सरकार की 1961 की योजना के तहत जमीन खरीदकर उसने यहां 1998 में मकान बनाया है। 1929 में परमहंस के स्वर्गवास के बाद तकरीबन प्रत्येक वर्ष देश-दुनिया के हिंदू उनकी समाधि के दर्शन करने आया करते थे। मगर रास्ता बंद होने से उनका यहां आना कम हो गया।
पाकिस्तान हिंदू परिषद के अध्यक्ष एवं नेशनल असेंबली के सदस्य रहे डॉक्टर रमेश ने इस मसले को सर्वोच्च न्यायालय और तमाम बड़े नेताओं के सामने उठाया, पर कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई। पाकिस्तान हिंदू काउंसिल का दावा है कि देश में ऐसे 1400 मंदिर और धर्मस्थल हैं, जहां तक पहुंचना अब संभव नहीं। इनके रास्ते बंद कर वहां गोदाम या पशु बाड़ा बना दिया गया है। पाकिस्तान के अखबार ‘डेली टाइम्स’ की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि कराची के मनोरा स्थित एक हजार साल पुराने प्रसिद्ध वरुण मंदिर के एक हिस्से को शौचालय में बदल दिया गया है। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप मेंं यह इकलौता और अति प्राचीन मंदिर है मगर इसकी दशा अब बेहद खराब है। पहले यहां प्रत्येक वर्ष लाल साईं वरुणदेव उत्सव मनाया जाता था। कई वर्षों से यह भी बंद है। पंजाब के चकवाल शहर से 30 किलोमीटर दूर कटासराज गांव के प्रसिद्ध शिव मंदिर के साथ भी यही कुछ हुआ। इसके इर्द-गिर्द के सारे भूखंड पर सीमेंट फैक्ट्रियों ने कब्जा कर लिया। साथ ही मंदिर की प्राकृतिक झील से पानी निकाल कर फैक्ट्रियों में इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके कारण झील सूखने के कगार पर है। हिंदुओं की ओर से इसके खिलाफ पाकिस्तान सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने पर मई 2020 में झील के पानी के दोहन पर रोक लगाकर सीमेंट फैक्ट्रियों के लिए पंजाब सरकार को वैकल्पिक व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए थे। मगर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का अनुपालन नहीं हुआ। स्थिति याथवत बनी हुई है। वहां के एक प्रभावी हिन्दू श्री जयराम कहते हैं, 1971 में सरकार ने ऐसी नीतियां अपनाईं कि देश से हिंदू संस्कृति ही मिट गई। अब यहां न शास्त्र पढ़ाये जाते हैं, न ही यहां कोई संस्कृत पढ़ाने वाला बचा है। वर्षों पूर्व सिंध प्रांत के स्कूलों में हिंदी शिक्षक नियुक्त करने की मांग उठाई गई थी, जिस पर आज तक अमल नहीं हुआ है।