किसान आंदोलन या राजनीतिक मोल-भाव!

    दिनांक 16-फ़रवरी-2021
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अनीता त्यागी
दिल्ली हिंसा के बाद पंजाबी किसान सिंधु व टीकरी बॉर्डर से कूच करने लगे और उनकी जगह भाकियू के विभिन्न धड़ों ने ले ली। आंदोलन में खापों की भूमिका भी बढ़ गई और हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन फिर से जोर पकड़ गया। भाकियू नेता राकेश टिकैत, ऋषिपाल अंबावत और गुरनाम सिंह चढूनी का प्रभाव आंदोलन में बढ़ गया है। राकेश टिकैत आंदोलन को लेकर सबसे ज्यादा मुखर हो रहे हैं।

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केंद्र सरकार द्वारा पारित तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ खड़ा हुआ किसान आंदोलन के पर्दे के पीछे खड़े राजनीतिक दलों का जिद बनता जा रहा है। गणतंत्र दिवस पर हुई शर्मनाक दिल्ली हिंसा के बाद कथित किसान आंदोलन का स्वरूप बदल गया है। किसान आंदोलन से पंजाब का प्रभाव कम हुआ है और हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसान नेता प्रभावी हो गए हैं। कहा जा सकता है कि अब किसान आंदोलन की कमान अब खापों ने संभाल ली है। भारतीय किसान यूनियन की अधिकतर किसान पंचायत यूपी और हरियाणा के जाट बाहुल्य क्षेत्रों में आयोजित हो रही है। इससे हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर सरकार के लिए भी यह आंदोलन मुसीबत बन गया है, क्योंकि जननायक जनता पार्टी (जजपा) के विधायकों का एक धड़ा कृषि कानूनों को वापस नहीं लेने पर समर्थन वापस लेने की धमकी दे रहा है।
आंदोलन में लहलहा रहे खालिस्तानी और माओवादी झंडे
यह किसान आंदोलन अपने आप में अनूठा है। केंद्र में भाजपा की प्रचंड बहुमत की सरकार बनने के बाद से हाशिये पर आए राजनीतिक दलों और संगठनों को यह किसान आंदोलन एक अवसर दिखाई दिया है। यही कारण है कि आंदोलन में खालिस्तानी और माओवादी झंडे खूब दिख रहे हैं और नक्सलियों व खालिस्तानियों की रिहाई के लिए जमकर नारेबाजी हो रही है। इससे किसान आंदोलन की मंशा पर सवालिया निशान लग रहे हैं। कांग्रेस, आप, सपा, रालोद जैसे दल भी किसान आंदोलन को प्रत्यक्ष समर्थन दे रहे हैं।

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किसान आंदोलन से पंजाबी प्रभाव हुआ कम
26 जनवरी की ट्रैक्टर परेड के किसान आंदोलन के टूटने के कयास लग रहे थे। अचानक भारतीय किसान यूनियन ने आंदोलन को फिर से चलाने का ऐलान कर दिया। इससे पहले, किसान आंदोलन पर पंजाब के किसान संगठनों का कब्जा था। दिल्ली हिंसा के बाद पंजाबी किसान सिंधु व टीकरी बॉर्डर से कूच करने लगे और उनकी जगह भाकियू के विभिन्न धड़ों ने ले ली। आंदोलन में खापों की भूमिका भी बढ़ गई और हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन फिर से जोर पकड़ गया। भाकियू नेता राकेश टिकैत, ऋषिपाल अंबावत और गुरनाम सिंह चढूनी का प्रभाव आंदोलन में बढ़ गया है। राकेश टिकैत आंदोलन को लेकर सबसे ज्यादा मुखर हो रहे हैं।
राजनीतिक मोलभाव पर जोर
भाकियू नेता राकेश टिकैत की राजनीतिक महत्वाकांक्षा किसी से छिपी नहीं है। वह उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर जनपद की खतौली विधानसभा सीट और 2014 में अमरोहा लोकसभा सीट पर रालोद के हैंडपंप पर चुनाव लड़ चुके हैं। चर्चा है कि किसान आंदोलन के सहारे वह फिर से अपने राजनीतिक समीकरण टटोल रहे हैं। राकेश टिकैत लगातार हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट बाहुल्य क्षेत्रों में अपनी किसान पंचायत कर रहे हैं। इसमें रालोद का साथ भी मिल रहा है। इससे 2022 के यूपी चुनावों में राजनीतिक मोलभाव होने की संभावना ज्यादा बन रही है।
हरियाणा सरकार पर बढ़ रहा दबाव
यह किसान आंदोलन हरियाणा की राजनीति के लिए बहुत अहम है। करनाल में किसानों ने मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का हेलीकॉप्टर नहीं उतरने दिया और सभा का मंच तोड़ दिया था। इस पर भाजपा ने अपनी किसान पंचायतें स्थगित कर दी। अब भाजपा के साथ सत्ता में साझीदार जजपा विधायकों ने भी कृषि कानूनों को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चैटाला पर भी भाजपा सरकार से समर्थन वापस लेने का दबाव पड़ रहा है। जजपा विधायक जोगीराम सिहाग तो खुलकर कृषि कानूनों को वापस लेने की बात कह चुके हैं। निर्दलीय विधायक सोमवीर सांगवान सरकार से पहले ही समर्थन वापस ले चुके हैं। ऐसे में जजपा नेतृत्व के कदम पर सभी की निगाहें लगी हुई है।
एमएसपी की मांग कर रहे दुष्यंत चैटाला
जजपा प्रमुख व हरियाणा की डिप्टी सीएम दुष्यंत चैटाला किसान आंदोलन की ताकत को समझ रहे हैं, लेकिन वह अभी अपने पत्ते नहीं खोल रहे। दुष्यंत कह चुके हैं कि वह डिप्टी सीएम रहने तक एमएसपी दिलाने के लिए काम करते रहेंगे। अगर एमएसपी नहीं दिला पाया तो इस्तीफा दे दूंगा। इस बयान के बाद से हरियाणा की राजनीति में हलचल मची हुई है। कांग्रेस और इनेलो के नेता भी किसान आंदोलन को लेकर जजपा प्रमुख पर सवाल उठा रहे हैं। दुष्यंत चैटाला किसान आंदोलन की प्रतिविधियों पर लगातार निगाह रखे हुए हैं और अपने 10 विधायकों को भी सहेजकर रखने की कोशिश कर रहे हैं। बताया जाता है कि वह लगातार अपनी पार्टी के विधायकों के संपर्क में हैं और उनके आक्रोश को कम करने की कोशिश में लगे हैं।
कांग्रेस लगातार डाल रही है डोरे
हरियाणा में भाजपा को 90 में से 40 सीटों पर जीत हासिल हुई और वह बहुमत से कुछ दूर रह गई। इस पर जजपा के 10 और 7 निर्दलीयों के समर्थन से मनोहर लाल खट्टर सरकार बन गई। अब बदली परिस्थितियों में कांग्रेस ने अपने प्रयास तेज कर दिए हैं। विधानसभा में कांग्रेस के 31 विधायक है। जबकि हरियाणा लोकहित पार्टी और इनेलो के पास एक-एक विधायक है। कांग्रेस की मंशा जजपा को भाजपा से अलग करके अपने पाले में करने की है, जिससे वह हरियाणा की सत्ता पर फिर से काबिज हो सकें। उसने निर्दलीय विधायकों, लोकहित पार्टी व इनेलो से भी संपर्क साधा है। चर्चा है कि कांग्रेस हरियाणा में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भी ला सकती है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अभी तक भाजपा मजबूत
किसान आंदोलन से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी राजनीतिक खलबली मची हुई है। अभी तक वेस्ट यूपी में भाजपा मजबूत है। अब किसान आंदोलन के बाद से सपा, कांग्रेस, रालोद के नेता लगातार सक्रिय है। इससे भाजपा नेतृत्व बेचैन हो गया है। बागपत, बिजनौर, मथुरा की किसान पंचायतों में उमड़ी भीड़ से भाकियू व रालोद नेता गदगद है तो भाजपा नेताओं में बेचैनी है। ऐसे में भाजपा ने हालात संभालने के लिए जाट समुदाय से आने वाले केंद्रीय मंत्री डॉ. संजीव बालियान, क्षेत्रीय अध्यक्ष मोहित बेनीवाल, प्रदेश के पंचायती राज मंत्री भूपेंद्र सिंह समेत नेताओं को लगाया है।