जाफर का एजेंडा क्या?

    दिनांक 16-फ़रवरी-2021
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प्रवीण सिन्हा
 
पूर्व भारतीय क्रिकेटर एवं उत्तराखंड क्रिकेट संघ ( सीएयू ) के प्रशिक्षक पद से इस्तीफा दे चुके वसीम जाफर ने खेल की आड़ में मजहब विशेष को ऊपर रखने की चाल चली। लेकिन जब संघ ने जाफर की चाल नाकाम कर दी तो आनन-फानन में उन्होंने प्रशिक्षक पद से इस्तीफा देकर भारतीय क्रिकेट को कलंकित करने की कोशिश की

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सोशल मीडिया पर पूर्व भारतीय क्रिकेटर वसीम जाफर की जमकर आलोचना हो रही है। वसीम जाफर ने उत्तराखंड टीम को मजहबी गतिविधियों के बल पर दोफाड़ करने की एक घटिया चाल चली। फिर प्रशिक्षक के तौर पर अपनी मनमर्जी की टीम की मांग रख दी और जब उत्तराखंड क्रिकेट संघ (सीएयू) ने जाफर की चाल नाकाम कर दी तो आनन-फानन में उन्होंने प्रशिक्षक पद से इस्तीफा देकर भारतीय क्रिकेट को कलंकित करने की कोशिश की।
नियमों को रखा ताक पर
दरअसल, उत्तराखंड क्रिकेट संघ ने वसीम जाफर को 45 लाख रुपए की भारी-भरकम राशि पर प्रशिक्षक के तौर पर अनुबंधित किया था। सीएयू के सचिव महिम वर्मा ने बताया कि वसीम जाफर अपनी चलाने के चक्कर में कई बार संघ के अधिकारियों से भिड़े। इसके अलावा जाफर ने अपनी पसंद के मेहमान खिलाड़ी के तौर पर इकबाल अब्दुल्ला, समद सल्ला और जय बिस्टा को टीम में शामिल किया। इसके बाद हद तो तब हो गई जब उन्होंने एक निश्चित तौर-तरीके से चलने वाले क्रिकेट संघ पर अपनी मर्जी की टीम थोपने की कोशिश की, जबकि नियमित कप्तान कुणाल चंदेला की जगह इकबाल अब्दुल्ला को जबरदस्ती कप्तान बना दिया। वसीम जाफर ये सारी हरकतें एक सोची-समझी रणनीति के तहत कर रहे थे। खेल संघों में राजनीति होती है, अपनी पसंद की टीम तैयार करने की भी कोशिश की जाती है लेकिन उसकी एक सीमा होती है। जाफर ने तो सारी हदें लांघते हुए टीम और सीएयू पर अपनी बातें जबरदस्ती थोपने की कोशिश की।
बस मजहब से मतलब लगा था प्रभाव
प्राप्त जानकारी के अनुसार जाफर प्रशिक्षण शिविर के दौरान मौलवियों को बुलाते थे। उन मौलवियों की मैदान पर क्या जरूरत है, इस बाबत पूछने पर वह अधिकारियों को बताते थे कि मौलवी नमाज अता करने आए हैं। अब प्रशिक्षक जाफर के साथ मौलवियों की मौजूदगी का प्रभाव भी दिखने लगा और देखते ही देखते टीम का नारा बदलकर ‘गो उत्तराखंड’ कर दिया। इस मामले में वसीम जाफर ने बताया कि टीम में चूंकि सभी मत-पंथ के खिलाड़ी हैं, इसलिए नारे ‘रामभक्त हनुमान’ और ‘जय’ को हटाकर ‘गो उत्तराखंड’ कर दिया। अब, इस कट्टरपंथी वसीम जाफर को कौन समझाए कि देश ने कितने ही महान मुसलमान खिलाड़ी दिए हैं, लेकिन किसी भी खेल में मजहब के हिसाब से न तो नारा बदला गया, न राष्ट्रगान में शामिल होने में विभिन्न मत-पंथ के खिलाड़ियों ने आनाकानी की, न खान-पान में कोई भेद रखा, न टीम की वर्दी में किसी प्रकार के बदलाव की कोई वकालत की और न ही बदमिजाज पाकिस्तानी खिलाड़ियों की तरह भारतीय खिलाड़ियों या अधिकारियों ने किसी मजहब विशेष का प्रचार-प्रसार करने की जरूरत समझी। इसके बावजूद जाफर ने लंबी दाढ़ी रखकर कठमुल्लापन दिखाने की हिम्मत क्यों जुटायी? भारत जैसे पंथनिरपेक्ष राष्ट्र में मजहब को आगे रख खेल को पीछे करने की इजाजत कभी भी किसी को नहीं मिल सकती है।
टीम के चयन में मनमानी
वसीम जाफर ने टीम को मजबूत करने की दिशा में संभवत: अपनी पसंद के कुछ खिलाड़ियों को टीम में शामिल किया। लेकिन हर तरह के समर्थन के बावजूद सीएयू के सचिव महिम वर्मा और मुख्य चयनकर्ता रिजवान शमशाद एक सीमा के बाद प्रशिक्षक वसीम जाफर की मनमानी बर्दाश्त नहीं कर पाए। मुश्ताक अली ट्रॉफी में एक नई टीम होने के नाते उत्तराखंड टीम से किसी तरह के करिश्मे की उम्मीद नहीं की जा रही थी। इसके बाद विजय हजारे ट्रॉफी के लिए जैसे ही कुणाल चंदेला के नेतृत्व में उत्तराखंड टीम की घोषणा की गई, वसीम जाफर ने अगले दिन इस्तीफा दे दिया। जाफर की प्रतिक्रिया स्पष्ट कर रही थी कि उनके कहे अनुसार इकबाल अब्दुल्ला को टीम की कप्तानी क्यों नहीं सौंपी गई और ओपनर चंदेला के करिअर को तबाह करने के लिए उसे निचले क्रम पर बल्लेबाजी के लिए क्यों नहीं भेजा। इस तरह के तानाशाही रवैये को बर्दाश्त करने का मतलब है कि भारतीय क्रिकेट को पीछे ले जाकर इसे पूरी तरह से नष्ट कर दिया जाए। ऐसा भारत में तो संभव नहीं है। 
 
साम्प्रदायिकता के दलदल में भारतीय क्रिकेट!
भारतीय क्रिकेट को साम्प्रदायिकता के दलदल में धकेलने और कठमुल्लेपन को बढ़ावा देने के प्रयास को महज एक शब्द ‘शर्मनाक’ से ही परिभाषित किया जा सकता है। विश्व खेल जगत में दशकों से खिलाड़ियों को इस्लाम की ओर आकर्षित करने और उनका कन्वर्जन करने का सिलसिला चलता आ रहा है। चाहे कैशियस क्ले ने मजहब कन्वर्जन कर अपना नाम मोहम्मद अली (महान मुक्केबाज) रख लिया या पाकिस्तानी क्रिकेट में बने रहने के भय से यूसुफ योहाना का नाम मोहम्मद यूसुफ हो गया।
देश के सबसे समृद्ध, व्यवस्थित और सफल खेल संघ भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के अंदर आज तक ऐसी हरकत देखने को नहीं मिली है। क्रिकेट मैदान पर छिपपुट नोकझोंक के अलावा आज भी कहीं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से टीम को मजहबी दायरे में बांधने की कोशिश नहीं की गई है। अगर इसे ‘जेंटलमैन्स गेम’ कहा गया है तो इसकी लाज आज तक रखी गई है।
हां, पाकिस्तानी टीम में ऐसा जरूर देखा गया है कि इंजमाम उल हक, यूसुफ मोहम्मद, शाहिद अफरीदी और सईद अनवर (देखें लिंक-https://youtu.be/cmvKQ_70pjk or https://twitter.com/i/status/1359377061157117957) से खिलाड़ी खुलकर इस्लाम को बढ़ावा देने की कोशिश करते दिखे। इस दौरान, पाकिस्तान के क्रिकेटर दानिश कनेरिया और बांग्लादेश के लिटन दास को जबरदस्त मानसिक प्रताड़ना दी गई। लेकिन ऐसी हरकतें पाकिस्तान जैसे मजहबी कट्टर देश में संभव है। लेकिन भारत में ऐसा न कभी हुआ है और न कभी होगा। देश में मोहम्मद शाहिद, जफर इकबाल, असलम शेर खान, मंसूर अली खान पटौदी, सैयद किरमानी, मोहम्मद अजहरुद्दीन, मोहम्मद कैफ, जहीर खान, मोहम्मद शमी और सानिया मिर्जा जैसे तमाम महान खिलाड़ी हुए हैं, उन्होंने बिना किसी झुकाव के देश का नाम रोशन किया है। समृद्ध परंपराओं वाले देश भारत में वसीम जाफर जैसी ओछी हरकतों को कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है।