‘उनका’ नाम उछला तो मामला दबा दिया

    दिनांक 16-फ़रवरी-2021
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मीडिया का एक वर्ग खबरों को ‘अपनों’ और ‘परायों’ में तोलकर पेश करता है सबके सामने

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मीडिया की स्वतंत्रता अब ऐसा बहाना बन गया है जिसकी आड़ में जो मर्जी किया जा सकता है और कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। यहां तक कि ट्विटर और फेसबुक जैसी विदेशी कंपनियां भी चाहती हैं कि उन्हें वही विशेषाधिकार मिलें जो किसी मीडिया संस्थान के पास होते हैं। 26 जनवरी को लालकिले पर हुई हिंसा के बाद जांच एजेंसियों ने उन ट्विटर अकाउंट की पहचान की, जिनसे अफवाह और फर्जी खबरें फैलाई गई। लेकिन ट्विटर उन्हें बंद नहीं करेगा, क्योंकि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विपरीत है, जबकि उसी ने डोनाल्ड ट्रंप का ट्विटर अकाउंट बंद कर दिया था, क्योंकि उसके अनुसार ट्रंप की बातों से हिंसा फैलने की आशंका थी। यह एक अलग तरह का साम्राज्यवाद है, जिसका खतरा भारत जैसे लोकतांत्रिक राष्ट्र पर मंडरा रहा है। ट्विटर और फेसबुक ने सामान्य लोगों को अपनी बात अभिव्यक्त करने का माध्यम दिया है। ऐसे किसी मंच का निष्पक्ष होना बहुत जरूरी है, पर ट्विटर और फेसबुक दोनों पर ही विध्वंसकारी वामपंथी विचार वाले बीते कुछ वर्ष में हावी हो चुके हैं। वे भारत में अराजकता फैलाकर इसे अपने मनमुताबिक राजनीतिक परिवर्तन का औजार बनाना चाहते हैं।
वामपंथ का यह अंतरराष्ट्रीय गठजोड़ लगातार भारत पर हमले कर रहा है। अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की भांजी मीना हैरिस ने किसान आंदोलन के संदर्भ में कई ट्वीट किए। इनमें हिंदू धर्म के लिए उनका पूर्वाग्रह साफ देखा जा सकता है। जब कुछ प्रसिद्ध लेखकों और विचारकों ने इस दुष्प्रचार का जवाब दिया तो टाइम्स आॅफ इंडिया अखबार ने उनके लिए ‘ट्रोल’ यानी निरर्थक बातें करने वाली उपमा का प्रयोग किया। जो वामपंथी मीडिया अपने लिए अभिव्यक्ति की निरंकुश स्वतंत्रता चाहता है, वह अपने विचार व्यक्त करने पर सामान्य लोगों के लिए अपमानजनक शब्द प्रयोग करने में संकोच नहीं करता। यहां तक कि लता मंगेशकर और सचिन तेंडुलकर जैसी महान विभूतियों को भी नहीं बख्शा गया। भारत विरोधी दुष्प्रचार पर लता और सचिन ने जो ट्वीट किए उन पर महाराष्ट्र की शिवसेना-कांग्रेस-राकांपा सरकार ने जांच के आदेश दे दिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दिन-रात रोना रोने वाले मीडिया संस्थानों को इसमें कुछ विशेष समस्या नहीं दिखाई दी। अभिव्यक्ति की ऐसी ही निरंकुश स्वतंत्रता की आड़ लेकर कई तथाकथित हास्य कलाकार अपना काम कर रहे हैं। मुनव्वर फारुकी नामक एक कट्टरपंथी के समर्थन में कई अखबारों ने लेख लिखे और चैनलों ने कार्यक्रम दिखाए। जिस तरह के आरोपों में उसकी गिरफ्तारी हुई थी, वैसे ही आरोप बेंगलुरु हिंसा के समय गिरफ्तार नवीन पर भी लगे थे, पर सेकुलर मीडिया ने उसका समर्थन नहीं किया था। किसी चैनल या अखबार ने उसका पक्ष दिखाने की आवश्यकता भी नहीं समझी थी।
एनडीटीवी ने खबर दिखाई कि मध्य प्रदेश के मंदसौर में अनुसूचित जाति के एक दूल्हे को घोड़ी पर बैठकर बारात ले जाने से रोका गया। चैनल ने इसे इस तरह लिखा, जिससे यह जातीय भेदभाव का मामला लगे। इसके लिए उसने पीड़ित की तो जाति बताई, लेकिन आरोपियों की जाति छिपा ली। बाद में पता चला कि आरोपी सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग के ही हैं। देश में सामाजिक भेदभाव की घटनाएं आज भी होती हैं, पर एनडीटीवी जैसे कुछ मीडिया संस्थान सामान्य आपराधिक घटनाओं को भी जातीय रंग देने के लिए कुख्यात रहे हैं। वे ऐसा इसलिए करते हैं ताकि समाज में विभाजन पैदा किया जा सके और ईसाई मिशनरियां उसका फायदा उठाकर कन्वर्जन करा सकें। मंदसौर में ही अनुसूचित जाति की दो अवयस्क बालिकाओं के यौन शोषण की घटना भी हुई। चूंकि सभी आरोपी मुसलमान थे, अत: एनडीटीवी और अन्य सेकुलर मीडिया ने इसे तूल नहीं दिया।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की आईआईटी में पढ़ने वाली बेटी के साथ आॅनलाइन ठगी हुई। उसने कोई सोफा बेचने के लिए लगाया था, लेकिन कुछ ठगों ने उसके खाते से पैसे निकाल लिए। कई मीडिया संस्थानों ने यह समाचार दिया, लेकिन कुछ घंटे के अंदर ही लगभग सभी ने इसे हटा दिया। फिर यह प्रश्न उठा कि मुख्यमंत्री के सरकारी आवास का सोफा भी सरकारी ही रहा होगा, उसे बेचा क्यों जा रहा था? अगर सब ठीक है तो क्या यह समाचार जनता तक नहीं जाना चाहिए ताकि लोगों में ऐसी आॅनलाइन ठगी को लेकर जागरुकता आए। किसी मीडिया संस्थान ने समाचार हटाने का कारण स्पष्ट नहीं किया।