पर कतरना जरूरी!

    दिनांक 17-फ़रवरी-2021   
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भारत विरोधी रुख को पोसने और भारत सरकार को आंखें दिखाने वाला रवैया ऐसा है जिसमें संप्रभुता को परोक्ष चुनौती की गूंज है।क्या ट्विटर के बिना भारत का काम नहीं चल सकता! क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर भारत को तकनीकी परतंत्रता के पिंजरे में कैद किया जाएगा?
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जब देश में कथित किसान आंदोलन की आड़ में भारत को अस्थिर करने के लिए नफरत के शोले भड़काए जा रहे थे उस वक्त ट्विटर इस आग में पैट्रोल छिड़कने का काम कर रहा था।
एक फरवरी को कृषि बिलों के उन्मादी विरोध से जुड़े करीब सौ ट्विटर खातों और 150 ट्वीट को आपत्तिजनक सामग्री के चलते ‘ब्लॉक ’ किया गया। इतना ही होता तो ठीक था किन्तु देर शाम इन उकसाऊ खातों को फिर से बहाल कर दिया गया।
#ModiPlanningFarmerGenocide के माध्यम से फैलाए जा रहे भड़काऊ संदेशों को लेकर केंद्र सरकार की ओर से बार-बार निर्देश दिए जाने और चेताने के बावजूद सोशल मीडिया दिग्गज कंपनी का अक्खड़ रुख हैरान करने वाला था।
लोकतंत्र में संवाद और विमर्श के सार्वजनिक मंचों से निष्पक्षता की आशा रखी जाती है, किन्तु हाल के उदाहरण बताते हैं कि फेसबुक-ट्विटर जैसे ‘सोशल मीडिया आॅक्टोपस’ संवाद के माध्यम भर न रहकर संवाद के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक आयामों को निचोड़ते हुए तंत्र और प्रक्रियाओं पर भी हावी हो जाने का सपना देख रहे हैं।
चंद दिनों पहले विश्व के सबसे पुराने लोकतंत्र ने तकनीक के इस अपमानकारी डंक का अनुभव किया था जब ट्विटर ने निवर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति का खाता निलंबित कर दिया था। अब इस कंपनी ने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की प्रभुसत्ता को झकझोरा है।
फरवरी के पहले सप्ताह तक सरकार 1100 से अधिक घृणा फैलाने वाले उपद्रवी खातों की सूची ट्विटर को सौंप चुकी थी।
हालांकि भारत विरोधी विमर्श को फैलाने-गरमाने, राष्ट्रीय विचार को दबाने के आरोप नए नहीं थे, किन्तु ताजा प्रकरण भारत सरकार के लिए झटके से जागने जैसा था।
ट्विटर की हेकड़ी की सरकार ने कसकर खबर ली। सूचना प्रसारण मंत्रालय और ट्विटर अधिकारियों के बीच वार्ता में कंपनी को यह साफ कर दिया गया कि कंपनी के नियम-कायदे भारतीय लोकतंत्र और संविधान से बढ़कर नहीं हैं।
अमेरिका के कैपिटल हिल में उपद्रवियों पर कड़ी कार्रवाई करने वाली कंपनी जब भारत में उपद्रवी तत्वों के पाले में खड़ी दिखी और खुद इसके प्रमुख भारत विरोधी ट्वीट पसंद करते उजागर हुए तो केंद्र सरकार ने इस दोमुंहे व्यवहार पर कंपनी को आईना दिखा दिया।
ट्विटर आनाकानी करता रहा लेकिन उसके तेवर ढीले जरूर पड़े। सरकार द्वारा दी गई सूची के एक हिस्से पर कार्रवाई भी की गई।
विदेश में भारत विरोधी उपद्रव की केंद्रीकृत रचना, इसके लिए विदेशी हस्तियों द्वारा ‘साझा टूलकिट’ के प्रयोग और प्रपंच के जरिए खड़े किए गए ‘मैन्यूफैक्चर्ड आंदोलन’ का खेल अब दुनिया के सामने साफ हो गया है।
लेकिन ट्विटर का ढीला पड़ना समस्या का उपचार नहीं है। सरकार द्वारा दी गई सूची पर आंशिक कार्रवाई, इसके कर्ताधर्ताओं का भारतीय संविधान और देश की एकता को ललकारना ऐसी बातें हैं जिनका स्थाई निदान किया जाना चाहिए।
हमारी इंद्रधनुषी संस्कृति में विविधता को विभाजक रेखाओं की तरह देखने और देश के विरुद्ध इसका इस्तेमाल करने वाले तत्व ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ के चोगे में हमने देखे थे। फेसबुक-ट्विटर भी निहित स्वार्थों वाली विदेशी कंपनियां ही हैं, इस तथ्य की कैसे उपेक्षा की जा सकती है!
भारत विरोधी रुख को पोसने और भारत सरकार को आंखें दिखाने वाला रवैया ऐसा है जिसमें संप्रभुता को परोक्ष चुनौती की गूंज है।
क्या ट्विटर के बिना भारत का काम नहीं चल सकता! क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर भारत को तकनीकी परतंत्रता के पिंजरे में कैद किया जाएगा?
क्या तकनीक के घोड़े पर सवार होकर भारत विरोधी शक्तियां स्वतंत्रता और स्वछंदता के बीच का बारीक अंतर मिटाकर लोकतंत्र और संस्कृति को रौंद डालेंगी?
ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो समाज को मथ रहे हैं। वर्तमान भारतीय जनतंत्र में ‘तंत्र’ का मन इसके ‘जन’ से अलग होगा, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती।