आतंकी निशाने पर हजारा समुदाय

    दिनांक 17-फ़रवरी-2021
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एस. वर्मा
 
बलूचिस्तान का हजारा समुदाय सिलसिलेवार आतंकी हमलों और सरकार की उपेक्षा के कारण क्षेत्र से पलायन कर रहा है। इसके कारण जनवरी से अब तक क्षेत्र की करीब 200 कोयला खदानें बंद हो चुकी हैं
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बलूचिस्तान की कोयला खदानों में काम करने वाले हजारा समुदाय के 11 लोगों को अगवा करने के बाद गोली मार कर उनकी हत्या कर दी गई (फाइल चित्र) 
 
बलूचिस्तान के खदान क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर मजदूरों का पलायन जारी है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार अब तक बलूचिस्तान की कोयला खदानों में काम करने वाले हजारों मजदूर नौकरी छोड़ चुके हैं, जबकि 11 हजारा मजदूरों की हत्या के बाद बीते एक माह में बड़ी संख्या में हजारा श्रमिक प्रांत से पलायन कर गए हैं।
इस साल जनवरी की शुरुआत में बंदूकधारियों ने बलूचिस्तान की पहाड़ियों से 10 हजारा श्रमिकों को अगवा करने के बाद गोली मार कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया था। श्रमिक संगठनों और अधिकारियों का मानना है कि इस हत्याकांड के बाद से करीब 15,000 श्रमिकों ने काम पर आने से इनकार कर दिया। इस कारण करीब 200 कोयला खदानें बंद हो गई और उत्पादन में बड़ी गिरावट आई है।
अफगानिस्तान का शरणार्थी और सीमांत हजारा समुदाय पाकिस्तान में आर्थिक कार्यबल का बड़ा हिस्सा हैं, लेकिन सरकार ने कभी इनके जानो-माल की सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं दी। हजारा शिया समुदाय हमेशा से ही कट्टरपंथी इस्लामी आतंकी समूहों के निशाने पर रहे हैं। 1977 में जिया-उर-रहमान के सत्ता में आने और अफगानिस्तान के मुजाहिदीन युद्ध के बाद आतंकियों के इन्हें प्रताड़ित करने के मामले बढ़े हैं। 11 सितंबर, 2001 को अमेरिका में आतंकी हमले के बाद बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में 2001 पूडगली चौक नरसंहार के साथ हजारा समुदाय को पूरी तरह खत्म करने का एक सिलसिला शुरू हुआ, जिसे तालिबान, सिपाह-ए-सहाबा, लश्कर-ए-झांगवी जैसे इस्लामी आतंकी संगठनों द्वारा नियमित रूप से अंजाम दिया जाता रहा है। जनरल परवेज मुशर्रफ के शासन काल में जिहादी समूहों के खात्मे के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते कुछ आतंकी संगठनों ने खुद को अहल-ए-सुन्नत वल जमात और तुलनात्मक रूप से नवगठित पाकिस्तान राह-हक पार्टी जैसे राजनीतिक मोर्चों के तौर पर संगठित किया। इसके अगले दशक में पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर शिया आबादी के विरुद्ध हिंसा की घटनाएं बढ़ीं।
2013 की शुरुआत में क्वेटा में सिलसिलेवार बम विस्फोटों में हजारा समुदाय के लगभग 165 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। इस तरह के हमलों में 2004 से लेकर अब तक 2,000 से अधिक हजारा मारे जा चुके हैं। अकेले क्वेटा में 2012 से 2017 तक 500 से अधिक हजारा आतंकी हमलों में मारे गए।
महत्वपूर्ण बात यह है कि इन हमलों के विरुद्ध पाकिस्तान की फौज का रवैया उपेक्षापूर्ण ही रहा है। अप्रैल 2018 में हजारा समुदाय को निशाना बनाकर किए गए आतंकी हमले के विरोध में जब इस समुदाय ने भूख हड़ताल की तो सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने उनके जानो-माल की सुरक्षा का आश्वासन दिया था। लेकिन इस आश्वासन के एक साल के भीतर ही क्वेटा के हजारागंजी इलाके में हजारा समुदाय को निशाना बनाकर एक बम विस्फोट किया गया, जिसमें कम से कम 20 लोग मारे गए और 48 घायल हो गए। यह केवल सुरक्षा में चूक नहीं थी। अगर गहराई से देखें तो बलूचिस्तान में राष्ट्रवादियों को प्रताड़ित करने में फौज आतंकी संगठनों का सहयोग करती नजर आती है। इनके विरुद्ध फौज द्वारा कार्रवाई की बात ही बेमानी है। इस इलाके के आतंकी समूह नियमित रूप से खदान मालिकों और श्रमिकों का अपहरण कर उनसे फिरौती वसूलते हैं। जब उन्हें फिरौती की रकम नहीं मिलती वे इसी तरह घातक हमले करते हैं।
हजारा समुदाय के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि एक ओर तो उन्हें आतंकियों से अपनी जान को खतरा है, वहीं इस इलाके की मौजूदा स्थिति भी उनके लिए गंभीर बनी हुई है। बड़ी संख्या में कोयला खदानें बंद होने के कारण खनिकों, सुरक्षाकर्मियों समेत चालकों, सहायकों जैसे अन्य कर्मचारियों के सामने रोजगार का संकट उत्पन्न हो गया है। यहां तक कि उनके पास रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने और एक वक्त के भोजन के लिए भी पैसे नहीं हैं। इसके बावजूद पाकिस्तान सरकार उनकी सुध नहीं ले रही। लिहाजा, जीवनयापन के लिए वे इस क्षेत्र से पलायन कर रहे हैं।