मन, चित्त व हृदय पर वैदिक-आधुनिक विमर्श

    दिनांक 17-फ़रवरी-2021
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प्रो. भगवती प्रकाश 
आधुनिक विज्ञान अब यह स्वीकार करने लगा है कि हृदय वास्तव में चेतना, मन, बुद्धि, स्मृति, वृत्ति, इच्छा, अभिरुचि और अन्य प्रवृत्तियों का आश्रय है। हजारों साल पहले हमारे मनीषियों ने इसका विवेचन कर दिया था

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हृदय केवल रक्त संचार व धड़कनों का नियमन ही नहीं करता, बल्कि यह चित्त व मन के रूप में स्मृतियों, वृत्तियों, व्यक्तित्व के लक्षणों आदि का संग्राहक भी है। 
आधुनिक विज्ञान हृदय को रक्त संचार का केंद्र मानता रहा है। अब वह भी वेदों व अन्य प्राचीन ग्रंथों की भांति हृदय को चेतना, मन, बुद्धि, स्मृति, वृत्तियों, इच्छाओं, अभिरुचियों और अच्छी-बुरी प्रवृत्तियों का प्रेरक व धारणा शक्ति का आश्रय मानने लगा है।
अमेरिकी पब्लिक हेल्थ सर्विस, नेशनल हार्ट, लंग एंड ब्लड इंस्टीट्यूट, एरिजोना विश्वविद्यालय में प्रोफेसर गैरी श्वार्ट्ज व लिंड रुसेक, हवाई विश्वविद्यालय में प्रोफेसर पॉल पियर्सन, डेनिस व प्रोफेसर ब्रुस लिप्टन, सेल्यूलर बायोफिजिक्स- मिनर्वा केंद्र व क्लीव बैकस्टर के प्रयोगों के अनुसार स्मृति हृदयगत व मस्तिष्कगत होने के साथ विविध जैविक प्रणालियों एवं कोशिकाओं की भी साझी निधि है। इसी कारण हृदय प्रत्यारोपण के उपरान्त हृदय प्राप्तकर्ताओं के व्यक्तित्व, रुचि व प्रवृत्तियों में ऐसे परिवर्तन व उन स्मृतियों का प्रादुर्भाव हो जाता है जो कभी हृदय के दाता में रही होंगी। हृदयगत स्मृति व ‘सेल्युलर मेमोरी’ हस्तांतरण के चार प्रकार हैं- एपिजेनेटिक मेमोरी, डीएनए मेमोरी, जेड मेमोरी और प्रोटीन मेमोरी।
हृदय प्रत्यारोपण में दाताओं की स्मृतियों का अंतरण- स्वाद, पसंद व रुचि: क्लेयर सिल्विया हृदय प्रत्यारोपण बाद बीयर, मिर्च व केएफसी नगेट्स पसंद करने लगीं, क्योंकि हृदय दाता टिम एल. बीयर, हरी मिर्च और केएफसी नगेट्स पसंद करता था। संगीत व वायलिन प्रेमी श्याम किशोरी का दिल प्राप्त करने के बाद एक 47 वर्षीय फाउंड्री कार्यकर्ता शास्त्रीय संगीत व वायलिन पसंद करने लग गया।
प्राप्तकर्ता में हृदय दाता की हत्या की स्मृति: हत्या की शिकार एक लड़की का हृदय जिस व्यक्ति में प्रत्यारोपित हुआ, उसने सुराग (समय, हथियार, जगह, कपड़े) देकर लड़की के हत्यारों को पकड़वाया।
हृदय में भी स्मृतियों, रुचियों व व्यक्तित्व के लक्षणों का संग्रह: गैरी श्वार्ट्ज के अनुसार, हृदय में ‘फीडबैक लूप्स’ सूचना और ऊर्जा को संग्रहीत करते हैं। गियाना एब्सटी व हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के अनुसार भी स्मृतियां एवं व्यक्तित्व के लक्षण, हृदय में संग्रहीत होते हैं व कोषिकागत स्मृति संग्रह एक सतत प्रक्रिया है।
प्राचीन वाङ्मय के अनुसार हृदय बुद्घि व स्मृति संग्राहक: प्राचीन वैदिक व संस्कृत ग्रंथों में हृदयगत चेतना व स्मृति का प्रचुर विमर्श है। जैसे- हृदय शब्द निर्वचन: हृदय=ह् हरणे+दुक्+कयन् (उणादिकोश 04/100) पर महर्षि दयानंद ने लिखा है- हरति विषयानिति हृदयं मनो वा अर्थात् जो विषयों को ग्रहण करता है, वह हृदय यानी मन कहलाता है। महर्षि ने यहां हृदय को रक्त संचार यंत्र नहीं, सीधा मन बताया है। ‘अमरकोश’ के अनुसार- ‘चित्तन्तु चेतो हृदयं स्वान्त हृन्मानसं मन:।’ अर्थात् चेतस् हृदय, स्वांत, हृत् मानस और मन, ये सब एकार्थक हैं।
हृदय निर्णयात्मिका बुद्धि का आश्रय: स यथा सर्वेसामपां समुद्र एकायतनमेवं...सर्वेषां संकल्पानां मन एकायतनमेवं सर्वासां विद्यानां हृदयमेकायतनम्...।। (बृह. 2/4/11)
अर्थ: जल के आश्रय समुद्र की भांति सारे संकल्पों का आयतन अकेला मन और विद्याओं का धारक हृदय है। बुद्धि में ही सारी विद्याएं समाविष्ट हैं, इसलिए यहां ‘हृदय’ से ‘बुद्धि’ ही अभिप्रेत है।
तम एव यस्यायतनं हृदयं लोका मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मन: परायणं स वै वेदिता स्या द्याज्ञवल्क्य। वेद वा अहं तं पुरुषं सर्वस्यात्मन: परायणं यमात्थ य एवायं छायामय: पुरुष:। (बृहदा. 3/1/14)
शाकल्य कहते हैं कि हृदय, बुद्घि एवं ज्ञान का स्थान व मन इंद्रियों की प्रेरक व प्रकाशक ज्योति, ममता व अपनत्व का आश्रय है।
वेदों में हृदय-चर्चा
अथर्ववेद: इमानि यानि प्चेन्द्रियाणि मन:षष्ठानि में हृदि ब्रह्मणा संशितानि। यैरेव ससृजे घोरं तैरेव शान्तिरस्तु न:॥ (19/9/4)
अर्थात् पांच इंद्रियां और छठा मन मेरे हृदय में है, जिनसे घोर पाप भी संभव हैं, उनसे हमारे लिए शांति का सृजन हो। यहां पुन: मन का आशय ‘हृदय’ व बुद्घि से है, जिसमें अन्त:करण भी संयुक्त हैं।
यजुर्वेद: सुषारथिरष्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयते भीशुभिर्वाजिन इव। हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मन: शिवसङ्कल्पमस्तु॥ (36/6)
अर्थात् मन मनुष्यों को विषयों में बार-बार उसी प्रकार ले जाता है, जैसे अच्छा सारथी रथ के घोड़ों को ले जाता है, वह हृदय में स्थित मन कभी वृद्ध या शिथिल नहीं होकर मन को सदा कल्याणकारी संकल्पवान करे। यहां मन को हृदय यानी बुद्धि में स्थित बताया है।
ऋग्वेद: हृदा तष्टेषु मनसो जवेषु यद्ब्राह्मणा: संयजन्ते सखाय:।
अत्राह त्वं वि जहुर्वेद्याभिरोहब्रह्माणो विचरन्त्यु त्वे॥ (10/71/8)
अर्थात् हृदय स्थित बुद्धि और मन के संवेगों से वैदिक ज्ञान प्राप्त कर अज्ञान को त्यागने एवं अपनी तर्क क्षमता से हम ज्ञान प्राप्त करते हैं। यहां पुन: हृत् (हृदय) से बुद्धि अभिप्रेत है।
‘यन्मे छिद्रं चक्षुषो हृदयस्य मनसो वातितृण्णं बृहस्पतिर्मे तद्दातु। शं नो भवतु भुवनस्य यस्पति:। (यजुर्वेद 36/2)
अर्थ: हमारे नेत्र व हृदय की न्यूनताएं ही हमारी उन्नति में बाधक होती हैं। अत: परमेश्वर हमारे नेत्रों व हृदय की न्यूनताओं को दूर करें।
चरक व सुश्रुत ने भी लिखा है- ‘चेतना स्थानमुत्तमम्’ अर्थात् यह (हृदय) चेतना का उत्तम आश्रय है। आज की कोशिकागत स्मृति के अनुसंधानों के अनुरूप इन आचार्यों ने सारे शरीर को भी चेतना का स्थान कहते हुए हृदय को चेतना का मुख्य स्थान बता कर हृदय को आत्मा का स्थान भी कहा है। हृदय अन्त:करण-चतुष्ट्य से युक्त है, जिसमें मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार का वास होता है, इन चारों के विकार रहित होने पर ही हम मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार के सदुपयोग से ही इच्छित उद्देश्य प्राप्त कर सकेंगे।
उपनिषदों का मत: उपनिषदों में भी हृदय का अर्थ बुद्धि लिया गया है, यथा: ‘हृ’ से ज्ञान को ग्रहण करना। ‘द’ से मन द्वारा कर्मेन्द्रियों को आदेश व जीवात्मा को ज्ञान देना और ‘यम्’ से अपनी निश्चयात्मक वृत्ति की सक्रियता है। इस प्रकार ‘हृदयम्’ के 3 अर्थ हैं - रक्त यंत्र, मन व बुद्धि। (बृह. 5/3/1/कण्डिका)
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिता:।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ह्मम समश्नुते॥ (कठोपनिषद 6/14)
हृदय में विद्यमान कामनाओं के छूट जाने पर मनुष्य अमर होकर ब्रह्मानन्द में लीन व जीवनमुक्त हो जाता है। यहां हृदय को मन का वाचक व कामनाओं का आश्रय बताया गया है।
यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थय:।
अथ मर्त्याेऽमृतो भवत्येतावद्घ्यनुशासनमम्॥ (कठो. 6/15)
जब हृदय की ग्रंथियां (गांठे) खुल जाती हैं, तब मनुष्य अमर हो जाता है। संस्कारों तथा अविद्या की गांठें मन के ही एक भाग चित्त में हैं, जहां हृदय शब्द चित्त का वाचक है।
काम: सङ्कल्पो विचिकित्सा श्रद्घाऽश्रद्घधृतिरधृति र्हेधी र्भीरित्ये तत्सर्वं मन एव। अर्थात् कामनाएं, संकल्प, संशय, श्रद्धा, अश्रद्धा, धैय, अधीरता, लज्जा, बुद्धि, भय यह सब मन ही है।
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिता:।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते॥ (कठोपनिषद्)
मनुष्य के हृदय की सारी कामनाएँ नष्ट हो जाने पर यह मरणार्मा मनुष्य मुक्त हो मुक्ति को प्राप्त करता है। श्रीमद्भगवद्गीता (8/12) में कहा है- मन को संयमपूर्वक हृदय में स्थित करें। यथा:
‘सयंक्य मनो हृर्द निरूध्य च’ (गीता 8/12)
ब्राह्मण ग्रंथ: मन का स्थान हृदय प्रदेश है। यथा- ‘मनो भूत्वा हृदय प्रविषन्म्रत्युरपानो भूत्वा।’ (ऐतरेय ब्राह्मण 1/2/4)
निष्कर्ष: इस प्रकार हृदय की रक्त संचार व धड़कनों के नियमन में भूमिका के अतिरिक्त चित व मन के रूप में स्मृतियों, वृत्तियों व्यक्तित्व के लक्षणों आदि का संग्राहक होने का हमारे प्राचीन ग्रंथों में कई सहस्राब्दी पूर्व ही विवेचन कर दिया था, जिसकी स्वीकारोक्ति व उस पर अनुसंधान अब विज्ञान भी कर रहा है।
(लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति हैं)