जब संकट में पड़े तकनीक तब क्या कीजै

    दिनांक 17-फ़रवरी-2021
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बालेन्दु शर्मा दाधीच 
आने वाले दौर में कृत्रिम मेधा से संचालित होने वाली तकनीकों को लेकर एक धर्मसंकट खड़ा हो सकता है। अब इंसान के काम को सरल बनाने वाली तकनीकों को लेकर कुछ नियम-कायदे बनाना वक्त की जरूरत है
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पिछले दिनों मेरे किशोर पुत्र ने पूछा कि अगर आमने-सामने दो भवनों में आग लगी हो और उनमें से एक स्थान पर आपके परिवार का कोई व्यक्ति अकेला फंसा हो जबकि दूसरी में चार-पांच अपरिचित व्यक्ति फंसे हों तो आप किसे बचाएंगे? जवाब देते समय यह भी ध्यान रखें कि आपके पास जितना समय उपलब्ध है, उसमें आप किसी एक स्थान पर ही लोगों को ही बचा सकते हैं। मैंने उत्तर दिया कि जहां अधिक लोग फंसे हैं, उन्हें ही बचाऊंगा। इस पर उसने जवाबी सवाल दागा-अगर सामने आपका बेटा हो तो भी आप ऐसा करेंगे? मैंने उत्तर दिया कि बेटा, सचमुच बहुत जटिल प्रश्न है और संभवत: इसका उत्तर भी उन्हीं क्षणों में निर्धारित होगा।
पुत्र के सवाल ने मुझे धर्मसंकट में डाल दिया था। इसी से मिलता-जुलता प्रश्न एक तकनीकी संदर्भ में भी विचारणीय है। आज प्रौद्योगिकीय मेधा और मानवीय मेधा के बीच अंतर सिकुड़ रहा है। अनेक मामले कृत्रिम मेधा या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तर्क क्षमता और निर्णय क्षमता से निर्भर हो रहे हैं। यदि ऐसी ही स्थिति कभी प्रौद्योगिकी के सामने आई तो वह किस तरह से व्यवहार करेगी? एक व्यावहारिक और दिलचस्प उदाहरण स्वचालित वाहनों से जुड़ा है।
क्या ऐसे वाहनों के सामने भी कभी ऐसा ही धर्मसंकट आ सकता है? क्यों नहीं? जब प्रौद्योगिकी इंसानों की तरह सीखने लगी हो, इंसानों जैसे ही काम करने लगी हो, उनकी ही तरह बर्ताव करने लगी हो तो ऐसे हालात जरूर आ सकते हैं जब उन्हें इंसानों की तरह बहुत जटिल फैसला भी करना पड़े। मिसाल के तौर पर अगर किसी सड़क से गुजरते समय मार्ग में पांच लोग एक साथ सड़क पार कर रहे हैं तो यह कार क्या करेगी? इसका कार की गति इतनी तेज है कि वह रुक नहीं सकती, हद से हद तेजी से घूमने की कोशिश करके अपनी लेन बदल सकती है।
आ गया ना प्रौद्योगिकी के सामने धर्मसंकट? अब यह कार क्या करे? क्या वह इन पांच लोगों को कुचल कर आगे बढ़ जाए या फिर घूम कर लेन बदल ले जहां सिर्फ एक शख्स सड़क पार कर रहा है ताकि पांच की बजाए एक ही व्यक्ति मारा जाए? या फिर वह सड़क छोड़कर फुटपाथ पर चढ़ जाए जहां पर दो लोग खड़े बतिया रहे हैं? एक सवाल यह भी है कि क्या वह पांच, दो या एक बाहरी व्यक्ति को मारने की बजाए सड़क किनारे की दीवार से टकरा जाए जिससे कार के भीतर बैठे व्यक्ति की मौत हो जाए बनिस्वत बाहर मौजूद बहुत सारे लोगों के? भविष्य में जब स्वचालित कारें आम हो जाएंगी तो उनके सामने भी इसी तरह के सवाल आकर खड़े हो जाएंगे जो आज सड़कों पर वाहन चलाते इंसानों के सामने आते हैं और इनका जवाब एक सेकेंड के भी बहुत छोटे हिस्से में पाना होता है।
इस सवाल के बहुत सारे जवाब हो सकते हैं। कुछ साल पहले मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट आॅफ टेक्नॉलॉजी ने इसी धर्मसंकट पर एक सर्वे किया था जिसमें 233 देशों के लाखों लोगों ने हिस्सा लिया। सर्वे में पूछे गए सवालों के करीब चार करोड़ जवाब दिए गए। सर्वे के निष्कर्ष नेचर पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं। इनसे पता चला है कि अलग-अलग देशों के लोग इस सवाल पर अलग-अलग ढंग से सोचते हैं। यह सवाल 'ट्रॉली प्रॉब्लम' के नाम से मशहूर है। इसमें और सवालों के साथ-साथ एक सवाल यह भी था कि अगर कार के सामने एक लेन में 80 साल की बुजुर्ग महिला और दूसरी लेन में दो साल का बच्चा हो तो वह उनमें से किसे कुचलकर आगे बढ़ेगी? कुछ देशों में लोगों ने महिला के पक्ष में जवाब दिया और कुछ में बच्चे के पक्ष में जवाब आया। महिला के पक्ष में जवाब देने वाले एशियाई देशों के लोग थे जहां पर बुजुर्गों के प्रति ज्यादा सम्मान देखा जाता है। बच्चे के पक्ष में राय देने वाले पश्चिमी देशों के लोग ज्यादा थे जहां पर पारिवारिकता या सामूहिकता की प्रवृत्ति कम है और व्यक्ति-आधारित विचार ज्यादा प्रभावशाली होते हैं। चूंकि आने वाले समय में इंसानों जैसा काम करने वाली कारों और दूसरी तकनीकों को भी इस तरह के फैसले करने पड़ेंगे इसलिए उनमें भी इसी तरह की सोच की झलक देखने को मिलेगी।
एक अहम सवाल यह है कि जहां कोई इंसान अपनी कार के सामने आने वाली स्थिति के हिसाब से मौके पर सही फैसला कर सकता है वहीं कार के फैसले की कई परिस्थितियां हो सकती हैं। पहली यह कि उसमें पहले से ही फीड किया गया हो कि वह ऐसी स्थिति में किसकी जान लेगी। दूसरे, वह पुराने मामलों का विश्लेषण करते हुए उसी समय निर्णय ले। तीसरे, वह दूसरी कारों की कंप्यूटिंग प्रणालियों के साथ संपर्क करके निर्णय ले। चौथी, इस बारे में कोई स्पष्ट दिशानिर्देश पहले से बना लिए जाएं जिनका पालन उस कार को करना अनिवार्य हो। पांचवें, जो प्रोग्रामर या तकनीकी लोग स्वचालित कारों की टेक्नॉलॉजी को विकसित कर रहे हैं, उनके अपने विचार इन कारों के फैसलों को प्रभावित करें। मसलन, ये लोग अगर एशिया के हैं तो कार अलग ढंग से सोचे और अमेरिका के हैं तो अलग ढंग से। जाहिर है, स्थिति आसान नहीं होगी।
आपको याद होगा कि मशहूर विज्ञान कथा लेखक इसाव असिमोव ने रोबोट्स के बारे में कुछ मशहूर नियम बनाए थे। इनमें से पहला नियम यह था कि रोबोट को कुछ भी ऐसा नहीं करना है जिसकी वजह से किसी इंसान की जान चली जाए। दूसरा यह कि उसे अपने मालिक का हर हुक्म मानना है लेकिन तभी जब वह पहले नियम के खिलाफ न जाता हो। तीसरा नियम था कि रोबोट हर हाल में अपनी रक्षा करेगा, बशर्ते यह बात पहले दो नियमों के विपरीत न जाती हो। बाद में उन्होंने एक चौथा नियम भी जोड़ा था कि अगर इंसानों को बचाने की स्थिति आई तब रोबोट निष्क्रिय नहीं रहेगा बल्कि यह पक्का करने की कोशिश करेगा कि उन्हें कोई नुकसान न पहुंचे। संभवत: स्वचालित कारों के लिए भी इसी तरह के कुछ नियम बनाने होंगे जिनका वे पालन करेंगी।
कुछ और दिलचस्प स्थितियां जो उनके सामने आएंगी, वे इस तरह की हो सकती हैं-क्या दुर्घटना की स्थिति आने पर ये कारें जानवरों के ऊपर इंसानों को वरीयता देंगी? पुरुषों और महिलाओं के बीच वे किसे चुनेंगी? इसी तरह स्वस्थ और बीमार, ऊंचे सामाजिक दर्जे वालों तथा निचले सामाजिक दर्जे वाले लोगों, हस्तियों और सामान्य व्यक्तियों, अपराधियों और सामान्य व्यक्तियों, कार के बाहर वाले लोगों तथा कार के भीतर बैठे लोगों में से किसे बचाने की कोशिश की जाएगी? कृत्रिम मेधा के दौर में इन सवालों के जवाब अभी से ढूंढे जाने की जरूरत है।
लेकिन फिर से कई सवाल हमारे सामने आकर खड़े हो जाते हैं। मान लीजिए, कारों के लिए दिशानिर्देश तय किया जाता है कि पांच लोगों को मार डालने की बजाए वे कार के भीतर बैठे एक व्यक्ति की जान ले लें और कार को इस तरह से ठोक दें कि कोई बाहरी व्यक्ति मारा न जाए। लेकिन तब शायद इन कारों को कोई खरीदेगा भी नहीं। आखिरकार कौन व्यक्ति होगा जो यह चाहेगा कि वह अपनी जान जोखिम में डाले? फिर एक बड़ा धर्मसंकट यह है कि फैसला लेने की प्रक्रिया कैसे बनाई जाए। क्या फैसला लेने में कार में बैठे व्यक्ति की कोई भूमिका नहीं होगी? आखिरकार वही एकमात्र शख्स है जो मौके पर मौजूद है और वही एकमात्र शख्स है जो अन्य परिस्थितियों में ऐसे मामलों में निर्णय लेने का अधिकारी था। सर्वे में 44 फीसदी लोगों ने यही कहा कि कोई ऐसा रास्ता ढूंढा जाना चाहिए कि यात्री को फैसला करने या फिर फैसले को प्रभावित करने का अधिकार हो। हालांकि 33 फीसदी लोगों ने कहा कि फैसला सरकारें या जन-प्रतिनिधि करें और 12 फीसदी लोगों ने कहा कि यह निर्णय कार निर्माता कंपनी पर छोड़ दिया जाए। आप क्या सोचते हैं?    (लेखक सुप्रसिद्ध तकनीक विशेषज्ञ हैं)