धमक कमल की

    दिनांक 17-फ़रवरी-2021   
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भाजपा अब सही मायने में पंजाब में सक्रिय हुई है। अकाली दल के साथ गठबंधन टूटने के बाद यह पहला मौका है जब भाजपा ने स्थानीय चुनावों में 60 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे हैं। भाजपा कार्यकर्ता अत्यन्त उत्साहित हैं और इन चुनावों के लिए पूरे दमखम से जुटे हैं
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पंजाब में होने वाले स्थानीय चुनावों में इस बार नतीजे आश्चर्यजनक हो सकते हैं 
 
पंजाब में 14 फरवरी को स्थानीय निकाय चुनाव होने जा रहे हैं। 8 नगर निगमों और 109 नगर परिषदों में होने वाले चुनाव को अगर 2022 के विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। वैसे तो इन चुनावों में नया कुछ नहीं है, पर ऐसी संभावना बनती दिख रही है कि भाजपा राज्य के राजनीतिक पंडितों को चौंका सकती है। ऐसा इसलिए कि एक ओर जहां किसान आंदोलन के कारण राजनीतिक परिदृश्य भाजपा बनाम शेष में तब्दील हो रहा है, वहीं कट्टरपंथियों के भाजपा पर किए जा रहे हमलों से जनता की सहानुभूति पार्टी के साथ होती दिखाई दे रही है। किसान आंदोलन के चलते पंजाब में भाजपा के ‘जट्टवाद’ के खिलाफ आवाज बनकर उभरने से दलित वर्ग में भी भाजपा के प्रति आकर्षण पैदा होता दिख रहा है। इससे कार्यकर्ताओं में उत्साह है, जिसे देखते हुए भाजपा सूबे में 60 प्रतिशत सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार चुकी है, जो अकाली दल (बादल) से संबंध विच्छेद के बाद सबसे अधिक है। जब अकाली दल के साथ गठबंधन था, तब तक भाजपा मात्र 20 प्रतिशत वार्डों पर ही उम्मीदवार उतारती थी। भाजपा के प्रदेश सचिव डॉ. सुभाष शर्मा के अनुसार, अब यह आंकड़ा रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच चुका है और पार्टी 2,308 में से 1,235 वार्डों में अपने घोषित व समर्थित उम्मीदवार उतार चुकी है।
सिख गुरुओं ने जात-पात का चाहे जितना भी विरोध किया, लेकिन पंजाब जातिवाद से मुक्त नहीं हो पाया। जातिवाद के चलते ही यहां ‘जट्टवाद बनाम दलित सम्मान’ की प्रतिद्वंद्विता हर क्षेत्र में देखी जा सकती है। बसपा के संस्थापक कांशी राम के मन में ‘तिलक तराजू और तलवार...’ के खिलाफ जो राजनीतिक वैमनस्य था, उसे इसी ‘जट्टवाद’ का प्रतिकार कहा जा सकता है, क्योंकि कांशी राम पंजाब के ही मूल निवासी थे और कहीं न कहीं इसी जातिवादी अहं से प्रभावित भी। पंजाब में दलित ही नहीं, बल्कि अरोड़ा व महाजन सिख भी ‘जट्टवाद’ से पीड़ित रहे हैं।
दिल्ली की सीमा पर चल रहे कथित किसान आंदोलन के अधिकतर आंदोलनकारी जट्ट समाज से ही हैं, जो अपनी मांगें मनवाने की बजाए अपने जातिवादी अहं की पुष्टि करते नजर आ रहे हैं। इस कथित आंदोलन के प्रति केंद्र की भाजपा सरकार का जो रुख रहा है, उससे जट्टवाद से पीड़ित वर्गों, विशेषकर दलितों को लगने लगा है कि भाजपा ही इस जातिगत अहंकार से लोहा ले सकती है। जट्टवाद के खिलाफ 1992 में दलितों को बसपा में आसरा दिखाई दिया। इसी कारण बसपा 105 सीटों पर चुनाव लड़ी और 17.59 प्रतिशत मत हासिल कर 9 सीटें जीतने में सफल रही। 1996 के लोकसभा चुनाव के दौरान दलितों ने बसपा को 3 सांसद भी दिए, परंतु पार्टी आलाकमान द्वारा समय-समय पर कभी अकाली दल तो कभी कांग्रेस के घोषित-अघोषित समर्थन के चलते दलितों का बसपा पर से विश्वास उठने लगा जो आज अपने निम्नतम स्तर पर है। 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा को केवल 1.59 प्रतिशत मतों से संतोष करना पड़ा और नेतृत्व के अभाव में दलित फिर से बिखरे-बिखरे दिखाई दिए।
पंजाब की राजनीति और राजनीतिक दल सदैव जट्टवाद से प्रभावित रहे हैं। राज्य में जट्ट होना मुख्यमंत्री बनने की अघोषित रूप से पहली शर्त माना जाता है। यही कारण है कि आज पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष चौधरी सुनील कुमार जाखड़, मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, आम आदमी पार्टी (आआपा) के प्रदेशाध्यक्ष भगवंत सिंह मान, अकाली दल बादल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल तथा अधिकतर सांसद व मंत्री जाट सिख हैं। भाजपा अपने ‘सबका साथ-सबका विकास’ सिद्धांत पर चल कर न केवल प्रदेश में वैकल्पिक नेतृत्व दे रही है, बल्कि जट्टवादी अहंकार से लोहा लेती भी दिख रही है और यही बात दलितों को आकर्षित कर रही है। दिल्ली में आंदोलनकारी किसानों से वार्ता के दौरान केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, रेल मंत्री पीयूष गोयल के साथ-साथ केंद्रीय राज्यमंत्री सोम प्रकाश भी शामिल रहते हैं जो पंजाब की सुरक्षित लोकसभा सीट होशियारपुर से सांसद हैं। किसान वार्ताकारों की जिद पंजाब में दलित सम्मान से टकराती भी दिखती है और इसके चलते अगर दलित भाजपा के पाले में एकजुट हो जाएं तो किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए।
गणतंत्र दिवस के दिन लाल किले पर देश का अपमान और कथित किसान आंदोलन के चलते पंजाब में हुए हुड़दंग के कारण भी शहरी मतदाता आंदोलनकारियों के साथ-साथ इसके समर्थक कांग्रेस और अकाली दल से नाराज दिखाई दे रहे हैं। आंदोलन के नाम पर राज्य में रेल सेवा प्रभावित करने, रास्ते बाधित करने, मोबाइल टावर तोड़ने, कामकाज ठप होने और भाजपा के कार्यक्रमों में व्यवधान डालने जैसी घटनाओं से शहरी मतदाता आक्रोशित हैं। अगर भाजपा इन मुद्दों को उठाती है तो इन चुनावों में वह वास्तव में चौंका सकती है।
विश्लेषक चाहे अकाली-भाजपा गठबंधन खत्म होने को राजग के राजनीतिक नुकसान के रूप में आंक रहे हों, परंतु धरातल की वास्तविकता यह है कि भाजपा के कार्यकर्ता इससे खुश हैं। गठबंधन के कारण राज्य के बड़े हिस्से में भाजपा नेताओं को चुनाव लड़ने का अवसर नहीं मिलता था और न ही उनकी सुनवाई होती थी। राजनीतिक हिस्सेदारी के नाम पर भाजपा पंजाब में लोकसभा की तीन और विधानसभा की 23 सीटों पर सिमट गई। लेकिन अब भाजपा के सामने खुला मैदान है। यही सब देखते हुए पार्टी ने स्थानीय निकाय चुनाव के लिए 60 प्रतिशत सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े कर दिए हैं। पार्टी ने यह कारनामा तब कर दिखाया है, जब कथित किसान आंदोलनकारियों द्वारा भाजपा के कार्यकर्ताओं को हर स्तर पर डराया-धमकाया जा रहा है। पंजाब में स्थानीय चुनाव के परिणाम चाहे कुछ भी आएं, पर प्रदेश में भाजपा पूरे जोश के साथ सक्रिय है, जिसे भविष्य के लिए शुभ संकेत माना जा सकता है। स्वाभाविक है कि स्थानीय निकाय चुनावों के प्रदर्शन के आधार पर भविष्य में विधानसभा और लोकसभा चुनावों के लिए प्रत्याशियों का भविष्य तय होने वाला है। बदली हुई परिस्थितियों में अगर भाजपा सबको चौंकाती है तो इस पर बहुत आश्चर्य नहीं होना चाहिए।