फ्लॉप शो रहा रेल रोको कार्यक्रम, खतरे में आया आंदोलनजीवियों का अस्तित्व

    दिनांक 19-फ़रवरी-2021
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-अनिता त्यागी
18 फरवरी को रेल रोको कार्यक्रम का ऐलान हुआ था, तो तभी किसान नेताओं को हकीकत का अहसास हो गया था। उन्हें रेल रोको अभियान के सफल होने पर संदेह होने लगा था। पंजाब- हरियाणा से लेकर दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि राज्यों में रेल रोको अभियान खास असर नहीं दिखा सका। हरियाणा में तो ट्रेनों को नहीं रूकने देने की अपनी रणनीति में रेलवे पूरी तरह से कामयाब रहा। ऐसे में ट्रेन रोकने के आंदोलनकारियों के मंसूबे नाकामयाब हो गए।

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कृषि कानूनों का विरोध करते-करते किसान संगठन अब भाजपा का सीधा विरोध करने लगे हैं। दिलचस्प यह है कि इस कवायद में किसान आंदोलन का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। 18 फरवरी का रेल रोको कार्यक्रम केवल आंदोलन को जिंदा रखने की कवायद भर रहा। इसका कोई खास असर रेलवे पर नहीं दिखा। पहले ही ज्यादा किसान संगठनों ने इस रेल रोको कार्यक्रम से अपनी असहमति जता दी थी। हालात को भांपकर भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) ने भी केवल सांकेतिक आंदोलन करने का ऐलान कर दिया था। इससे साफ है कि किसान आंदोलन का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है।
आंदोलन को प्रासंगिक बनाने को तरह-तरह के टोटके
बड़े जोर-शोर से कृषि कानूनों के विरोध में किसान आंदोलन का आगाज हुआ था। पंजाब और हरियाणा के किसानों के बढ़ते वर्चस्व के बीच पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान संगठन भाकियू ने भी गाजीपुर बॉर्डर पर धरना शुरू किया। चूंकि गत 26 जनवरी को दिल्ली में लालकिले पर हुई हिंसा के बाद किसान आंदोलन ने लोगों की सहानुभूति खो दी थी, जिसके बाद से अब बस कहने के लिए आंदोलन को फिर से खड़ा किया जा रहा है, जो बदलते दिन के साथ लगातार न केवल कमजोर हो रहा है, बल्कि किसान आंदोलन अब अपनी प्रासंगिकता भी खो रहा है। यही कारण है कि आंदोलन को जिंदा रखने के लिए किसान संगठन तरह-तरह के टोटके आजमा रहे हैं। कभी चक्का जाम की बात होती है तो कभी पैदल मार्च की बात करते हैं। अब रेल रोको कार्यक्रम में भी उन्हें मुंह की खानी पड़ी है।
रेल रोको कार्यक्रम का नहीं दिखा खास असर
लंबे-चौड़े दावों के बीच गत 18 फरवरी को रेल रोको कार्यक्रम का ऐलान हुआ था, तो तभी किसान नेताओं को हकीकत का अहसास हो गया था। उन्हें रेल रोको अभियान के सफल होने पर संदेह होने लगा था। पंजाब- हरियाणा से लेकर दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि राज्यों में रेल रोको अभियान खास असर नहीं दिखा सका। हरियाणा में तो ट्रेनों को नहीं रूकने देने की अपनी रणनीति में रेलवे पूरी तरह से कामयाब रहा। हरियाणा से गुरुवार को 60 ट्रेनों को गुजरना था। ऐसे में 44 स्थानों पर पटरी पर जमे आंदोलनकारियों से बचने को ट्रेनों को पहले ही बड़े स्टेशन पर रोक दिया गया। ऐसे में ट्रेन रोकने के आंदोलनकारियों के मंसूबे नाकामयाब हो गए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, गाजियाबाद, हापुड़ में भी आंदोलनकारी अपने मंसूबे में कामयाब नहीं हो पाए।
किसान संगठनों में सुनाई दे रहे असहमति के सुर
आंदोलन को जिंदा रखने के लिए किसान संगठन तरह-तरह के फार्मूले अपना रहा है। संयुक्त किसान मोर्चा का रेल रोको कार्यक्रम इसी कड़ी का हिस्सा था। ऐसे कार्यक्रम घोषित होने से किसान संगठनों में ही असहमति के सुर उठने लगे हैं। संयुक्त किसान मोर्चा के ऐलान के बाद भाकियू नेता राकेश टिकैत ने कहा कि सांकेतिक रूप से ही ट्रेनें रोकी जाएंगी। इंजन पर फूल-माला चढ़ाने के साथ चालक को फूल दिया जाएगा। यात्रियों को जलपान कराया जाएगा। स्थानीय लोग ही अपने-अपने क्षेत्रों में ट्रेन रोकने का काम करेंगे। आंदोलन को महत्व देने के लिए राकेश टिकैत ने कहा कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य बंद ट्रेनों को शुरू करवाना है।
गिरफ्तारी से बचने को किसान जा रहा आंदोलन
किसान आंदोलन का कोई असर नहीं होता देखकर अब किसान संगठन सम्मान बचाने के फार्मूले पर काम कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक पुष्पेंद्र कुमार का कहना है कि कई किसान नेताओं पर गंभीर धाराओं में दर्ज मुकदमों में गिरफ्तारी की तलवार लटकी हुई है। ऐसे में आंदोलन चलाकर ये किसान नेता गिरफ्तारी से बचने को आंदोलन तेज किया जा रहा है, जिससे पुलिस दबाव में आ जाए। लंबे-चौड़े बयान भी इसी नीति का हिस्सा है।
वार्ता की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे किसान संगठन
गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में शर्मनाक हिंसा के बाद किसान आंदोलन सहानुभूति खो चुका है। केंद्र सरकार ने किसी भी कीमत पर कानून वापस लेने का ऐलान पहले ही किया हुआ है। ऐसे में किसान संगठन अब सरकार से वार्ता की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहे हैं। पहले ही किसान नेताओं की हठधर्मिता के कारण 12 दौर की वार्ता विफल हो चुकी है। अब नए सिरे से वार्ता की पेशकश भी नहीं कर पा रहे। केवल मंचों से भाषण देने में लगे हैं।
साफ होती जा रही वामपंथी ब्रिगेड की साजिश
पहले भी किसान आंदोलन को वामपंथी ब्रिगेड की उपज बताया जा रहा था। अब जांच आगे बढ़ने से सबकुछ साफ हो रहा है कि किस तरह से वामपंथी ब्रिगेड ने इसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की साजिश रची। वामपंथी नेता योगेंद्र यादव समेत कई कम्युनिस्ट नेता पहले ही किसान आंदोलन की ज़ुबान बने हुए थे तो रेल रोको कार्यक्रम में पूर्व सांसद सुभाषिनी अली भी सक्रिय हुई। टूलकिट कांड में पहले ही वामपंथी कार्यकर्ताओं को पकड़ा जा चुका है। इससे साफ है कि किसान आंदोलन पूरी तरह से वामपंथी षड्यंत्र था। जनता भी इस सच्चाई को पहचान रही है।
कनाडा से भी लग रही फटकार
किसान आंदोलन समर्थन देने पर अब विदेशी लोगों को विदेशों से ही फटकार मिल रही है। कनाडा के कुछ सिख सांसदों की बयानबाजी के बीच कनाडा के भारतीय मूल के सांसद रमेश सिंह संधा ने वहां के सिख सांसदों को खरी-खोटी सुनाई है। उन्होंने कनाडाई संसद में सीधे आरोप लगाए कि कुछ सिख सांसद भारत के खिलाफ अपने एजेंडे पर काम कर रहे हैं। ये सभी खालिस्तानियों का समर्थन कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर भारत के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप करना है।
लगातार घटती जा रही प्रदर्शनकारियों की संख्या

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सिंधु, टीकरी और गाजीपुर बॉर्डर पर चल रहे धरनों में प्रदर्शनकारियों की संख्या में फिर से गिरावट आने लगी है। इसे बढ़ाने के लिए किसान नेता दिन-रात एक किए हुए हैं, लेकिन इसमें सफल नहीं हो रहे। गाजियाबाद के यूपी गेट पर धरने पर बैठे आंदोलनकारियों की संख्या कम हो रही है। रेल रोको आंदोलन के नाम पर भी कुछ प्रदर्शनकारी धरने से गायब हो गए। धरने में शामिल रहे कुछ लोगों का साफ कहना है कि अब इस तरह के धरने का कोई मतलब नहीं है। आम किसान इससे नहीं जुड़ रहा तो अब आंदोलन करने का कोई तुक नहीं।
राजनीतिक दल हाईजेक कर रहे आंदोलन
कहने के लिए किसान संगठनों ने अपने आंदोलन से राजनीतिक दलों को दूर किया हुआ है, लेकिन अब आंदोलन को कांग्रेस, सपा, रालोद, आम आदमी पार्टी जैसे दलों ने हाईजेक कर लिया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने अपनी किसान चौपाल शुरू कर दी है, जिसमें पार्टी नेत्री प्रियंका गांधी वाड्रा भाग ले रही है। रालोद नेता जयंत चैधरी भी किसान पंचायत करते जा रहे हैं। अब आप सुप्रीमो व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी मेरठ में किसान पंचायत का ऐलान किया है। सपा मुखिया अखिलेश यादव भी किसानों को लुभाने में जुटे हैं।
गांव-गांव चक्कर काट रहे भाकियू नेता
अपने आंदोलन में भीड़ घटने से परेशान भाकियू नेता गांव-गांव चक्कर काटने लगे हैं। बालियान खाप के चौधरी व भाकियू अध्यक्ष नरेश टिकैत ने लोगों को आंदोलन से जोड़ने के लिए अपने गांव सिसौली में पंचायत बुला रहे हैं। इसके साथ ही बागपत, शामली, बिजनौर, मुजफ्फरनगर, बुलंदशहर, मथुरा जनपदों के गांवों में जाकर आंदोलन को सार्थक बनाने की कोशिश में जुटे हैं। जबकि भाकियू नेता राकेश टिकैत पंजाब, हरियाणा, राजस्थान में मोर्चा संभाल रहे हैं।
रेलवे ने बताया आंदोलन को बेअसर, किसान नेता बोले, प्रभावी
रेल रोको कार्यक्रम को रेलवे ने बेअसर बताया है। रेलवे का कहना है कि ज्यादातर स्थानों पर ट्रेनों का संचालन सुचारू रूप से होता रहा। उसकी सेवाओं पर नगण्य असर रहा। रेल रोको प्रदर्शन में कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। जबकि किसान नेताओं ने अपने आंदोलन को प्रभावी बताया है
किसानों की बजाय कांग्रेस का प्रदर्शन
रेल रोको कार्यक्रम भी राजनीतिक रहा। उत्तर प्रदेश के झांसी में रेल रोको आंदोलन बेअसर नजर आया। यहां पर रेल रोकने के लिए युवा कांग्रेस के कार्यकर्ता पहुंच गए। पुलिस ने उन्हें रेलवे स्टेशन में नहीं घुसने दिया तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने स्टेशन के बाहर प्रदर्शन किया। इससे साफ है कि किसान आंदोलन को भुनाने में कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक दल आतुर नजर आ रहे हैं।