कभी तो परहेज करें मोबाइल-लैपटॉप से

    दिनांक 02-फ़रवरी-2021
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बालेन्दु शर्मा दाधीच
आज ज्यादातर लोग सोने, कामकाज और जरूरी गतिविधियों पर खर्च होने वाले समय के बाद बचा-खुचा लगभग सारा वक्त मोबाइल, कंप्यूटर या लैपटॉप के हवाले कर रहे हैं। यह आदत बीमारियां ही लाएगी
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सावधान! मोबाइल और दूसरे गैजेट्स गुलाम बना रहे हैं आपको


सुबह उठते ही आप पहला काम क्या करते हैं? कभी लोग सुबह सबसे पहले व्यायाम करते थे, पढ़ना-पढ़ाना करते थे, भजन-भक्ति करते थे या कम से कम परिवार के साथ कुछ पल साथ बिताने के लिए इकट्ठे होते थे। लेकिन आज अधिकांश लोग सुबह सबसे पहले क्या करते हैं? वे सबसे पहले अपना मोबाइल खोलते हैं। व्हाट्सएप, फेसबुक, यूट्यूब, हेलो, इन्स्टाग्राम, ट्विटर, लिंक्डइन जैसे एप हमें अपनी ओर खींचते हैं और हम खिंचे चले जाते हैं। अब दृश्य नंबर दो। नौ बजे के आसपास आप दफ़्तर पहुंचे। अब तक आप स्मार्टफोन पर व्यस्त थे, और लीजिए अब शुरू हो गया आपका लैपटॉप या डेस्कटॉप। लेकिन दिन-भर बीच-बीच में स्मार्टफोन भी चलता रहा। शाम घर लौटे तो टीवी, स्मार्टफोन या अलेक्सा जैसे स्मार्ट स्पीकर। और हां, दिन भर में न जाने कितने फोन भी तो सुने। हालांकि इन सबकी उपयोगिता पर कोई शक नहीं है, लेकिन क्या सचमुच अपने दिन (रोजमर्रा) का इतना बड़ा हिस्सा इन्हें भेंट कर देने में कोई तुक है?

समस्या कितनी गंभीर है, इसे आंकड़ों की मदद से जानें। ‘ईमार्केटर’ के एक अनुमान के मुताबिक, हम भारतीय वयस्क रोजाना चार घंटे चौंतीस मिनट का समय मीडिया के इस्तेमाल पर खर्च कर रहे हैं यानी देखने, सुनने, स्ट्रीमिंग करने और पढ़ने में। यह आंकड़ा 2013 में सिर्फ दो घंटे बावन मिनट था जो 2020 तक बढ़कर पांच घंटे दस मिनट हो गया। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमआई) और इंडियन काउंसिल आॅफ सोशल साइंस रिसर्च के एक शोध के अनुसार, 63 फीसदी छात्र रोजाना चार से सात घंटे तक का समय स्मार्टफोन पर खर्च करते हैं। आज के आंकड़ों को देखा जाए तो प्रिंट मीडिया पर खर्च होने वाला समय रेडियो (12 मिनट) के बाद सबसे कम यानी 16 मिनट है। हर चार में से एक इनसान सोने से ज्यादा वक्त स्मार्ट गैजेट्स पर खर्च करता है।

इसका मतलब यह हुआ कि हममें से ज्यादातर लोग सोने, कामकाज और जरूरी गतिविधियों पर खर्च होने वाले समय के बाद अपना बचा-खुचा लगभग सारा वक्त इन्हीं चीजों के हवाले कर देते हैं। बहुत से क्षेत्रों में तो नौकरी का समय ही इतने घंटे का होता है। मतलब यह कि आप अपनी नौकरी के अलावा एक नौकरी इन गैजेट्स और स्क्रीन की भी कर रहे हैं!

गैजेट्स और स्क्रीन के प्रति हमारी बढ़ती निर्भरता के बड़े नुकसान हैं। यह हमारी सेहत को प्रभावित कर रही है, मानसिक तनाव पैदा कर रही है तो दिल, शरीर और दिमाग की समस्याओं को जन्म दे रही है। यह रिश्तों में दूरियां पैदा कर रही है, बच्चों को पढ़ाई-लिखाई से दूर कर रही है, दफ्तरों में उत्पादकता का स्तर घटा रही है और हमारी तर्कशीलता को भोथरा कर रही है। यह हमें एक लत का शिकार बना रही है तो कुछ मामलों में हम पर आर्थिक बोझ भी बढ़ा रही है और एक देश के रूप में देखें तो हमारी कुल उत्पादकता और उसके नतीजतन तरक्की को भी प्रभावित कर रही है।

क्या आप अपने दिन का एक समय गैजेट्स के लिए निश्चित कर सकते हैं, मसलन आधा या पौना घंटा? यानी शाम सात से साढ़े सात बजे के बीच ही आप अपने व्हाट्सएप, फेसबुक और इन्स्टाग्राम संदेश देखेंगे। उसके अलावा बाकी समय ये बंद रहेंगे

आज हमें आधुनिक उपकरणों की गुलामी से मुक्ति पाने की जरूरत है। दुनिया भर में लोग इसके लिए कुछ तरीके आजमा रहे हैं, जिन्हें आप भी आजमा सकते हैं। कुछ देशों में तो लोग एक-दो हफ्ते के लिए गैजेट रहित छुट्टी पर जाने लगे हैं। शायद आपके लिए यह संभव न हो, लेकिन इन उपायों को आप जरूर उपयोगी पाएंगे-
  1.  समय निश्चित करना: क्या आप अपने दिन का एक समय गैजेट्स के लिए निश्चित कर सकते हैं, मसलन आधा या पौना घंटा? यानी शाम सात से साढ़े सात बजे के बीच ही आप अपने व्हाट्सएप, फेसबुक और इन्स्टाग्राम संदेश देखेंगे। उसके अलावा बाकी समय ये बंद रहेंगे। फोन आने पर फोन उठाना तो मजबूरी है, लेकिन स्क्रीन से जुड़ी बाकी गतिविधियां सीमित कर देंगे। टेलीविजन का समय आधा घंटा, जैसे, नौ से साढ़े नौ।

  2.  रात के समय गैजेट्स को दूर और बंद रखना: न सिर्फ वे हमें रात में परेशान करेंगे और सेहत को नुकसान पहुंचाएंगे बल्कि हमारी नींद में भी खलल डालेंगे इसलिए उन्हें तकिए के पास रखने में कोई तुक नहीं है।

  3. गाड़ी चलाते समय फोन नहीं उठाना: इस दौरान फोन दूर रहे और तमाम आकर्षण के बावजूद आप उसे न उठाएं, बशर्ते किसी बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति का फोन न हो।

  4. भोजन के समय फोन को आसपास न रखें: परिवार के साथ भोजन कर रहे हैं तो यह शर्त लगा दें कि किसी के हाथ में फोन नहीं होना चाहिए।

  5. सप्ताह में एक दिन डिजिटल डिटॉक्स का रखें: उस दिन आप इनका कतई इस्तेमाल नहीं करेंगे। न सोशल मीडिया, न ईमेल, न टेलीविजन, न कंप्यूटर, न फोन, न व्हाट्सएप, न एसएमएस। वह दिन परिवार के साथ बिताएं, सही अर्थों में।

  6. दफ्तर में निरंतर कंप्यूटर के सामने न बैठे रहें: हर बीस मिनट में एक बार उठें और बीस कदम टहलें। अपनी नजरें भी बीच-बीच में कंप्यूटर से हटाएं और दूसरी तरफ देखें। दफ्तर में लंच करते हैं तो अपनी टेबल पर नहीं बल्कि कैफेटेरिया, कैन्टीन या किसी दूसरी जगह पर जाकर करें।

  7. लोगों से मिलने-जुलने में दिलचस्पी लें: बहुत सारी चर्चाएं खुद इतनी दिलचस्प होती हैं कि आपको अपने गैजेट्स की याद नहीं सताएगी।

  8. शारीरिक गतिविधियों, खेलकूद और मनोरंजन के दूसरे माध्यमों की ओर लौटें: गैजेट्स और स्मार्ट स्क्रीन हमें शारीरिक रूप से निष्क्रिय बना रही हैं। यह मोटापे, दिल की बीमारी, डायबिटीज और ऐसी ही दूसरी समस्याओं की जड़ है। थोड़ा खेलकूद की तरफ लौटें। वे दिन भी क्या थे जब लोग इकट्ठे होकर वॉलीबॉल, फुटबॉल, क्रिकेट, बैडमिंटन और शतरंज आदि खेला करते थे।

  9. एक दोस्त बनाएं जो आपकी ही तरह गैजेट्स से आजादी चाहे: उसके साथ अपने अनुभवों को बांटें और एक दूसरे को प्रेरित करें। इस मामले में अगर प्रतिद्वंद्विता भी हो तो कोई हर्ज नहीं।

  10. कभी-कभी अपने गैजेट्स को घर छोड़ जाएं: जी हां, जान-बूझकर। जब हाथ में गैजेट होगा ही नहीं तो आप इस्तेमाल भी नहीं करेंगे। हालांकि आपको उसकी याद आएगी, लेकिन क्या करेंगे, मजबूरी होगी।

  11. सबको बता दें कि आप डिजिटल डिटॉक्स कर रहे हैं: कई बार लोग ही आपको गलत आदतों के लिए प्रेरित करते हैं। आपकी स्पष्टता उन्हें ऐसा करने से रोकेगी और अगर आप उन्हें बता देते हैं तो आप भी अपनी बात पर टिके रहने के दबाव में होंगे।
तो क्यों न आज ही आप अपने गैजेट्स की सूची बनाएं ताकि आपको पता लगे कि कितना समय इन सब पर खप रहा है।     (लेखक सुप्रसिद्ध तकनीक विशेषज्ञ हैं)