अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक कैसे लगा सकता है फेसबुक ?

    दिनांक 02-फ़रवरी-2021
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राहुल कौशिक
अगर हमारे देश में 'फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन' यानी अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार है, तो फेसबुक उसको कैसे सेंसर कर सकता है? कोई क्या बोलेगा, क्या देखेगा और क्या नहीं देखेगा, यह फेसबुक कैसे निर्धारित कर सकता है ?

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सोशल मीडिया को लेकर जिस प्रकार का शोर हमारे युवाओं के बीच है, वह अब एक कदम और बढ़कर हमारे व्यापार और समाज के महत्वपूर्ण पहलुओं को छूने लगा है। फेसबुक बिज़नेस हो या फिर ऑनलाइन पेमेंट कराने के लिए व्हाट्सअप, गूगल इत्यादि का इस्तेमाल, यह बात स्पष्ट है कि इस तकनीकी दौर में यह बड़ी कंपनियां जानकारियों का एक पूरा भंडार रखती हैं जो आपकी ज़रूरतों, इच्छाओं, गतिविधियों, पसंद और ना पसंद को इस तरीके से जान चुकी हैं कि यह बाजार में डिमांड और सप्लाई तक को प्रभावित करने लगी हैं। प्रचार प्रसार के माध्यम से लेकर एक 'सोशल कम्युनिटी' के निर्माण तक में इन कंपनियों का बड़ा हाथ है।
कहावत है कि अगर आपको कोई चीज़ फ्री में मिल रही है तो असली प्रोडक्ट आप हो! फ्री और सुविधा से भरपूर इंटरनेट के दौर में सोशल मीडिया का आना संचार क्रांति के एक अलग स्तर का मार्ग प्रशस्त कर रहा था। आज इतने वर्षों बाद जब हम उन सोशल मीडिया साइट्स को देखते हैं, तब समझ में आता है कि हमने कितने बड़े 'कॉर्पोरेट जायंट' खड़े कर दिए हैं। ऐसे लोग जो अब हमारे घर से लेकर दफ्तर तक में हस्तक्षेप कर सकते हैं और विडंबना ये है कि यह सब प्राइवेसी के नाम पर होता है।
जब मार्क जुकरबर्ग को कैपिटल हिल में पूछताछ और फेसबुक के बारे में स्पष्टीकरण देने के लिए बुलाया गया तो अपने प्रतियोगियों के विषय में बोलते हुए उन्होंने कहा था कि बड़ी कंपनियां उस सिलिकॉन वैली से प्रभावित हैं जो कि 'लेफ्ट-लीनिंग' हैं। यानी निजता की रक्षा को प्रतिबद्ध यह कंपनियां स्वयं ही एक विचारधारा के पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। ऐसे में सवाल यह आवश्यक हो जाता है कि हम इन कंपनियों को कहां तक अपने जीवन में आने दें?
मंगलवार को 2,800 शब्दों के एक बेहद लंबे लेख में फेसबुक संस्थापक जुकरबर्ग ने फेसबुक के बदले नियमों के विषय में एक स्पष्टीकरण दिया है। बाकी बातें तो एक स्तर तक ठीक है लेकिन एक बिंदु को लेकर स्पष्टीकरण आवश्यक है। अपने स्पष्टीकरण में जुकरबर्ग का कहना है कि अब फेसबुक राजनैतिक विषयों, ग्रुप, अथवा पेजेस को अपनी न्यूज़ फीड से कम करेगा, ताकि लोगों को एक बेहतर अनुभव दिया जा सके। इसके बचाव में जुकरबर्ग का यह भी कहना है कि राजनैतिक विषयों को लेकर समाज में बढ़ रही कटुता कम करने और फेसबुक उपभोक्ताओं को उससे दूर रखने को दृष्टिगत रखते हुए यह कार्य किया गया है। परंतु सवाल ही यही है कि आखिर यह करने का अधिकार जुकरबर्ग को किसने दिया?
फेसबुक जब भारत में आया था तो उसका कहना था कि यह अभिव्यक्ति के विषय को लेकर एक वृहद और रचनात्मक मंच प्रदान करता है जहां पर लोग अपनी पसंद, नापसंद, भावनाओं, ज्ञान अथवा अनुभव इत्यादि को एक सामाजिक समूह के रूप में एक दूसरे से साझा कर सकते हैं। लेकिन बढ़ते हुए समय में जैसे जैसे इसका प्रयोग बढ़ता चला गया, उसी गति से फेसबुक की 'यूजर पॉलिसी' भी बदलती चली गयी। यह समझ में आता है कि इतनी बड़ी जनसंख्या को अपने डिजिटल मंच से जोड़े रखते हुए आपराधिक, असामाजिक और अनैतिक विषयों को दूर रखना एक कठिन कार्य है लेकिन अब इन साइट्स का प्रयोग राजनैतिक उपयोग में भी होने लगा है।
माना कि फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग द्वारा बनाये गए फेसबुक में उनके पास एक सीमा तक निर्णय लेने के अधिकार हैं, परंतु वह निर्णय आपके मूल सिद्धांत के विपरीत नहीं हो सकते हैं। फेसबुक यह कैसे तय कर सकता है कि आप क्या देखें और क्या नहीं? जिस एलगोरिथम को यूट्यूब प्रयोग करता है जहां वह कुछ वीडिओज़ को प्रोमोट करता है, लेकिन किसी खास विचारदधारा, राजनीति अथवा अन्य विषय को लेकर पूर्वाग्रह से ग्रसित नहीं होता, वह सोशल मीडिया के उचित प्रयोग को लेकर एक स्तर तक ठीक नीति कही जा सकती है। यद्यपि इस समय यूट्यूब भी पूर्ण रूप से एक आदर्श के रूप में नहीं देखा जा सकता है। परंतु फेसबुक ने तो सभी सीमाओं को लांघते हुए सीधे यह निर्णय सुना दिया है कि वह राजनैतिक विषयों को अपने न्यूज़ फीड में कम दिखायेगा। यह अधिकार कम से कम उपभोक्ताओं का होना चाहिए कि वह क्या देखें और क्या नहीं?
यह बड़ी कंपनियां भले यह कह रही हों कि हम राजनैतिक विषयों को अपने न्यूज़ फीड में कम दिखाएंगे, परंतु हाल ही में पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ जो हुआ, वह बताता है कि यह कंपनियां किसी भी सीमा तक जा सकती हैं। इनकी नीति से ही यह प्रतीत होता है कि यह मात्र विरोधी विचारधारा के विरुद्ध कार्रवाई करना चाहते हैं। यदि कल इनकी सोच के इतर कोई अपनी बात रखता है तो क्या गारंटी है कि यह उसको 'शैडो बैन' नहीं करेंगे? इसलिए यह आवश्यक है कि इन बड़ी कंपनियों को एक स्वछंद रूप से कार्य करने के लिए सीमाओं से परे नहीं करना चाहिए। किसी देश की नीति सदैव सुविधा देने वाली किसी भी कंपनी से ऊपर होनी चाहिए। यह भी ध्यान देना आवश्यक है कि हम इन कोरोपोरेट्स के जाल में इतना न फंस जाएं कि उससे बाहर निकलना कठिन हो जाये।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का सोशल मीडिया एकाउंट हटा देना, और डिजिटल प्रिंट्स को एकदम साफ कर देना बताता है कि अगर यह कंपनियां चाहें तो किस स्तर तक चीजों को प्रभावित कर सकती हैं। भले ही आज डोनाल्ड ट्रम्प हो लेकिन क्या गारंटी है कि कल यह नरेंद्र मोदी या राहुल गांधी के साथ नहीं हो सकता?
हालांकि अपने लेख में ज़ुकरबर्ग यह भी कहते हैं कि यदि कोई उपभोक्ता फिर भी राजनीति से जुड़े विषय अथवा ग्रुप में भाग लेना चाहता है तो फेसबुक पर वह यह कर सकता है। लेकिन सवाल तो फिर भी है कि जब फेसबुक पर विभिन्न पेजों और एकाउंट्स द्वारा 'सॉफ्ट पोर्न' तक दिखाया जाता है, तो राजनीति विषयों पर यह सेंसरशिप क्यों? क्या यह सरकार के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं? या अब बस प्रचार-प्रसार ही असली सत्य रह गया है।
किसी भी देश में कार्य करने हेतु आपको उसके नियमों को ध्यान में रखते हुए कार्य करना होता है। अगर हमारे देश में 'फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन' यानी अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार है, तो फेसबुक उसको कैसे सेंसर कर सकता है? कोई क्या बोलेगा, क्या देखेगा और क्या नहीं देखेगा, यह फेसबुक कैसे निर्धारित कर सकता है?
वैसे हाल ही में अपनी ही कंपनी व्हाट्सअप में निजीकरण को लेकर उठ रहे सवालों को देखते हुए अपडेट को वापस लेने वाला फेसबुक 'सेफ गेम' खेलने का जितना भी प्रयास करे लेकिन सत्य यही है कि इन सोशल मीडिया साइट्स ने डिजिटल मंच पर एक बड़ी ताकत प्राप्त कर ली है। पिछले वर्ष ही फेसबुक ने कई पेज और समूह अपने मंच से हटा दिए, एडमिन को बिना कोई कारण बताए हुए! कहा जाता है कि उसमें से ज़्यादातर भारत सरकार एवं भाजपा के समर्थन वाले ग्रुप्स और पेज थे। यानी एक कॉर्पोरेट एकाधिकार जमाने का प्रयास करने वाली यह कंपनियां आने वाले समय में हमें एक बड़ा झटका दे सकती हैं।
अपने लेख में ज़ुकरबर्ग यह भी कहते हैं कि फेसबुक में अपने मंच से कई छोटे व्यापारों को बड़ा करने में सहायता प्रदान की है। मुख्यतः लॉकडाउन के दौरान सीमाओं से घिरे हुए व्यापारियों को फेसबुक ने अपने मंच से एक बड़े बाजार तक जाने में प्रभावी भूमिका निभाई है। इस विषय को लेकर उन्होंने उनसे सामान्य से 'कुछ अधिक' जानकारियां भी प्राप्त की हैं ताकि उपभोक्ता और विक्रेता की सुरक्षा की जा सके। इस स्तर पर फेसबुक की महत्ता से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन इसके बाद भी प्रश्न यही है कि आखिर कैसे आपके दरवाजे पर पर्दे बेचने वाला यह तय कर सकता है कि आप अपने घर में कौन से पर्दे लगाएंगे?
कुल मिलाकर डिजिटल युग में निजता वैसी ही बन चुकी है जैसे फटी चादर में अनाज लपेटना। आप चाहें जितना भी झोली में भर लो, कुछ तो नीचे से गिर ही जाना है। यह बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियां आपकी लगभग सभी जानकारियां जानती हैं। उसके उपयोग को लेकर यह क्या कर सकती हैं, और क्या करना चाहती हैं, यह एक बड़ा सवाल है। जहां आप अपनी ही सरकार को कागज़ तक दिखाने से हिचकिचाते हो वहां यह कंपनियां आपके बैंक एकाउंट से लेकर खाते की जानकारी तक जानती हैं। अब तय आप कीजिये कि आप इन्हें और कितना अधिक अपने जीवन में लाना चाहते हैं।