सेकुलर झूठ का स्रोत है एक

    दिनांक 02-फ़रवरी-2021
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बिना तथ्य जांचे दुष्प्रचार में जुटती है लुटियन पत्रकारों की फौज

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गणतंत्र दिवस के दिन दिल्ली में जो कुछ हुआ उसमें राजनीतिक दलों, खालिस्तानियों और नक्सलियों का हाथ हर कोई देख सकता है, लेकिन मीडिया एक बड़े वर्ग ने जो भूमिका निभाई वह एक लोकतंत्र के रूप में हम सबके लिए चिंता की बात होनी चाहिए। दंगे भड़काने में मीडिया की भूमिका कोई नई बात नहीं है। 2002 के गुजरात दंगों में यह तमाशा पूरे देश ने देखा था। पिछले वर्ष नागरिकता कानून को लेकर भ्रम फैलाने और दंगे भड़काने में भी कुछ अग्रणी चैनलों और समाचार पत्रों ने महती भूमिका निभाई थी। लगभग वही अखबार और चैनल थे जो लगातार पिछले डेढ़ महीने से दिल्ली पर डेरा डाले बैठी अराजकतावादी भीड़ का महिमामंडन कर रहे थे। टाइम्स आॅफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस और हिंदुस्तान टाइम्स ने हर दिन अपने 2-3 पेज यह बताने में खर्च किए कि कैसे यह जनआंदोलन है और समाज का हर वर्ग इसमें हिस्सा ले रहा है। जबकि पूरा देश सच जान रहा था। मीडिया के इस वर्ग ने कभी यह बताने का प्रयास नहीं किया कि जो लोग इन आंदोलनकारियों का नेतृत्व कर रहे हैं उनका इतिहास क्या है। जब जगह-जगह पुलिस पर हमले हो रहे थे तब भी अधिकतर चैनलों ने उन्हें दंगाई कहने की जगह ‘किसान’ कहना जारी रखा।

भड़काऊ पत्रकारिता का सबसे महीन खेल इंडिया टुडे समूह खेलता है। इसके चैनलों और संपादकों ने पहले दिन में किसानों के मारे जाने की फेक न्यूज फैलाई और शाम को शांति और धैर्य की अपील करने में जुट गए। इसके संपादक राजदीप सरदेसाई ने एक गलत चित्र के आधार पर चैनल पर बताया कि पुलिस ने एक किसान को उसके सिर में गोली मारी है। हिंसा भड़काने में इस रिपोर्टिंग का बहुत बड़ा हाथ रहा। एनडीटीवी चैनल के लिए जो दीप सिद्धू कुछ दिन पहले तक सरकार के विरोध में आवाज उठाने वाला पंजाबी कलाकार था, अचानक वह ‘भाजपा का एजेंट’ बन गया। चैनल पूरे दिन यही समझाता रहा कि यह ‘छोटी-मोटी हिंसा’ है। संभवत: जिस रक्तपात की तैयारी उसने की थी उसके मुकाबले जो हुआ वह कुछ भी नहीं था। झूठ फैलाने वाले पत्रकारों की ये फौज बहुत बड़ी है। इन सभी को निर्देश संभवत: किसी एक ही स्त्रोत से पहुंचाए जाते हैं। यही कारण था कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा नेताजी सुभाषचंद्र बोस के चित्र के अनावरण को लेकर सभी ने लगभग एक ही तरह से विवाद पैदा करने का प्रयास किया। अफवाहबाज पत्रकारों की यही जमात चीन के इशारे पर भारत विरोधी दुष्प्रचार भी करती है। शेखर गुप्ता इस मामले में कुख्यात हैं। उनकी वेबसाइट ने छापा कि अमेरिका, आॅस्ट्रेलिया और जापान से भारत की निकटता के कारण रूस नाराज है। रूस ने इस रिपोर्ट के पीछे छिपे एजेंडे को समझ लिया। वहां के विदेश मंत्रालय ने तत्काल एक औपचारिक बयान जारी करके पत्रकारिता के इस स्वयंभू मठाधीश को आईना दिखा दिया।

लव जिहाद पर मीडिया का खेल भी बहुत विचित्र है। टाइम्स आॅफ इंडिया और नवभारत टाइम्स कहते हैं कि लव जिहाद कुछ नहीं होता और भाजपा सरकारें प्रेमियों को परेशान कर रही हैं। लेकिन उसी समूह के चैनल टाइम्स नाऊ पर नियमित रूप से हिंदू लड़कियों के साथ इस अपराध के समाचार दिए जाते हैं। महिला सुरक्षा जैसे गंभीर विषय पर मीडिया की यह दोहरी राजनीति समझ से परे है। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में एक नाबालिग लड़की का अपहरण किया गया। परिवार की शिकायत पर पुलिस ने तेजी से कार्रवाई की और आरोपी को पकड़ लिया। पता चला कि लड़की के कन्वर्जन की तैयारी थी। लेकिन टाइम्स आॅफ इंडिया की रिपोर्टिंग ऐसी थी मानो अपहृत बच्ची को छुड़ाकर उत्तर प्रदेश पुलिस ने अपहरणकर्ता के मानवाधिकारों का उल्लंघन कर दिया हो। एनसीईआरटी की किताबों में मुगलों के महिमामंडन का मामला भी चर्चा में है। इतने वर्षों तक बच्चों को जो झूठ पढ़ाया जाता रहा है, उसकी पोल खुल रही है। जनता में इसे लेकर गुस्सा है, लेकिन इस विषय पर किसी सेकुलर मीडिया समूह में न तो कोई संपादकीय लेख दिखेगा न कोई बहस। चाइनीज वायरस की भारतीय वैक्सीन को लेकर दुष्प्रचार अभियान जारी है। चीन इस काम को अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सहायता से कर रहा है, तो भारत में इसकी जिÞम्मेदारी लगता है कुछ अखबारों और चैनलों के पास है। अब भी वैक्सीन लगने के बाद एक-दो लोगों की मौत के समाचार बढ़ा-चढ़ाकर छापे जा रहे हैं, चाहे उनका कारण कुछ भी हो।