उपन्यास-गेशे जम्पा उपन्यास की इक्कीसवीं कड़ी

    दिनांक 22-फ़रवरी-2021
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तिब्बती शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या हमारे भारत देश में है। चीन की विस्तारवादी नीति के परिणामस्वरूप एक अहिंसक धार्मिक देश तिब्बत पराधीन हो गया। 1959 में तब इसका चरमोत्कर्ष देखने को मिला जब तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष परम पावन दलाई लामा को अपने लाखों अनुयायियों के साथ अपना देश छोड़ भारत में शरण लेनी पड़ी।  भारत में रह रहा तिब्बती समुदाय तिब्बत में रह रहे चीनी सत्ता से संघर्षरत तिब्बतियों की सबसे बड़ी ताकत बना हुआ है। 19वीं सदी के अन्त तक तिब्बत स्वतंत्र था। तिब्बत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और मानवीय अधिकारों के प्रश्नों को लेकर छाई वैश्विक चुप्पी को तोड़ने और उन्हें स्वाधीनता दिलाने की जद्दोजहद करता है सुप्रसिद्ध लेखिका नीरजा माधव लिखित भारत में हिन्दी का पहला उपन्यास-गेशे जम्पा। प्रस्तुत है इस उपन्यास की इक्कीसवीं कड़ी
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गेशे जम्पा अपने कक्ष में थे। धर्मशाला से आए उन्हें तीन हफ्ते बीत चुके थे। पिताजी द्वारा तिब्बत से भेजे गए पत्र पर अभी तक वे कोई अंतिम निर्णय नहीं ले पाए थे। धर्मशाला से चलते समय मग्-पा ने एक बार पुन: चेतावनी भरे स्वर में समझाया था-देखो जम्पा, जल्दबाजी में उठा तुम्हारा कोई कदम भविष्य के लिए खतरा बन सकता है। जी, मैं भी इस पर तभी से विचार रहा हूं मग-पा। किसी अंतिम निर्णय पर पहुंचने से पहले आपसे अवश्य संपर्क करूंगा। तिब्बत जाना तो अवसर निकालकर मेरे गांव अवश्य जाना। चमदो अब कैसा लगता है, लिखना। मग्-पा की आंखों में एक लालसा तैर रही थी। तुम कहीं खोए हो जम्पा? मग्-पा ने टोका था। नहीं मग-पा। सोच रहा हूं, संसार-चक्र में मनुष्य किस तरह नि:सहाय होता है। धैर्य रखो मेरे जम्पा, सब ठीक हो जाएगा। और मग्-पा ने उन्हें अपनी बांहों में भर लिया था।
और वहां से जाने के इन तीन हफ्तों के बाद ही तिब्बत से फिर एक पत्र आया था गेशे जम्पा के नाम। पिताजी की लिखावट लग रही थी।
प्यारे जम्पा! आशीर्वाद!
समय बीतता जा रहा है। चिनये खोई, कोनचोग खो गया, तुम बिछुड़ने के लिए अभिशप्त हुए। मग्-पा का भी कोई पता न चला। आखिर किस उम्मीद में जिएं? तुम आ जाते तो शायद इस त्रासदी में कमी आ जाती। तुम्हारा पिता/थुप्तेन
गेशे जम्पा की आंखें भर आई थीं। उन्होंने मग्-पा को फोन मिलाया था-मग्-पा, पिताजी का पुन: पत्र आया है। बहुत निराशाजनक पत्र है। तुम्हें क्या लग रहा है जम्पा? कहीं से किसी दबाव के..? मग्-पा, मुझे तो लग रहा है जैसे किसी दबाव में आकर उन्होंने पत्र लिखा है। क्रास मुझे तिब्बत आने से रोकने के लिए बनाया होगा। परंतु, आप जो आदेश दें मग्-पा। मैं भी ऐसा ही सोच रहा हूं। तुम्हें जाना ही चाहिए अब। मग्-पा के स्वर में एक कौतूहल जाग उठा।
मग्-पा से बात करने के बाद, गेशे जम्पा का मस्तिष्क देवयानी पर आकर ठहर गया था। आज उन्होंने उसे अपने कक्ष में बुलवाया था। आज वे उसे भी कुछ देना चाह रहे थे।
वे धर्मशाला की एक हस्तशिल्प की दुकान में घुसे थे। एकाएक उनकी दृष्टि एक पेंटिंग पर ठहर गई थी- मनोहारी प्रकृति के बीच एक अकेली स्त्री बैठी थी। स्त्री के पीछे झुÞरमुट से निकलते हुए एक ऋषि बाएं हाथ में कमंडल लिए और दाहिने हाथ की तर्जनी उठाए क्रोध की मुद्रा में थे। इसकी क्या कहानी है? उन्होंने दुकानदार से पूछा था। जी, यह शकुन्तला और दुष्यंत की कहानी पर आधारित है। दुर्वासा-शाप का दृश्य है यह। पेंटिंग लेकर वे संतुष्ट मन से वापस आ गए थे। सर, मैं आ जाऊं? देवयानी के स्वर से वे अतीत से वर्तमान में आ गए। गेशे जम्पा ने कहा, देवयानी, अगले हफ्ते मैं जा रहा हूं। कहां? तिब्बत? देवयानी ने पूछा था। हां, वहां से पत्र आया है। मेरे पिताजी अभी जीवित हैं। तिब्बत छोड़कर आया, तब से लेकर आज तक, कुछ भी ज्ञात नहीं था उनके बारे में। पत्र भी भेजा, पर कोई उत्तर नहीं। वे न जाने कितने वर्षों से जेल की यंत्रणा भुगत रहे हैं। उनका स्वर अत्यंत गंभीर हो उठा।
ओह सर, जेल क्यों? तिब्बत में रहने वाले तिब्बतियों के लिए यह बहुत सामान्य बात हो गई है। किसी पर शक हो गया, बस उसे भर दो जेल में। यह तो सरासर अन्याय है। मानवाधिकारों का उल्लंघन है सर। उसके विरोध में आवाज उठनी चाहिए पूरे विश्व में। उठ रही है देवयानी। पर परिणाम बहुत अधिक नहीं मिल पा रहा है। हो सकता है कि मेरे बारे में कहीं से गुप्तचर एजेंसियों ने सूचना दी हो, और मुझे वहां वापस बुला लेने के लिए मेरे माता-पिता को हथियार बनाया जा रहा हो। उन्हें यंत्रणा देकर पत्र लिखवाया गया हो ताकि मैं अवश्य आऊं। नदी में उतरना ही पड़ेगा उसकी लहरों की थाह लेने के लिए। गेशे जम्पा ने उसे कुरेदा था।
क्या रुकने या लौटकर आने की कोई संभावना नहीं बन रही है सर? अब यह वहां की स्थिति पर निर्भर करता है देवयानी। दूसरे ही दिन स्थानीय तिब्बती समुदाय में आग की तरह खबर फैल गई कि गेशे जम्पा की धार्मिक-राजनीतिक गतिविधियों को रोकने एवं अन्य शरणार्थी तिब्बतियों के भीतर भय पैदा करने के उद्देश्य से उन्हें वापस तिब्बत बुलाया जा रहा है। इस कार्य को परिणति देने के लिए उनके बूढ़े माता-पिता को हथियार बनाया गया है और उन्हें शारीरिक-मानसिक यंत्रणा देकर पत्र लिखने के लिए विवश किया गया। गेशे जम्पा द्वारा अपना पदभार दूसरे उत्तराधिकारी को सौंपने के साथ ही तिब्बती शोध संस्थान एवं मठ के छात्र-छात्राएं, भिक्षु और भिक्षुणियां उनके सारनाथ स्थित कार्यालय के सामने इकट्ठा होने लगे थे।
चाइना टेंपल के पुजारी ने बहुत विनम्रतापूर्वक कहा था-मैं आपकी भावनाओं को समझता हूं। अशांति की इस बाढ़ में मैं बीच की रेत बनना चाहता हूं। यदि विश्वास कर सकें तो मैं अपनी ओर से भी अपील भेजूंगा। उन्हें भगवान बुद्ध और युद्ध के बीच किसी एक को चुनना होगा। उन्हें अब स्पष्ट करना ही चाहिए दुनिया के सामने कि वे शांतिप्रिय हैं या हिंसाप्रिय। शांति के लिए करुणा प्रथम सोपान है परंतु उनके कृत्य ऐसा आभास नहीं देते। विश्वास रखें, मैं अपील करूंगा आपकी ओर से। मैं आपके साथ हूं। भगवान तथागत की करुणा आपके साथ है। सब ठीक हो जाएगा।
टनचू ढोंढप ने अपने साथ लाया हुआ अहिंसक मुक्ति-साधना पत्रक और गेशे जम्पा के बहाने सक्रिय व्यक्तियों को कूटनीति के द्वारा वापस बुलाए जाने का भर्त्सना-पत्र पुजारीजी को सौंपा था। उसकी एक-एक छायाप्रति भारत सरकार एवं दूतावासों को फैक्स द्वारा तुरंत प्रेषित की गई थी। एक छायाप्रति मानवाधिकार आयोग को भेजने का निर्णय लेकर जुलूस गेशे जम्पा के कार्यालय आ गया था। ‘दमनकारी इस नीति को बंद करें’, इन नारों की तख्तियां हाथों में लिए छात्र-छात्राएं और भिक्षु वहां पहुचंते ही भावुक हो उठे थे। गेशे जम्पाजी, वापस नहीं जाइए, नहीं जाइए। वे ‘बंद करो यह कूटनीति, छल और छद्म की राजनीति’ के नारे लगाने लगे थे। गेशे जम्पा ने शोर सुना तो परेशान हो उठे थे। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि उनके तिब्बत जाने के प्रश्न पर आंदोलन हो जाएगा। वे अपने कक्ष से बाहर निकले। उनके दोनों हाथ जुड़े थे। लोगों का स्नेह देख वे भी भावुक हो उठे थे। देखिए, आपका प्यार मेरा संबल होगा वहां। यदि कूटनीति के द्वारा ही हमें बुलाया गया है तो भी हमें जाना चाहिए। दूर रहकर हम अपनी लड़ाई इतने दिनों से लड़ रहे हैं, पर परिणाम आते-आते रुक जा रहा है। इसलिए मुझे मत रोकिए।
तब आप अकेले नहीं जाएंगे गेला! हम भी साथ होंगे। हम साथ चलेंगे। सैकड़ों तिब्बती हाथ उठे थे। छात्र-छात्राएं उत्तेजित थे। भिक्षुओं के चेहरे भी तमतमाए थे। भिक्षुणी दोलमा पीछे खड़ी चुपचाप कातर दृष्टि से सभी को देख रही थी। देखिए, अभी वह घड़ी नहीं आई है। मुझे उम्मीद है कि बहुत जल्दी ही वह समय आने वाला है, जब हम साथ-साथ पोटाला में लोसर मनाएंगे। बस, आप अपना सहयोग देते रहिए, मनोबल बनाए रखिए। गेशे जम्पा ने विनम्र भाव से समझाया था। आपके साथ वहां कोई दुर्व्यवहार हुआ तो? टनचू ढोंढप आक्रोश में था। ऐसा होना तो नहीं चाहिए। फिर भी हमें हर स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए। दुनिया के किसी भी इतिहास में किसी प्रजाति को खत्म करने के लिए इस तरह का धर्म-संहार, संस्कृति संहार और नर संहार नहीं मिलता। हम उस त्रासदी के शिकार बन रहे हैं तो हमें सब कुछ झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए।
दूसरे दिन स्टेशन पर विदा करने आई भीड़ ने गेशे जम्पा को फूल-मालाओं से लाद दिया था। छात्र-छात्राओं और भिक्षुओं के चेहरे उनसे बिछुड़ने की पीड़ा और उससे भी अधिक अपनी मातृभूमि से दूर रहकर शरणार्थी कहलाने के दंश से भाव-विगलित थे। गेशे जम्पा की आंखें भी बार-बार नम हो जा रही थीं। एक-एक से हाथ मिलाकर या कंधे पर स्नेहिल स्पर्श देकर वे विदाई ले रहे थे। बालेंदु और नवीन शर्मा के साथ संस्थान के बड़े बाबू हाथों में पुष्प हार लिए आगे बढ़े थे-सर, हमें न  भूलिएगा। वापस आइएगा। नवीन शर्मा भावुक हो उठे थे। बिना कुछ बोले ही जम्पा ने उन्हें अपनी दोनों भुजाओं में भरा और उनकी पीठ थपथपाई थी। भावावेश में मुंह से बोल न फूटे थे। बालेन्दु भी पास आ गए। गेशे जम्पा ने उन्हें भी अंक में भर लिया और भर्राए गले से बोले- संस्थान और बच्चों का ध्यान रखना। माई दोलमा को कष्ट न होने पाए। जी सर। उसकी आंखों में आंसू थे।
ट्रेन ने सीटी दे दी थी। गेशे जम्पा एक क्षण को ठिठके थे और पूछ लिया- देवयानी नहीं आई?
नहीं सर।
और गेशे जम्पा चुपचाप अपनी बोगी की ओर जाने के लिए मुड़ गए थे। सामने शाम का सूरज ढल रहा था।