आंदोलन की राजनीति

    दिनांक 22-फ़रवरी-2021   
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किसानों के मुद्दे पर शुरू हुआ ‘किसान’ आंदोलन अब अपना असली रूप दिखाने लगा है। एक ओर जातीय समीकरण के सहारे राजनीतिक महत्वाकांक्षा हासिल करने के प्रयास हो रहे हैं, वहीं खालिस्तानी गठजोड़ की कलई भी खुल रही है। राजनीतिक दलों में सबसे ज्यादा बेचैनी कांग्रेस में दिख रही
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पंजाब के बाद पिछले दिनों राहुल गांधी राजस्थान में पंजाब एवं हरियाणा से सटे सीमावर्ती गांवों में किसानों को उकसाने पहुंचे   (फाइल चित्र)

देखते ही देखते किसान आंदोलन खेती से जुड़ी मांगों को छोड़कर तीन अलग-अलग रास्तों पर चला गया है। जिस आंदोलन के नेताओं ने शुरू में खुद को गैर-राजनीतिक बताया था और जिसके शुरुआती दिनों में राजनीतिक दलों के नेता उसके पास फटक नहीं रहे थे, वह राजनीतिक शक्ल ले रहा है। दूसरा रास्ता भारतीय किसान यूनियन के टिकैत गुट ने पकड़ा है, जोे इसे जाट-अस्मिता का रंग देकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में खाप-महापंचायतें और रैलियां कर रहा है। तीसरा, जिस खालिस्तानी साजिश का संदेह शुरू में था, उसकी भी परतें खुल रही हैं। आंदोलनों की वैश्विक मशीनरी भी इसमें शामिल हो गई है। आमतौर पर यह मशीनरी पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और संधारणीय विकास के सवालों को लेकर चलती है। संयोग से इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में पराली जलाने और उत्तर भारत के पर्यावरण प्रदूषण में खेती की भूमिका से जुड़े सवाल भी थे। पर वे इस आंदोलन के साथ गड्ड-मड्ड हो गए हैं।

पीछे रह गए खेती के सवाल
इस पूरी बहस में भारतीय कृषि की बदहाली और आर्थिक सुधारों की बात लगभग शून्य है। कोई यह समझने का प्रयास नहीं कर रहा कि भविष्य की अर्थव्यवस्था और खासतौर से रोजगार सृजन में हमें किस किस्म की कृषि-व्यवस्था की जरूरत है। खेती से जुड़े नए कानून कृषि-कारोबार और उसकी बाजार-व्यवस्था के उदारीकरण की दीर्घकालीन प्रक्रिया का एक हिस्सा हैं और उन आर्थिक सुधारों का हिस्सा हैं, जो पूरे नहीं हो पाए। सन् 1950 में हमारी अर्थव्यवस्था में खेती की हिस्सेदारी 55 प्रतिशत से अधिक थी। आज वह 16 प्रतिशत से कुछ कम है। खाद्य सुरक्षा के लिए खेती की भूमिका महत्वपूर्ण है और हमेशा रहेगी। खासतौर से भारत जैसे देश में जहां गरीबी बेइंतिहा है।

हमारी कृषि उत्पादकता कम है। कम से कम चीन या दूसरे ऐसे देशों के मुकाबले कम है, जिनकी तुलना हम खुद से करते हैं। खेती में पूंजी निवेश और दलहन, तिलहन का उत्पादन बढ़ाने की जरूरत है, जिसका हमें आयात करना पड़ता है। यह काम कैसे होगा और उसके लिए किस प्रकार की नीतियां अपनानी होंगी, यह समझने के लिए हमें विशेषज्ञों की शरण में जाना होगा।

इस समस्या के तमाम पहलू हैं और उन्हें लेकर कई तरह की राय हैं, पर सारी बहस आंदोलन, प्रतिरोध और विरोध-प्रदर्शनों के इर्द-गिर्द चली गई है। जो पश्चिमी देश भारत में कृषि-सुधारों की मांग कर रहे थे, वे चुप्पी साधे हुए हैं। 1990 के दशक में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के गठन के बाद वैश्विक कारोबार से जुड़े मसले लगातार उठ रहे हैं। एमएसपी और कृषि-क्षेत्र की सब्सिडी को खत्म करने का दबाव भी इसके पीछे है।

वैश्विक दबाव
भारत की विदेश-सेवा से सेवानिवृत 20 पूर्व अधिकारियों ने हाल में विश्व व्यापार संगठन के नाम एक चिट्ठी लिखी है। इसमें वस्तुत: डब्ल्यूटीओ, अमेरिका, ब्रिटेन और दूसरे पश्चिमी देशों के राजनीतिक समूहों को कोसा गया है। इस पत्र का आशय यह है कि आप हमें बाजार खोलने का सुझाव देंगे और ऊपर से नसीहत भी देंगे कि ऐसे नहीं, वैसे। यह हमारे देश का मामला है। बाजार, खाद्य सुरक्षा और किसानों के बीच हमें किस तरह संतुलन बनाना है, इसे हम खुद देखेंगे। खेती से जुड़े कानून इस संतुलन को स्थापित करने के लिए हैं। यह तो आपका दुहरा मापदंड है। एक तरफ आप वैश्विक खाद्य बाजार के चौधरी बने हुए हैं और दूसरी तरफ किसान-आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं।
पत्र में यह भी लिखा है कि भारत डब्ल्यूटीओ या विकसित देशों के कहने से खाद्यान्न बाजार को नियमित नहीं करेगा, बल्कि भारतीय किसान के बुनियादी हितों को देखकर फैसला करेगा। इस बीच लेखक संजीव सान्याल ने ट्विटर पर एक छोटा-सा नोट साझा किया है, जिसमें दिखाया गया है कि भारत के न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर विश्व व्यापार संगठन का भारत पर किस कदर दबाव है। इसके जवाब में भारत में नीदरलैंड्स के पूर्व राजदूत अलफोंस सस्टोलिंगा ने एक रोचक ट्वीट किया है। उन्होंने लिखा, ‘‘संजीव, हमारे मीडिया में लेखक तमाम विषयों पर तमाम बातें लिखते हैं, पर भारत के बारे में उनकी जानकारी भारत के अंग्रेजी मीडिया तक सीमित होती है। उनके विचार भारत के अंग्रेजी मीडिया की कॉपी भर होते हैं।’’ अलफोंस सस्टोलिंगा को ट्विटर पर फॉलो करें तो आप पाएंगे कि वे हिंदी की समझ रखते हैं और भारत को लेकर उनके मन में स्नेह का भाव है। ऐसे भी कुछ लोग दुनिया में हैं, पर हम उनके बारे में कितना जानते हैं?

दूसरे रास्ते पर उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा की जाट-पट्टी है, जहां यह आंदोलन जातीय-अस्मिता की शक्ल ले रहा है। खापों-महापंचायतों का दौर शुरू हो गया है। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अपने इलाके को छोड़कर बाहर इन महापंचायतों को संबोधित कर रहे हैं। उनके भाई नरेश टिकैत ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आंदोलन की बागडोर थाम रखी है। राकेश टिकैत हाल में हरियाणा के दौरे पर थे। उन्होंने जींद और कुरुक्षेत्र के पिहोवा स्थित गुमथुलागढ़ू में महापंचायतों को संबोधित किया। इसके अलावा, करनाल और पानीपत जिलों का भी दौरा किया।

आंदोलन का राजनीतिकरण
ज्यादातर राजनीतिक दल सीधे इस मुद्दे से जुड़ने को आतुर हैं या परोक्ष रूप से इसका लाभ उठाना चाहते हैं। राकेश टिकैत की पहली रैली मुजफ्फरनगर में हुई, जिसमें राष्ट्रीय लोकदल और आम आदमी पार्टी (आआपा) के नेताओं ने भी शिरकत की थी। राकेश टिकैत अब उत्तर प्रदेश के बाहर रैलियां कर रहे हैं। उधर, किसान संगठनों और उनके नेताओं के बीच आपसी स्पर्धा भी है। हरियाणा भारतीय किसान यूनियन के प्रदेशाध्यक्ष गुरनाम सिंह चढ़ूनी अपने मंच से किसान रैलियां और सभाएं भी आयोजित कर रहे हैं। चढ़ूनी और उनके समर्थकों ने टिकैत की रैलियों से दूरी बनाकर रखी है। 

संयुक्त किसान मोर्चा की सात सदस्यीय समन्वय समिति ने आंदोलन का स्वरूप बदल दिया है। राजस्थान की सभी सड़कों को टोल मुक्त करवाने तथा किसानों से जुड़े सांस्कृतिक कार्यक्रमों को आयोजित करने के साथ 18 फरवरी को चार घंटे का सांकेतिक ‘रेल रोको’ अभियान चलाया गया। चूंकि कथित आंदोलन को लंबे समय तक खींचने की योजना है, इसलिए उसे बिखरने से बचाने तथा मुद्दों पर केंद्रित रखना एक चुनौती है। लेकिन ज्यादा बड़ी चुनौती इसके राजनीतिकरण की है। 

संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्य बार-बार इस आंदोलन से राजनीति को दूर रखने की बात करते हैं, लेकिन उसके भीतर से भी राजनीति की बातें निकल रही हैं। गत 7 फरवरी को हरियाणा के कितलाना टोल प्लाजा पर आयोजित महापंचायत के दौरान पंजाब से आए बलबीर राजेवाल ने हरियाणा सरकार को गिराने की बात कही। उन्होंने कहा कि पंजाब में उन्होंने अकाली दल पर इतना दबाव बनाया कि आखिरकार उसे राजग से बाहर होना पड़ा। हरियाणा की भाजपा सरकार कमजोर है। यह गिर गई तो केंद्र सरकार खुद हमारे पास आएगी। उनकी बातों का खाप के कई प्रतिनिधियों ने विरोध जताया।

संयुक्त किसान मोर्चा के वरिष्ठ सदस्य दर्शनपाल कहते हैं, ‘‘किसानों का मंच चुनावी मंच नहीं है। यह बात सभी को समझा दी गई है। हम राजनीतिक दलों को किसानों का मंच इस्तेमाल नहीं करने देंगे। चाहे वे समर्थन दें या न दें, किसानों का मंच पूरी तरह से गैर-राजनीतिक रहेगा।’’ हालांकि रणनीति को लेकर मतभेद भी उभर रहे हैं। इस साल बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं। इन पर शायद इस आंदोलन का ज्यादा असर नहीं होगा, पर अगले साल उत्तर प्रदेश के चुनाव पर राजनीतिक दलों की निगाहें हैं।

जातीय पहचान और चुनाव
हाल में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि राज्य में 30 अप्रैल तक पंचायत चुनाव कराए जाएं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में राजनीतिक गतिविधियां बढ़ गई हैं। अगले साल विधानसभा चुनाव भी होने वाले हैं। इसे देखते हुए राजनीतिक सरगर्मी पहले से है। अब किसान आंदोलन ने इसमें और गर्माहट पैदा कर दी है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस, राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) और समाजवादी पार्टी ने इस मामले में पहल की है। उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी ने किसान पंचायतों का सिलसिला शुरू किया है। प्रियंका गांधी भी गत 26 जनवरी को हुई हिंसा के दौरान मृत युवा नवरीत के गांव में गई थीं। राजस्थान में भी कांग्रेस की ओर से किसान महापंचायतें की जा रही हैं। पिछले दिनों इनमें राहुल गांधी ने भी भाग लिया। सचिन पायलट ने इसमें भूमिका निभाई है। कांग्रेस के अलावा, रालोद के जयंत चौधरी ने 17 फरवरी से 7 मार्च तक अलग-अलग जिलों में पंचायत के कार्यक्रम घोषित किए हैं। इनकी देखा-देखी आआपा के अरविंद केजरीवाल भी इस पंचायती राजनीति में कूद पड़े हैं। उनकी पहली पंचायत 28 फरवरी को मेरठ में होगी। आआपा उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उतरने जा रही है। राकेश टिकैत की मुजफ्फरनगर में हुई महापंचायत में पार्टी के संजय सिंह भी पहुंचे थे।

बीबीसी हिन्दी की एक रिपोर्ट में सवालिया शीर्षक है कि महापंचायतों ने किसान आंदोलन को क्या केवल जाट समुदाय का आंदोलन बना दिया है? राकेश टिकैत वैसे तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं, पर अब उन्हें हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक और मध्य प्रदेश से भी किसान महापंचायतों का बुलावा आ रहा है। कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने दौसा में महापंचायत की थी। उसमें बहुत बड़ी संख्या में राजस्थान के गुर्जर किसान शामिल हुए थे। पायलट को गुर्जर नेता के तौर पर देखा जाता है। पर्यवेक्षक मानते हैं कि जातीय-ध्रुवीकरण आंदोलन के हित में नहीं है। कोई भी किसान आंदोलन केवल एक जाति पर खड़ा होकर नहीं चल सकता। मुजफ्फरनगर में आयोजित महासभा में मुसलमान भी बड़ी संख्या में आए। यह भी कहा जा रहा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट ही किसान आंदोलनों का नेतृत्व करते रहे हैं। पंजाब में भी सिख जाट इसकी अगली कतार में हैं।

खालिस्तानी गठजोड़
कथित आंदोलन का तीसरा रास्ता खालिस्तान के उस खतरनाक खेल की ओर बढ़ रहा है, जिसे लेकर पंजाब में पहले से आशंकाएं व्यक्त की जा रही थीं। किसान आंदोलन शुरू होने के पहले ही पंजाब में पाकिस्तान से भेजे गए ड्रोन की मदद से हथियार गिराने की घटनाएं हुई थीं। इसकी शुरुआत ग्रेटा थनबर्ग और पॉप गायिका रिहाना के ट्वीट से हुई। आंदोलन के अंतरराष्ट्रीयकरण और भारत की छवि खराब करने के मामले को लेकर सचिन तेंडुलकर और लता मंगेशकर से लेकर अक्षय कुमार जैसे बॉलीवुड कलाकारों ने आवाज उठाई, पर खालिस्तानी गठजोड़ को लेकर चिंता उस ‘टूलकिट’ को लेकर है, जिसे ग्रेटा थनबर्ग ने अपने ट्वीट में साझा किया था। बाद में उसने इसे डिलीट करके संशोधित ट्वीट किया, पर उसके पिछले ट्वीट का विवरण छिप नहीं सका। ‘टूलकिट’ के विवरणों को ध्यान से देखें तो पाएंगे कि उनमें आंदोलन की मांग का केवल एक जगह जिक्र भर है। दूसरी तरफ इसमें भारत की छवि पर वैश्विक-प्रहार करने की कामना ज्यादा है। विदेश मंत्रालय ने इस पर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया दी। खासतौर से विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा, ‘‘आप देखिए कि विदेश मंत्रालय ने कुछ हस्तियों की ओर से ऐसे मुद्दे पर दिए गए बयान पर प्रतिक्रिया दी, जिसके बारे में वह अधिक नहीं जानते हैं, इसके पीछे कोई वजह है।’’
दिल्ली पुलिस ने जो पड़ताल शुरू की है, उससे पता लगा है कि ‘टूलकिट’ के पीछे ‘पोएटिक जस्टिस फाउंडेशन’ (पीजेएफ) नाम की एक संस्था है, जो खालिस्तानी संगठन है। शांतिपूर्ण आंदोलन लोकतंत्र की बुनियादी शर्त होता है। इस आंदोलन में यह तो देखना ही होगा कि इसकी आड़ में देश-विरोधी ताकतें तो सक्रिय नहीं हैं? भारत के अटॉर्नी जनरल ने 12 जनवरी, 2021 को सर्वोच्च न्यायालय में बताया था कि इस आंदोलन में खालिस्तानी प्रवेश कर गए हैं।
‘टूलकिट’ में कार्यक्रमों के उप-शीर्षक हैं ‘अर्जेंट एक्शंस’ और ‘प्रायर एक्शन।’ एक विस्तृत खंड है ‘हाउ यू कैन हेल्प?’ ‘अर्जेंट एक्शंस’ के तहत 4 और 5 फरवरी को ‘ट्विटर स्टॉर्म’ शुरू करने का निर्देश थे। इसके बाद 13-14 फरवरी को भारतीय दूतावासों के सामने प्रदर्शन करने के निर्देश थे। हालांकि अनेक वेबलिंक अब बंद हैं, पर ‘टूलकिट’ में ‘मोर इनफॉर्मेशन-इम्पॉर्टेंट लिंक्स’ शीर्षक से पांच लिंक दिए गए हैं, जो आखिरी जानकारी मिलने तक जारी थे। इनमें से एक वेबसाइट में बताया गया है, ‘‘हम कनाडा, अमेरिका और यू.के. के वॉलंटियर समूह हैं, जो भारत के किसान-समुदाय को सामाजिक-न्याय दिलाना चाहते हैं।’’ केवल इस किसान आंदोलन की बात नहीं है, लंदन में भारतीय उच्चायोग पर हाल के वर्षों में कई बार हमले हुए हैं, जिनमें पाकिस्तानी और खालिस्तानी तत्वों का हाथ रहा है।
गत 26 जनवरी को लालकिले का दरवाजा तोड़कर उसमें घुसने की घटना प्रतीक रूप में भारतीय राष्ट्र-राज्य पर हमला थी। कनाडा स्थित कुछ समूहों ने 2018 से ‘रेफरेंडम-2020’ नाम से एक अभियान शुरू किया है। उसके लक्ष्य बहुत खतरनाक हैं। ऐसा नहीं कि गणतंत्र दिवस पर सौ-पचास लोग रास्ता भटक कर लालकिले में पहुंच गए थे। दिल्ली पुलिस के अनुसार 9,000 से ज्यादा ऐसे मोबाइल फोन लालकिले में सक्रिय थे, जो दिल्ली के नहीं, बाहर के थे। 200 से ज्यादा ट्रैक्टर और मोटर गाड़ियां परिसर में जबरन प्रवेश कर गई थीं। कनाडा की संस्था पीजेएफ का संस्थापक एम.ओ. धालीवाल है, जो खुद को ‘प्राउड खालिस्तानी’ बताता है। वह पीआर कंपनी स्काईरॉकेट का निदेशक भी है। इसी पीआर कंपनी ने रेहाना वगैरह से ट्वीट करवाए हैं। जांच एजेंसियों के अनुसार यह व्यक्ति किसान आंदोलन की आड़ में अलगाववादी आंदोलन को बढ़ावा देना चाहता है। धालीवाल का एक वीडियो भी वायरल हुआ है, जिसमें वह कह रहा है कि हमारा उद्देश्य केवल कानूनों की वापसी नहीं। अंतिम लक्ष्य खालिस्तान है।   (लेखक दैनिक हिन्दुस्तान के वरिष्ठ संपादक रहे हैं)




ds_1  H x W: 0 ज्यादातर राजनीतिक दल सीधे कृषि से जुड़ने को आतुर हैं या परोक्ष रूप से इसका लाभ उठाना चाहते हैं ? भाकियू नेता राकेश टिकैत की पहली रैली मुजफ्फरनगर में हुई, जिसमें रालोद और आआपा के नेताओं ने भी शिरकत की थी। राकेश उत्तर प्रदेश के बाहर रैलियां कर रहे हैं, और उनके भाई पश्चिमी उत्तर प्रदेश में। किसान संगठनों और उनके नेताओं के बीच आपसी स्पर्धा है


संयुक्त किसान मोर्चा के नेता दर्शनपाल




प्रियंका का फर्जी ट्वीट और शराब का कांग्रेसी वायदा
आंदोलन के दौरान हर रोज कुछ न कुछ ऐसा हो रहा है, जो ध्यान खींचता है। सोशल मीडिया पर तो इस आंदोलन का जबर्दस्त ‘असर’ है। सोशल मीडिया पर फर्जी खबरों की भरमार है। प्रियंका गांधी वाड्रा ने एक ट्वीट में ऐसी ही गलती कर दी। गत 7 फरवरी को उन्होंने एक ट्वीट किया, जिसमें फौजी वर्दी पहने एक जवान की तस्वीर है, जो अपने पिता से मिल रहा है। ट्वीट के अनुसार यह जवान छुट्टी पर आया तो पहले धरने पर बैठे पिता के समर्थन में सीधे सिंघु बॉर्डर पर आया। वस्तुत: वह तस्वीर सिंघु बॉर्डर की नहीं थी। बाद में प्रियंका ने इस ट्वीट को हटा दिया था। यह तस्वीर कांग्रेस के ट्विटर हैंडल से भी जारी हुई थी।
उधर, हरियाणा की कांग्रेस नेता विद्या रानी के एक बयान ने राकेश टिकैत जैसे किसान नेता को भी हैरत में डाल दिया। उन्होंने कहा, ‘‘किसान आंदोलन हमें चलाना है; पैसा हो या शराब, हर तरह से किसानों की मदद करेंगे।’’ उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। विद्या रानी जींद जिले के गांव दनोदा की रहने वाली हैं। वे कांग्रेस के टिकट पर 2014 और 2019 में नरवाना से विधानसभा चुनाव लड़ चुकी हैं। बहरहाल विद्या रानी के बयान पर राकेश टिकैत ने कहा, ‘‘यहां शराब का क्या काम? मुझे नहीं पता कि उन्होंने ऐसे बयान क्यों दिए? ऐसे लोगों को आंदोलन में कुछ करने की जरूरत नहीं है। यह गलत है और ऐसा नहीं होना चाहिए। वे अपने आंदोलन में जो चाहें बांट सकते हैं।’’