ताइवान को वैक्सीन की जरूरत है, क्या लोकतांत्रिक देश फिर चीन के आगे झुकेंगे?

    दिनांक 22-फ़रवरी-2021
Total Views |
नम्रता हसीजा
ताइवान के स्वास्थ्य मंत्री चेन शिह-चुंग ने बीते 17 फरवरी को घोषणा करते हुए कहा था कि जर्मनी की बायोएनटेक ने ‘बाहरी ताकतों’(चीन) के दबाव में आकर ताइवान के साथ कोरोनावायरस वैक्सीन के लिए हुआ समझौता तोड़ दिया है। हालांकि उन्होंने इस बारे में सीधे-सीधे चीन का नाम नहीं लिया है, लेकिन ‘बाहरी ताकतों’ से उनका क्या आशय था, यह सभी को स्पष्ट हो चुका था।
c_1  H x W: 0 x

ताइवान के स्वास्थ्य मंत्री चेन शिह-चुंग ने बीते 17 फरवरी को घोषणा करते हुए कहा था कि जर्मनी की बायोएनटेक ने ‘बाहरी ताकतों’(चीन) के दबाव में आकर ताइवान के साथ कोरोनावायरस वैक्सीन के लिए हुआ समझौता तोड़ दिया है। हालांकि उन्होंने इस बारे में सीधे-सीधे चीन का नाम नहीं लिया है, लेकिन ‘बाहरी ताकतों’ से उनका क्या आशय था, यह सभी को स्पष्ट हो चुका था।
 

यह बात इसलिए और भी उलझन भरी है कि अभी दिसंबर में ही ताइवानी स्वास्थ्य मंत्री चेन ने घोषणा की थी कि ताइवान नेकोरोनावायरस वैक्सीन की दो करोड़ खुराक की उपलब्धता को सुनिश्चित कर लिया है, जिसमें से 47.6 लाख खुराक कोवैक्स ग्लोबल इनीशिएटिव से मिलना था, जबकि एक करोड़ इकाइयां ऑक्सफोर्ड/ऐस्ट्राज़ेनेका और 50 लाख खुराक एक विदेशी कम्पनी से मिलनी थीं। हालांकि उस समय चेन ने उस विदेशी वैक्सीन निर्माता का नाम नहीं बताया था, लेकिन वादा किया था कि कंपनी के साथ सौदा अंतिम रूप से हो जाने पर और विवरण दिए जाएंगे।

गौरतलब है गत 17 फरवरी को उन्होंने यह बात सार्वजनिक रूप से कही कि जिस विदेशी कंपनी का उन्होंने उल्लेख किया था वह बायोएनटेक थी। उन्होंने यह भी बताया कि सारी बातें तय हो जाने के बाद यह जर्मन फर्म आखिरी क्षण में मुकर गई और उसने समझौता करने से इनकार कर दिया। उन्होंने बताया कि आखिरी क्षणों में समझौते से पीछे हटने का एकमात्र कारण शंघाई फोसन फार्मास्युटिकल ( चीनी भागीदार) हो सकता है और उसने ही संभवतः इस सौदे का विरोध किया होगा

c1_1  H x W: 0

यद्यपि ताइवानी मंत्री ने फोसन का सीधे-सीधे उल्लेख नहीं किया, फिर भी उनका यह बताना सौदा रद्द होने में फोसन की भूमिका को स्पष्ट करता है कि सौदे से पीछे हटने के कारणों में बायोएनटेक ने ‘कोरोनावायरस वैक्सीन के वैश्विक वितरण की चुनौतियों’ और ‘कम्पनी नेतृत्व में आंतरिक असहमितयों’ का उल्लेख किया था। हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब चीन और ताइवान कोविड संबंधी मामलों पर आमने-सामने आए हैं या चीन ने ताइवान के बारे में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कोई बात कही हो
 
उल्लेखनीय है ताइवान एकमात्र ऐसा देश था, जिसने कोविड संकट के दौरान एक दिन भी तालाबंदी नहीं की। जब दुनिया के सर्वाधिक उन्नत देशों ने इस घातक महामारी के आगे घुटने टेक दिए थे, तब भी ताइवान इससे निपटने के एकदम अलग तरीकों के साथ खड़ा रहा। महामारी से निपटने में इस शानदार प्रदर्शन के बाद भी ताइवान को विश्व स्वास्थ्य संगठन में प्रेक्षक के रूप में आमंत्रित नहीं किया गया।

निःसंदहे यह महामारी के दौरान विकसित हुए कई देशों के रुख से बिल्कुल उलटी बात है। कहने का मतलब है कि वैश्विक महामारी कोविड-19 के कारण चीनी शासन के प्रति सम्पूर्ण अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की धारणा और रवैये में बड़ा बदलाव हुआ है। इस बदलाव के कारण 2020 में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अचानक एहसास हुआ कि ताइवान की स्वतंत्रता का बचाव करना उनके अपने हित और अपनी स्वतंत्रता के हित में है।


ऐसा लगता है कि यूरोप महामारी के दौरान भी लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकारों की अनदेखी के दुष्प्रभाव समझने में विफल रहा है। जर्मनी एक बार फिर से चीन की सनकी मांगों के आगे झुक गया है। जब भारतीय संचार माध्यमों में विश्व स्वास्थ्य संगठन में ताइवान को स्थान देने की वकालत करते लेख छपे, तब चीन ने भारतीय मीडिया हाउसों को भी ऐसी ही धमकियां दी थीं।


भारत में चीनी दूतावास के प्रवक्ता काउंसलर जी रोंग ने 12 मई 2020 को एक ढंकी-मुंदी धमकी भरा बयान जारी कर कहा था,  “हम संबंधित भारतीय मीडिया से चीन की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के मुख्य हितों से संबंधित मुद्दों पर सही रुख अपनाने, एक-चीन सिद्धांत का पालन करने और ताइवान की स्वतंत्रता से जुड़ी ताकतों को मंच प्रदान न करने और जनता में गलत संदेश भेजने से बचने का आग्रह करते हैं।
 

‘भेड़िया योद्धा’ कहे जाने वाले एक समूह के अत्यंत प्रमुख सदस्य और चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियन ने भी 15 मई, 2020 को एक कड़ा संदेश दिया था कि ताइवान विश्व स्वास्थ्य संगठन में तभी शामिल हो सकता है जब वह एक-चीन नीति का पालन करे। ऐसे में, चीन ताइवान को वैक्सीन की आपूर्ति रोकने की कोशिश क्यों कर रहा है? इसका पहला कारण बीजिंग की उस नीति में देखा जा सकता है जिसमें वह चीन में रह रहे ताइवानियों को प्राथमिकता पर कोविड-19 वैक्सीन लगा रहा है। इससे ताइवान सरकार चिंतित है और वह इसे द्वीप के लोगों का दिल जीतने के नए चीनी हथकंडे के रूप में देखती है।


ताइवान को अपना क्षेत्र बताने वाला चीन ये टीके ऐसे समय निःशुल्क लगा रहा है जब लोकतांत्रिक द्वीप (ताइवान) में टीके लगने की शुरुआत भी नहीं हुई है और टीकों के लिए वैक्सीन की खरीद का एक बड़ा सौदा भी चीन के कारण रद्द हो गया है। रेडियो फ्री एशिया के अनुसार चीन ने यह कार्रवाई संभवतः ताइवान को सबक सिखाने के लिए की है जिसने चीन में बनी कोविड-19 वैक्सीन के आयात पर प्रतिबंध की बात 26 जनवरी 2021 को उस समय दोहराई थी। जब चीनी सेना बार-बार उसके वायु रक्षा क्षेत्र का अतिक्रमण करके क्षेत्र में तनाव पैदा करने की कोशिशें कर रही थी।
 

चीनी सरकार के सुधार विचार केंद्र से सेवानिवृत्त हुए और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के आलोचक चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के एक अधिकारी का इस पर एक अलग नजरिया है। 12 जनवरी, 2021 को लिआंग जिंग (छद्म नाम से) रेडियो फ्री एशिया पर अलग से लिखे गए लेख में इस अधिकारी ने कहा कि अमेरिका और अन्य विकसित देशों को इस कोविड-19 महामारी का मुकाबला करने में समर्थ बनाने वाली नई वैक्सीन तकनीक ने चीन के फायदे की स्थिति को उलट कर नुकसान में बदल दिया है। इस परिवर्तन का महत्व भविष्य में अमेरिका-ताइवान संबंधों के विकास को प्रभावित करेगा। इससे निश्चित रूप से दोनों पक्षों के बीच सहिष्णुता पैदा होगी और अपने संबंधों के आरपार देख सकने का काल-गवाक्ष भी बनेगा।

उनका कहना था कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ताइवान नीति सकारात्मक परम्परा के रूप में नहीं देखी जा सकती है और इसे उस फ्यूज के रूप में देखा जा सकता है, जिसके कारण दोनों देशों के बीच संघर्ष नियंत्रण से बाहर चला गया, फिर भी मजबूत नेता भारी जोखिम वाली राजनीति करते ही हैं। अभी भी दुनिया में कोविड संकट के बड़े पैमाने पर बरकरार रहने के मद्देनजर लोकतांत्रिक देशों का यह महसूस करना महत्वपूर्ण है कि वे चीन के अभद्र व्यवहार और दादागीरी के कारण ताइवान के 2.3 करोड़ लोगों के स्वास्थ्य की अनदेखी नहीं कर सकते।

 
यह जर्मनी ही नहीं, बल्कि भारत सहित अन्य देशों के लिए भी ऐसी घड़ी है कि ताइवान को वैक्सीन उपलब्ध करवाने के लिए वैक्सीन बेचने में ‘एक चीन नीति’ की उलझनों से बचने के लिए वे इसे बेचने के बजाय दान कर दें।
(लेखिका सेंटर फॉर चाइना एनालिसिस ऐंड स्ट्रैटेजी में रिसर्च फेलो हैं)