चुनौतियां स्वीकार करना 'मेट्रो मैन' ई.श्रीधरण का स्वभाव है

    दिनांक 23-फ़रवरी-2021
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शंभु प्रसाद सिन्हा
मेट्रो मैन' ई.श्रीधरण को खास बनाता है चुनौतियां स्वीकार कर ढलती उम्र की परवाह किए बिना एक बार फिर से खड़ा हो जाने वाला उनका स्वभाव। ललकार को ज़िम्मेदारी में बदल देने वाली उनकी आदत

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कहानी थोड़ी पुरानी है। त्रेता युग के रावण ने देवी सीता का हरण कर लिया था मगर उन्हें रखा कहां था यह पता लगाना बाकी था। भक्त हनुमान के अनुग्रह से ही यह दुर्गम काज सुगम हो सका। रामेश्वरम में शिव की पूजा हुई। समुद्र पर पुल बना। सेना लंका पहुंची। सीता का उद्धार हुआ। सीता सहित श्री राम लौटे और रामराज्य आया।



कलयुग आया। रामेश्वरम अब तक तीर्थ बन चुका था। पम्बन पुल के ऊपर से दौड़ती रेलगाड़ियां रामेश्वरम के आगे, धनुषकोटी तक आती-जाती थीं। एक बार फिर से सुनामी लहरें आईं और तीर्थयात्रियों से भरी रेलगाड़ी सहित पम्बन पुल को बहा ले गईं। संसद में तय हुआ कि छ: महीने के अंदर दो किलोमीटर लंबे क्षतिग्रस्त पुल को बना कर और नई रेल लाइनें बिछाकर रेल-सेवा फिर से बहाल की जाए। एक युवा एग्जीक्यूटिव इंजीनियर को यह कार्य भार सौंपा गया और उसे छह की जगह मात्र तीन महीने में इसे करने के लिए कहा गया। कार्य दुर्गम था। रात-दिन एक कर काम हुआ और ठीक डेढ़ महीने में पुल बन कर तैयार हो गया। पूरा देश कलयुग के इस नए संकटमोचन से परिचित हुआ। सिविल इंजीनियर की उम्र थी महज बत्तीस साल और नाम था श्रीधरण।

दो दोस्त कभी काकीनाड़ा में साथ पढ़ते थे। एक चीफ़ एलेक्शन कमिश्नर के पद से सेवानिवृत्त हुए, दूसरे इंडियन रेलवे में सिविल इंजीनियर से सेवानिवृत्त हुए। टी. एन. शेषन और श्रीधरण के अतिरिक्त और भी ढेर सारे लोग उन पदों पर काम कर चुके होंगे मगर दिग्गज कहा जाए तो दो ही बनें। इस जानकारी के बाद कुछ तो होंगे जो काकीनाड़ा के पास से गुज़रते हुए उस कॉलेज को देखना चाहेंगे, जहां दोनो दोस्त पढ़ते थे।

जिन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण, जैसे सम्मान ही नहीं बल्कि फ्रांस और जापान जैसे देशों के उच्च सम्मानों से भी सम्मानित किया गया। जिस शख्सियत पर ढेर सारी डॉक्यूमेंट्री स्क्रिप्ट और जीवनियां, पहले भी लिखी जा चुकी हों, उसकी शान में कुछेक पैराग्राफ़ और सही। पुराने मुहावरों की जगह नए मुहावरे बनते और जुड़ते रहते हैं। ‘सूरज को दीपक दिखाना’ कभी एक पुराना मुहावरा हुआ करता था। ‘श्रीधरण की तारीफ करना’ अब नया मुहावरा बन चुका है।

कोंकण रेलवे की फ़ाइल पर अंग्रेज बहादुर बीस साल तक लगे रहे और अंत में उस पर ‘मिशन इम्पॉसिबल’ लिख कर फ़ाइल को बंद कर दिया गया। फ़ाइल की किस्मत फिर से जगी और श्रीधरण जी के हाथों तक पहुंची। नतीजा सब ने देखा। कच्ची मिट्टी के पहाड़ों में सुरंगों का बनना नामुमकिन सा था फिर भी 91 सुरंगें बनीं जिसमें एक तो छह किलोमीटर लंबी थी और लगभग दो हज़ार पुल भी बने। रेल लाइनें ऐसी बनीं कि भविष्य में तेज रफ़्तार वाली गाड़ियां भी चाहें तो चल सकें। कोंकण रेलवे का परिचय शब्दों में दे पाना कठिन है। उसे पास जाकर देखना और महसूस करना पड़ता है।


कहा जाता है कि चमत्कार नहीं होते लेकिन कोंकण रेलवे इसका अपवाद है, एक चमत्कार है। रेल का टिकट लोग तभी ख़रीदते हैं जब यात्रा के अंत में कहीं पहुंचना हो। कुछेक यात्री कोंकण रेल का टिकट उस चमत्कार को अपनी आंखों देखने के लिए भी खरीदते हैं।

भारत का पहली मेट्रो बननी थी, श्रीधरण कोलकाता बुलाए गए। फिर दिल्ली मेट्रो शुरू होना थी। श्रीधरण रिटायर्ड हो चुके थे। सरकारी क़ानून में गुंजाइश निकाल कर श्रीधरण को कार्यभार सौंपा गया। कर्मचारियों के प्रशिक्षण के लिए दिल्ली में विश्व की एकमात्र मेट्रो एकादमी बनी। अगले दशक के लिये भी विदेशी मेट्रो कंपनियों ने एकादमी की सीटें आरक्षित करा ली हैं। श्रीधरण को आज सारा विश्व 'मेट्रो मैन' के रूप में जानता है।अगर मेट्रो ट्रेन में तीन मिनट से कम विलम्ब है तो विश्व स्तर पर उन्हें समय का पाबंद माना जाता है। हिंदुस्तान के दिल्ली मेट्रो का अपना अलग स्तर है। यहां उनके साठ सेकेंड से भी कम विलम्ब के रहने पर ही समय की पाबंदी माना जाता है। श्रीधरण अब अवकाश प्राप्त कर चुके हैं। दिल्ली मेट्रो आज भी 99.97 % समय की पाबंदी निभाती है।

पम्बन पुल को फिर से खड़ा कर पाने की चुनौती को आज छप्पन साल बीत गए। बत्तीस साल के नवयुवक आज अट्ठासी साल के बुजुर्ग बन चुके हैं। इस बीच काफी कुछ बदल गया अगर कुछ नहीं बदला है, तो चुनौतियां स्वीकार कर ढलती उम्र की परवाह किए बिना एक बार फिर से खड़ा हो जानेवाला उनका स्वभाव और ललकार को ज़िम्मेदारी में बदल देने वाली उनकी आदत।

महाबली राजा का अपना प्यारा क्षेत्र केरल आज संकट में है। सबसे ज्यादा शिक्षित राज्य के रूप में विख्यात प्रांत आज एक वामपंथी क़िला भर बनकर रह गया है। ख़बरों में छाया तो रहता है, मगर हमेशा गलत कारणों से। स्वर्ण भूमि के रखवालों पर सोने की तस्करी और जाली नोटों जैसे अपराधों के आरोप लगते हैं। घुन हो या दीमक, एक बार लग जाए तो उसकी साफ सफाई दुर्गम हो जाती है। आवश्यकता है, तो एक संकटमोचन की जो उस क़िले को ध्वस्त कर उसे मलबा सहित हिंद महासागर में डाल आए।
( लेखक हिंदुस्तान दैनिक में पूर्व कॉलमिस्ट रहे हैं और उन्होंने ‘शिनाख्त से ख्वाहिश तक’ नामक पुस्तक लिखी हैं)