अब आयातक नहीं, निर्यातक है भारत

    दिनांक 23-फ़रवरी-2021   
Total Views |
एक समय था जब हमारा देश अधिकांश रक्षा उपकरणों का आयात करता था, लेकिन अब भारत उन उपकरणों का निर्यातक बन चुका है। केंद्र सरकार ने रक्षा क्षेत्र में जो सुधारात्मक कदम उठाए हैं, उनका सुपरिणाम मिलने लगा है। दुनिया के कई देश भारत की इस उपलब्धि से हैरान हो रहे

d_1  H x W: 0 x
ब्रह्मोस हथियार प्रणाली, जिसका भारत निर्यात करेगा

भारत रक्षा क्षेत्र में निर्यातक की बड़ी भूमिका में आ गया है। पिछले दिनों केंद्र सरकार ने आर्टिलरी गन, स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान, टैंकरोधी बारूदी सुरंग सहित 156 रक्षा उपकरणों के निर्यात को मंजूरी दे दी है। इससे पहले भारत ने आकाश मिसाइल के निर्यात के लिए अपनी मंजूरी दे दी थी, लेकिन अब ब्रह्मोस हथियार प्रणाली, बियॉन्ड विजुअल रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल एस्ट्रा और एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल नाग भी निर्यात के लिए तैयार हैं। देश आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ रहा है और हमारी काबिलियत का लोहा सारा विश्व मान रहा है।

भारत सरकार अब रक्षा उत्पादन निर्यात प्रोत्साहन नीति 2020 के अनुसार 2025 तक 35,000 करोड़ रु. के रक्षा उपकरणों के निर्यात को हासिल करने का लक्ष्य लेकर अपने रक्षा निर्यात को बढ़ा रही है। आत्मनिर्भरता के लिए निर्यात बढ़ाने और घरेलू रक्षा उद्योग का निर्माण करने के उद्देश्य से 1,75,000 करोड़ रु. (25 अरब डॉलर) के कारोबार का लक्ष्य है। यह नीति भारतीय उद्योग से घरेलू खरीद को दुगुना करने की भी है।

डीआरडीओ के प्रमुख जी. सतीश रेड्डी का कहना है, ‘‘अगले 4-5 साल में देश के रक्षा निर्यात में जबरदस्त बढ़ोतरी होगी।’’ भारतीय सैन्य बलों के पास बड़ी मात्रा में स्वदेशी साजो-सामान है। रेड्डी यह भी कहते हैं, ‘‘हमने अपनी हर परियोजना में विकास और निर्माण के लिए उद्योगों को भागीदार बनने का न्योता दिया है। यहां तक कि मिसाइल प्रणाली जैसे अहम क्षेत्रों को भी निजी कंपनियों के लिए खोला है।’’

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का कहना है, ‘‘भारत की सामरिक स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए रक्षा उपकरणों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करना महत्वपूर्ण है।’’ रक्षा मंत्री ने अधिकारियों से आइडेक्स (रक्षा उत्कृष्टता के लिए नवोन्मेष) के तहत स्टार्ट-अप संस्थाओं को मिलने वाले अनुदान को भी बढ़ाने को कहा। पिछले दिनों बेंगलुरु में ‘एयरो इंडिया-2021’ में ‘स्टार्टअप मंथन’ को संबोधित करते हुए राजनाथ सिंह ने कहा था, ‘‘आइडेक्स हमारे देश में तैयार एक बहुत प्रभावी और अच्छी तरह क्रियान्वित रक्षा स्टार्टअप प्रणाली है। यह आत्मनिर्भरता हासिल करने की दिशा में निर्णायक कदम है।’’ उन्होंने आगे कहा था, ‘‘स्टार्टअप इंडिया कार्यक्रम की शुरुआत के बाद यह अभियान पूरी तरह सफल रहा है। आज 41,000 से अधिक स्टार्टअप हैं और इनमें 4.7 लाख लोगों को नौकरी मिली है।’’ उन्होंने कहा कि ‘फंड आॅफ फंड्स’ योजना के माध्यम से 384 स्टार्टअप में 4,500 करोड़ रु. का निवेश किया गया है। वहीं आत्मनिर्भर भारत योजना के अंतर्गत भारत विभिन्न रक्षा उपकरणों और मिसाइल उत्पादन क्षमता को लगातार बढ़ावा दे रहा है।

आज हमारे देश की अनेक सरकारी कंपनियां विश्व स्तर के हथियार बना रही हैं और भारत विश्व के 42 देशों को रक्षा सामग्री निर्यात कर रहा है। आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ‘मेक इन इंडिया’ से आगे बढ़ते हुए ‘मेक फॉर वर्ल्ड’ की नीति पर चलते हुए केंद्र सरकार ने 2024 तक 35,000 करोड़ रु. के सालाना रक्षा निर्यात का लक्ष्य रखा है। सरकारी आंकड़ों से इतर अगर जमीनी हकीकत की बात करें, तो 2016-17 में भारत का रक्षा निर्यात 1,521 करोड़ था, जो साल 2018-19 में 10,745 करोड़ तक पहुंच गया है। यानी करीब 700 प्रतिशत की बढ़ोतरी।
पिछले दिनों अमेरिका की प्रमुख रक्षा कंपनी लॉकहीड मार्टिन ने भारत में औद्योगिक अवसरों की तलाश के लिए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के साथ एक सहमतिपत्र पर हस्ताक्षर किए। लॉकहीड मॉर्टिन एयरोनॉटिक्स के कारोबारी विकास एकीकृत फाइटर समूह के उपाध्यक्ष जे. आर. मैकडॉनल्ड ने कहा, ‘‘हम एशिया की सबसे बड़ी एयरोस्पेस कंपनियों में से एक एचएएल के साथ संभावित अवसरों का पता लगाने के लिए उत्साहित हैं।’’

रक्षा आत्मनिर्भरता 
दरसअल, आजादी के बाद से ही भारत अपनी सीमाओं की रक्षा हेतु उपयोग में आने वाली आवश्यक सैन्य सामग्री के लिए रूस, अमेरिका, इज्राएल और फ्रांस जैसे देशों पर निर्भर था। इसके अलावा चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों के चलते पिछले कुछ वर्षों में भारत रक्षा के क्षेत्र में सर्वाधिक खर्च करने वाला विश्व का तीसरा देश बन गया था। एक रपट के अनुसार 2019 में अमेरिका और चीन के बाद भारत रक्षा क्षेत्र में सर्वाधिक खर्च कर रहा था। पाकिस्तान द्वारा लगातार आतंकवादी घुसपैठ की कोशिशें और चीन के साथ हालिया सीमा विवाद की वजह से रक्षा बजट का ज्यादा होना जरूरी भी है। लेकिन आज के भारत की खास बात यह है कि सेना की इन जरूरतों को अब देश में ही पूरा किया जाएगा। इसके लिए सरकार ने बीते कुछ समय में ठोस निर्णय लिए जिनके सकारात्मक परिणाम अब सामने भी आने लगे हैं। सबसे महत्वपूर्ण निर्णय था तीनों सेनाओं के प्रमुख ‘चीफ आॅफ डिफेन्स स्टाफ’ के पद का सृजन करना। हालांकि इस पद के निर्माण की सिफारिश 2001 में ही की गई थी, लेकिन यह 2019 में अस्तित्व में आ पाया। इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि तीनों सेनाओं में एक समन्वय स्थापित हुआ। दूसरा प्रभावशाली कदम था रक्षा क्षेत्र में एफडीआई की सीमा 49 प्रतिशत से बढ़ाकर 74 प्रतिशत करना। तीसरा सबसे बड़ा कदम था सेना के कुछ सामान (101 वस्तुओं की सूची) के आयात पर 2020-24 तक प्रतिबंध लगाना। परिणामस्वरूप इन वस्तुओं की आपूर्ति भारत में निर्मित वस्तुओं से ही की जा सकती थी। 
यह भारतीय रक्षा उद्योग के लिए एक प्रकार से अवसर था अपनी निर्माण क्षमताओं को विकसित करने का। यह देश के लिए गर्व का विषय है कि इस उद्योग ने मौके का भरपूर सदुपयोग करते हुए अनेक विश्वस्तरीय स्वदेशी रक्षा एवं सैन्य उपकरणों का सफलतापूर्वक निर्माण करके आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य के प्रति ठोस कदम बढ़ाया है। इन उपकरणों के नाम और काम दोनों भारत के गौरवशाली अतीत का स्मरण कराते हैं।


d_1  H x W: 0 xएयरो इंडिया-2021 

पिछले दिनों बेंगलुरू में एशिया की सबसे बड़ी एयरो-स्पेस और रक्षा प्रदर्शनी ‘एयरो इंडिया-2021’ के 13वें संस्करण में भारतीय वायुसेना ने पूरी दुनिया को अपना दमखम दिखाया। इसे एशिया की सबसे बड़ी सैन्य विमानन प्रदर्शनी कहा जाता है। एयरो-शो में दुनियाभर की कई बड़ी एयरो-स्पेस कम्पनियां भी भारत के साथ मिलकर भारत में ही अपने हथियारों का उत्पादन करने के लिए पहुंचीं। बेंगलुरू में तीन दिन तक चली सैन्य साजो-सामान और लड़ाकू विमानों की प्रदर्शनी में एयरो-स्पेस क्षेत्र में भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता और देश की लगातार बढ़ती ताकत को देखते हुए कुछ रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि वह दिन दूर नहीं, जब इस क्षेत्र में भारत दुनिया का पहले नंबर का शक्तिशाली देश होगा। मौजूदा समय में अमेरिका, उत्तर कोरिया और रूस के बाद भारतीय सैन्यशक्ति की दुनिया में चौथे क्रमांक पर है। प्रदर्शनी में कुछ साजो-सामान असली रखे गए थे, जबकि कुछ के हू-ब-हू मॉडल और इस प्रदर्शनी में 14 देश शामिल हुए थे।

इसमें कुल 603 प्रदर्शक (525 भारत के तथा 78 अन्य देशों के) रखे गए थे। सैकड़ों कम्पनियों ने वर्चुअली अपने हथियारों और दूसरे सैन्य साजो-सामान को प्रदर्शित किया, इसीलिए इसे ‘हाईब्रीड-मोड’ प्रदर्शनी नाम दिया गया था। एयरो शो में लाखों लोग शामिल हुए, जिनमें 16,000 से अधिक व्यक्ति प्रत्यक्ष तौर पर जबकि 4,50,000 से ज्यादा वर्चुअल माध्यम से जुड़े। राजनाथ सिंह के अनुसार एयरो इंडिया शो के जरिए भारत अपने मित्र देशों के लिए हथियारों का ‘नेट-एक्सपोर्टर’ बनना चाहता है। एयरोस्पेस क्षेत्र में भारत के बढ़ते दबदबे का ही असर है कि अब ‘मेक इन इंडिया’ के तहत दुनिया की हर बड़ी कम्पनी भारत में ही हथियारों का निर्माण करना चाहती है। इस शो के दौरान  राजनाथ सिंह ने दुनिया को स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के तहत भारत अपनी रक्षा उत्पादन क्षमताओं को बढ़ाने की दिशा में तत्पर है और अपनी रक्षा के लिए अब दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रह सकता। उनके अनुसार भारत की सामयिक स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए रक्षा उपकरणों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करना जरूरी है और विश्व ने भारत को अब एक भरोसेमंद रक्षा निवेश गंतव्य के रूप में मान्यता देना शुरू कर दिया है। पिछले दिनों हिंद महासागरीय क्षेत्र (आईओआर) के देशों के रक्षा मंत्रियों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए राजनाथ सिंह ने कहा था कि भारत आईओआर के देशों को मिसाइल तथा इलेक्ट्रॉनिक युद्धक प्रणाली सहित विभिन्न हथियार प्रणालियों की आपूर्ति करने के लिए तैयार है।

केंद्र सरकार का गंभीर प्रयास 
असल में जब भारत आजाद हुआ था तो यहां रक्षा उत्पादन के लिए काफी क्षमता और परिवेश उपलब्ध था, लेकिन दशकों तक कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। रक्षा क्षेत्र में सुधार लाने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। इस दिशा में कई ठोस कदम उठाए गए हैं, जैसे: लाइसेंस प्रक्रिया में सुधार, सभी के लिए समान अवसर उपलब्ध कराना, निर्यात प्रक्रिया को सरल बनाना आदि। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि एक आधुनिक और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए रक्षा क्षेत्र में आत्मविश्वास की भावना आवश्यक है। आयुध कारखानों के निगमीकरण के बारे में प्रधानमंत्री ने कहा था कि पूरा होने पर ये श्रमिकों और रक्षा क्षेत्र दोनों को मजबूत करेंगे। प्रधानमंत्री ने आधुनिक उपकरणों में आत्मनिर्भरता के लिए प्रौद्योगिकी उन्नयन की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि डीआरडीओ के अलावा सरकार भी निजी क्षेत्र में और शैक्षणिक संस्थानों में अनुसंधान एवं नवाचार को प्रोत्साहित कर रही है। विदेशी साझेदारों के साथ संयुक्त उद्यम के जरिए सह-उत्पादन पर जोर दिया गया है। रक्षा उपकरणों के उत्पादन की बुनियादी जरूरतों के लिए पांच वर्ष में 20,000 करोड़ रु. के निवेश का लक्ष्य रखा गया है।

कुल मिलाकर सामूहिक प्रयासों से हमें आत्मनिर्भर बनने के संकल्प को जारी रखने और एक आत्मनिर्भर भारत बनने में मदद मिलेगी। अब तक भारत के रक्षा निर्यात में मूलत: कल/पुर्जे शामिल थे। बड़े रक्षा सामान का निर्यात कम से कम था। कैबिनेट की इस मंजूरी के बाद देश को अपने रक्षा उत्पादों को उन्नत करने और उन्हें वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने में मदद मिलेगी। चूंकि सरकार ने रक्षा उत्पादन क्षेत्र को सार्वजनिक और निजी दोनों के लिए खोल दिया है, इससे इस क्षेत्र में निवेश और नई प्रौद्योगिकी को बढ़ावा मिलने की संभावना है।

पूरी दुनिया में छाए कोरोना संकट के बीच हमें अब यह बात समझ लेनी चाहिए कि स्वदेशी तकनीक और आत्मनिर्भरता का कोई विकल्प नहीं है। आज हमारे देश की बनाई हुई वैक्सीन का निर्यात पूरी दुनिया में हो रहा है। इसलिए अगर सकारात्मक सोच और ठोस रणनीति के साथ हम लगातार अपनी प्रौद्योगीकीय जरूरतों को पूरा करने की दिशा में आगे कदम बढ़ाते रहे तो वे दिन दूर नहीं जब हम खुद अपने नीति-नियंता बन जाएंगे और दूसरे देशों पर किसी तकनीक, हथियार और उपकरण के लिए निर्भर नहीं रहना पड़ेगा, बल्कि कम समय में ही भारत रक्षा क्षेत्र में विश्व का प्रमुख उत्पादक देश बनकर उभरेगा।  
(लेखक मेवाड़ विश्वविद्यालय के निदेशक और ‘टेक्निकल टुडे’ पत्रिका के संपादक हैं)