सिर्फ टकराव और बिखराव

    दिनांक 23-फ़रवरी-2021
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पंकज दास

नेपाल में वामपंथियों ने देश को अनिश्चितता के गर्त में धकेल दिया है। सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी टूट के बाद कई गुटों में बंट गई है। हर गुट किसी न किसी तरह सत्ता पर काबिज होना चाहता है
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संसद भंग करने के फैसले के विरुद्ध नेपाल में लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं

नेपाल के वामपंथी दलों का सपना हमेशा से देश की सत्ता और व्यवस्था पर कब्जा करना रहा है। इसी इरादे से तीन साल पहले नेपाल के दो बड़े वामपंथी दलों ने अचानक एकजुट होने की घोषणा कर सबको चौंका दिया था। हालांकि यह न तो अप्रत्याशित था और न ही अनपेक्षित, क्योंकि चीन करीब एक दशक से इस प्रयास में था कि यहां एक मजबूत वामपंथी पार्टी बनाकर वह उसके जरिए अपने विस्तारवादी एजेंडे को लागू कर सके। लिहाजा, विलय के बाद नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ और चीनी की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) के साथ उसका एक समझौता भी हुआ। इसमें नेपाल में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के विचारों को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता जाहिर की गई थी। लेकिन तीन साल में ही नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी विभाजित हो गई।

नेपाल में कम्युनिस्ट सरकार बनने के बाद से ही पार्टी के चार शीर्ष नेताओं ने सत्ता पर काबिज होने के लिए एक-दूसरे के विरुद्ध षड्यंत्र रचना शुरू कर दिया था। प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली हर हाल में सत्ता में बने रहना चाहते थे, जबकि उनके सहयोगी पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ उन्हें बेदखल कर खुद सत्ता पर काबिज होना चाहते थे। दोनों शीर्ष नेताओं के बीच मतभेद का फायदा उठाते हुए माधव कुमार नेपाल आग में पेट्रोल डालते रहे। ओली और दहल के झगड़े में वे अपना फायदा देख रहे थे। उन्हें लगता था कि सत्ता की चाबी उनके हाथ लग सकती है। उधर इन तीनों नेताओं की चालाकियों और चालबाजियों के बीच बामदेव गौतम कभी इस पाले में तो कभी उस पाले में रह कर संतुलन बनाने का असफल प्रयास करते रहे। उन्हें भी यह उम्मीद थी कि तीनों के झगड़े में शायद प्रधानमंत्री पद के लिए उनके नाम पर सहमति बन जाए।  लेकिन ऐसा नहीं हो सका और शीर्ष नेताओं के षड्यंत्रों के कारण सत्तारूढ़ पार्टी में ही विभाजन हो गया। इसी के साथ पार्टी में कई गुट बन गए। इस तरह, पांच साल के लिए चुनी गई प्रतिनिधि सभा को महज तीन साल में ही वामपंथी नेताओं के स्वार्थ की वेदी पर बलि चढ़ा दिया गया। साथ ही, देश की जनता को भी दो खेमों में बांट दिया गया। बीते चुनाव में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी ने राजनीतिक स्थिरता व स्थायित्व के नाम पर वोट मांगा तो दो दशकों की राजनीतिक अस्थिरता से तंग जनता ने उसे करीब दो तिहाई बहुमत के साथ संसद में भेजा, पर वामपंथी नेताओं की चाल, चरित्र और चेहरा नहीं बदला। इस पार्टी और संसद की भी वही नियति हुई जो इससे पहले होती आ रही थी।

जब दुनियाभर की सरकारें कोरोना महामारी से अपने लोगों व अर्थव्यवस्था को बचाने की जद्दोजहद कर रही थीं, तब नेपाल की कम्युनिस्ट सरकार कोरोना के नाम पर आने वाली सामग्री में चीनी कंपनियों के साथ मिलकर भ्रष्टाचार में डूबी थी। शासन व्यवस्था से जनता के ध्यान को भटका कर पार्टी के आतंरिक विवाद पर केंद्रित कर दिया गया था ताकि सरकार की विफलताओं के बारे में न तो सरकार से और न ही सत्तारूढ़ दल से कोई सवाल पूछ सके। ओली की सत्ता सनक, दहल के सत्ता स्वार्थ और सत्ता के लिए माधव नेपाल की छटपटाहट ने देश को राजनीतिक अस्थिरता के गर्त में धकेल दिया, जिससे संसद और संविधान, दोनों ही खतरे में हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि सत्ता के लिए वामपंथी नेताओं के षड्यंत्र के कारण देश की एकता, लोकतंत्र और गणतंत्र सब कुछ खतरे में दिख रहा है। जिस लोकतंत्र की स्थापना के लिए जनता ने अपना बलिदान दिया, एकता के लिए खून बहाया, वामपंथी नेताओं द्वारा उसे ही खत्म करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है।

नेपाल में संसद भंग करने के बाद गुटों में बंटी सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी मध्यावधि चुनाव की घोषणा कर उसकी तैयारी का दिखावा कर रही है और सत्ता से बाहर किए गए समूह विपक्ष की तरह धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। एक गुट सत्ता में रह कर मध्यावधि चुनाव कराने का दावा कर रहा है, जो असंभव दिखता है, जबकि दूसरा समूह चुनाव रोकने के लिए पूरी ताकत लगा रहा है। जब तक दहल का स्वार्थ पूरा होता रहा, तब तक ओली की आड़ में वे नेपाल में भारत के विरुद्ध माहौल बनाते रहे। दहल ने चीन की शह पर भारत पर कई बेबुनियाद आरोप लगाए। उन्हीं के इशारे पर सत्तारूढ़ दल के नेता बेवजह भारत के खिलाफ माहौल बनाने में जुटे रहे। चीन का हित साधने के लिए दहल ने ही जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने और राज्य के पुनर्गठन के बाद नए नक्शे के प्रकाशन को बिना वजह तूल देकर भारत पर नेपाल की जमीन हड़पने का आरोप लगाया। भारत द्वारा आपसी संबंध बनाए रखने और बातचीन से सीमा विवाद सुलझाने की पेशकश के बावजूद दहल ने देश में ऐसा माहौल बना दिया, जिसमें ओली सरकार फंस गई और भारत के साथ संबंध बिगड़ने से रोक नहीं पाई। नतीजा, दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंध सबसे खराब दौर से गुजरे।

भारत द्वारा नक्शा प्रकाशन के जवाब में चीन के कहने पर दहल ने ही पार्टी की बैठक में जबरन नया नक्शा प्रकाशित करने का एजेंडा सरकार के नीति कार्यक्रम में रखवाया और इसके तत्काल प्रकाशन के लिए ओली को मजबूर किया। ओली ने दो कदम आगे बढ़ कर इन कार्यों का श्रेय लिया ताकि वे ‘राष्ट्रवाद’ (भारत विरोधी) के बल पर सत्ता में बने रह सकें। हालांकि ओली पहले दहल के बुने जाल में फंसे, फिर उन्होंने उसी जाल में दहल को फंसा कर उन्हें सड़क पर ला दिया। सत्ता से बाहर किए जाने के बाद दहल को भारत की याद आई और अब वे उससे मदद की गुहार लगा रहे हैं। दहल चीख-चीख कर कह रहे हैं कि ओली ने संसद भंग कर लोकतंत्र की हत्या कर दी है तो भारत खामोश क्यों है? दहल चाहते हैं कि ओली के विरुद्ध संघर्ष में भारत उनका समर्थन करे और संसद भंग करने के विरोध में बयान दे। लेकिन सवाल यह है कि दहल को अचानक लोकतंत्र की याद कैसे आ गई? वे तो चीन के साथ मिलकर नेपाल की सत्ता पर कब्जा करना चाहते हैं और देश पर शासन व्यवस्था का चीनी मॉडल थोपना चाहते हैं।

आश्चर्य है कि जिस चीन के इशारे पर उन्होंने नेपाल में भारत विरोधी माहौल बनाया, भारत विरोधी नक्शा जारी करवाया और उसे संविधान का अंग बनाया, उस चीन ने अभी तक न तो संसद के विघटन और न ही लोकतंत्र की हत्या के विरुद्ध कुछ कहा है। जो खुद ही लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास नहीं रखता, वह किस नैतिकता के आधार पर बोलेगा? जब दहल से यही बात पूछी गई तो उन्होंने कहा कि चीन इस विषय पर बोलेगा, ऐसा विश्वास नहीं है, पर भारत को इस पर बोलना चाहिए। उनका तर्क है कि जब ओली लोकतंत्र के खिलाफ काम कर रहे हैं तो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश भारत चुप क्यों है? वे कहते हैं, ‘‘नेपाल के हर जन आंदोलन में भारत की सकारात्मक भूमिका रही है। नेपाल के हर परिवर्तन में भारत का साथ और सहयोग मिला है। भारत ने नेपाल में लोकतंत्र और गणतंत्र की बहाली का खुलकर समर्थन किया, पर आज कुछ भी नहीं बोल रहा है।’’ दहल केवल यह सब कह ही नहीं रहे हैं, बल्कि दिल्ली में वामपंथी नेताओं, कथित बुद्धिजीवियों, पत्रकारों के जरिए भारत सरकार को अपने पक्ष में करने का प्रयास भी कर रहे हैं। समर्थन हासिल करने के लिए उन्होंने भारत का दौरा भी किया, लेकिन उन्हें खास सफलता नहीं मिली। नेपाल में भारत विरोधी माहौल बनाने और चीन को नेपाल में हावी होने देने से पहले वे यह भूल गए कि जब नेपाल सरकार ने उन्हें आतंकवादी घोषित किया था, तब भारत ने ही उन्हें शरण दी थी। वे यह भी भूल गए कि सशस्त्र विद्रोह में जब उनके साथी मारे जा रहे थे तब भारत के ही प्रयास से 12 सूत्री समझौता कर उनके नेतृत्व में माओवादियों के शांतिपूर्ण राजनीति में आने का रास्ता खुला था।

नेपाल में जब राज शाही ने निर्वाचित सरकार को बर्खास्त कर तानाशाही शासन की शुरुआत की थी, तब भारत के सहयोग से हुए जन आंदोलन के बाद वहां लोकतंत्र की पुनर्बहाली हुई थी और जनप्रतिनिधियों द्वारा संविधान निर्माण के उनके सपने को भारत के सहयोग से ही पूरा किया जा सका था। भारत के अहसान तले दबे होने के बावजूद दहल भारत के विरुद्ध षड्यंत्र रचते रहे और आज जब उसी षड्यंत्र के शिकार हुए तो उन्हें फिर से भारत की याद आई है। नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय में संसद भंग करने के मामले पर बहस पूरी हो चुकी है, जबकि नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन का मामला चुनाव आयोग के समक्ष विचाराधीन है। उधर, सरकार द्वारा घोषित मध्यावधि चुनाव की तारीख भी निकट आ रही है। इसे देखते हुए आयोग कभी भी पार्टी विवाद पर फैसला सुना सकता है। भारत से अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने से निराश दहल अब धमकी दे रहे हैं कि अगर शीर्ष अदालत का फैसला ओली के पक्ष में आया तो वे अदालत के आदेश के विरुद्ध जाएंगे। इसी तरह, उन्होंने चुनाव आयोग को भी धमकी दी है कि अगर उनकी अगुआई वाले गुट को नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के रूप में मान्यता नहीं दी गई तो वे जनता को साथ लेकर आयोग का घेराव करेंगे। मतलब, वे न अदालत के फैसले का सम्मान करेंगे और न ही आयोग का आदेश मानेंगे। दहल इसके लिए माहौल बनाने में जुट गए हैं और  देशभर में ओली सरकार के विरुद्ध शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं। जैसे-जैसे फैसले की घड़ी निकट आ रही है, देश की सुरक्षा, शांति और राजनीतिक भविष्य को लेकर आमजन के मन में भय और संशय बढ़ता जा रहा है।

राजनीतिक अनिश्चितता के इस माहौल में विपक्षी दलों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। विपक्षी दलों का झुकाव जिस धड़े की ओर होगा, वही देश की राजनीति पर हावी होगा। फिलहाल संसद भंग के मुद्दे पर नेपाली कांग्रेस और जनता समाजवादी पार्टी वैचारिक रूप से दो खेमों में बंटी हुई हैं। नेपाली कांग्रेस के सभापति शेर बहादुर देउबा, उपसभापति विमलेंद्र निधि, महासचिव शशांक कोइराला जैसे नेताओं का मानना है कि जब संसद का मामला अदालत में विचाराधीन है, तो उस पर कुछ कहना उचित नहीं है। लेकिन कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेता रामचंद्र पौडेल और उनके खेमे का समर्थन कर रहे प्रकाशमान सिंह, अर्जुन नरसिंह के.सी., गगन थापा, कृष्ण सिटौला आदि नेताओं का कहना है कि संसद भंग करना असंवैधानिक है और इसके लिए आंदोलन कर संसद की पुनर्स्थापना की जानी चाहिए। इनका यह भी कहना है कि अदालत को ऐसा ही फैसला देना चाहिए। कुल मिलाकर कांग्रेस का यह गुट न केवल दहल की भाषा बोल रहा है, बल्कि दहल द्वारा ओली के विरुद्ध और शीर्ष अदालत पर दबाब बनाने के लिए संयुक्त आंदोलन के आह्वान का समर्थन भी करता है। उधर, जनता समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष महंथ ठाकुर व लोकतंत्र समर्थक पार्टी नेताओं का तर्क है कि अदालत के फैसले की प्रतीक्षा की जाए और जो भी निर्णय हो, उसे स्वीकार किया जाए। लेकिन पार्टी में रहे डॉ. बाबूराम भट्टराई और उपेंद्र यादव सरीखे नेताओं का तर्क है कि सड़क से ही संसद पुनर्स्थापना की घोषणा होनी चाहिए। डॉ. भट्टराई तो दिल्ली के जेएनयू में अपने पुराने वामपंथी पत्रकार, लेखक, सेवानिवृत्त अधिकारियों के संपर्क में हैं और उनके जरिए संसद भंग की घटना पर दिल्ली का बयान दिलाने व संसद की पुनर्स्थापना कर दहल को प्रधानमंत्री बनाने के लिए पैरवी कर रहे हैं।

नेपाल की राजनीतिक परिस्थिति संवेदनशील है। सत्ता लोलुप वामपंथियों की आपसी रंजिश चरम पर है। अदालत का फैसला आने के बाद हिंसा भड़क सकती है। ओली किसी भी कीमत पर सत्ता छोड़ने को तैयार नहीं हैं, जबकि सत्ता हथियाने के लिए दहल ने पूरी ताकत लगा दी है। ऐसे माहौल में इतने कम समय में मध्यावधि चुनाव की संभावना कम ही है। आपसी टकराव के कारण अगर बहुमत वाली सरकार गिरी और समय पर चुनाव नहीं हुआ तो नेपाल में लोकतंत्र खतरे में पड़ सकता है। कम्युनिस्ट नेता सत्ता पर कब्जे की खतरनाक योजना बना कर बैठे हैं और चीन भी उन्हें शह दे रहा है, उसे देखते हुए आम नेपाली जनों को यह डर सता रहा है कि कहीं देश का संविधान भी खत्म न हो जाए। ऐसा हुआ तो यह नेपाल का सातवां संविधान होगा जिसे दफन कर दिया जाएगा।