सशक्त कदमों से बढ़ता आत्मनिर्भर भारत

    दिनांक 23-फ़रवरी-2021
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डॉ. संजीव कुमार जोशी
विश्व व्यापार में निर्यातक के रूप में सामने आने के लिए भारत को सर्वप्रथम रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना होगा। हमने सिद्ध किया है कि हम इसमें सक्षम हैं
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स्वदेश निर्मित हल्का लड़ाकू विमान तेजस मार्क-1ए

वर्ष 2015 से ही रक्षा क्षेत्र में एक अनूठी बयार बह रही है। पीएचडी चैम्बर आॅफ कामर्स की 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का रक्षा क्षेत्र में आयात-निर्यात का जो व्यापार संतुलन 2014 में 3,017 मिलियन डॉलर था वह 2018 में घटकर केवल 2 मिलियन डॉलर पर आ गया है, यानी भारत का रक्षा क्षेत्र में निर्यात अभूतपूर्व रूप से बढ़ा है। रिपोर्ट यह भी दर्शाती है कि 2014 में रक्षा क्षेत्र का आयात 3,334 मिलियन डॉलर (यानी करीब ढाई लाख करोड़ रुपये) था, 2018 में वह 1.1 लाख करोड़ रुपये रह गया, वहीं जो निर्यात 2014 में केवल 2,304 करोड़ रु. था वह 2018 तक बढ़कर करीब 1.1 लाख करोड़ रु. हो गया। 1958 में अपनी स्थापना से लेकर आज तक डीआरडीओ (रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग) रक्षा उपकरणों के क्षेत्र में देश की आत्मनिर्भरता का केंद्र बिंदु रहा है और आज इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का अग्रदूत है। अपनी स्थापना से लेकर 2014 तक डीआरडीओ द्वारा बनाए रक्षा उपकरणों को उत्पादित करने हेतु मिलने वाले आदेशों का मूल्य करीब 1.6 लाख करोड़ था, वह 2020 में बढ़कर दुगुना हो गया है।
ये आंकड़े स्वयं सिद्ध करते हैं कि एक बड़ा बदलाव हुआ है। और वह बदलाव आया है मानसिकता में। 2015 में सरकार की ओर से स्वदेशी रक्षा उत्पादों के अपनी रक्षा सेनाओं में प्रयोग तथा खरीद को बढ़ाने की दिशा में कई सार्थक प्रयास किये गये, कई नई योजनाओं की शुरुआत की गयी, जिससे नवाचार तथा स्टार्टअप, छोटे और मझोले रक्षा उद्योगों को बढ़ावा दिया गया, डीआरडीओ की ‘डेयर टू ड्रीम’ प्रतियोगिता और रक्षा उत्पादन विभाग की ‘आइडेक्स’ कुछ ऐसी ही योजनाएं थीं। इनके अलावा उद्योगों को अनुसंधान के क्षेत्र में आगे लाने के लिए रक्षा अनुसंधान विभाग द्वारा प्रौद्योगिकी विकास फंड की स्थापना की गई। इस दौरान सरकार द्वारा डीआरडीओ की रक्षा उपकरणों से संबंधित कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं को मंजूरी दी गई तथा पहले से धीमी गति से चल रही कई परियोजनाओं की रक्षा मंत्री तथा प्रधानमंत्री स्तर पर मासिक निगरानी रखी गई। बड़े रक्षा उपकरणों जैसे जहाज, पनडुब्बी, हेलीकॉप्टर इत्यादि के निर्माण हेतु एक नवीन स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप मॉडल (सामरिक हिस्सेदारी मॉडल) को लाया गया जिसके तहत भारत की सभी रक्षा कंपनियां विदेशी रक्षा कंपनियों के साथ मिलकर इन बड़े रक्षा उपकरणों का निर्माण स्वदेश में कर सकें। इस मॉडल से न केवल विदेशी निवेश को बढ़ावा मिलेगा अपितु देश की युवा पीढ़ी को रोजगार के नये अवसर और आधुनिक रक्षा उपकरण निर्माण पद्धतियों को आत्मसात करने का अवसर मिलेगा, जो देश में भविष्य के संपूर्ण स्वदेशी रक्षा उद्योगों के विकास में मील का पत्थर साबित होगा।

अभी हाल तक सेना के आधुनिकीकरण के लिए रक्षा उपकरणों की खरीद हेतु प्रयुक्त होने वाली नीति का नाम रक्षा खरीद नीति था, जो केवल आयात की मानसिकता को दर्शाती थी, इसे बदलकर रक्षा अभिग्रहण नीति कर दिया गया है, क्योंकि वर्तमान में भारतीय रक्षा उद्योग से खरीदे जाने वाले उपकरणों का हिस्सा तेजी से बढ़ा है। इससे एक सशक्त रक्षा निर्यात नीति की नींव पड़ेगी। 2015 से शुरू की गई इन तैयारियों ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को जरूरी हवा, पानी और खाद दी, महत्वपूर्ण रक्षा प्रतिष्ठान डीआरडीओ तथा भारतीय रक्षा उद्योग के विकास के लिए जरूरी वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

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टैंक अर्जुन मार्क-1अ के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। उनके दाएं हैं डीआरडीओ के अध्यक्ष डॉ. जी. सतीश रेड्डी व थल सेनाध्यक्ष जनरल एम.एम. नरवणे

नतीजतन डीआरडीओ को विगत कुछ वर्षों में महत्वपूर्ण रक्षा उपकरणों के विकास तथा सेनाओं में उनको शामिल कराने के प्रयासों को तीव्र गति मिली। इस दौरान रक्षा सेनाओं के आधुनिकीकरण की दिशा में डीपीएसयू को एक लाख करोड़ रु. से ज्यादा मूल्य के डीआरडीओ रक्षा उपकरणों के आॅर्डर दिये गये, जिनमें जहाज, रडार, एसडीआर, मिसाइल, रॉकेट, विभिन्न प्रकार के आयुध तथा एम्युनिशन, ब्रिज सिस्टम, एकईडब्ल्यू एंड सी,  टैंक, गन सिस्टम इत्यादि महत्वपूर्ण हैं। विगत कुछ महीनों में 83 हल्के लड़ाकू विमान तेजस मार्क-1ए खरीदने का आॅर्डर दिया गया जिनकी कीमत 48,000 करोड़ रुपये है। रक्षा अनुसंधान तथा विकास विभाग के सचिव तथा डीआरडीओ के चेयरमैन, डॉ. जी. सतीश रेड्डी के अनुसार, यह भारत सरकार का महत्वपूर्ण निर्णय है जिससे देश में वैमानिकी संबंधित उद्योगों के अनुकूल वातावरण बनेगा और अगले पांच साल में देश में वैमानिकी की अत्याधुनिक तकनीकों का तीव्र गति से प्रादुर्भाव होगा। हाल ही में थल सेना ने 118 मुख्य युद्धक टैंक अर्जुन मार्क-1अ का आर्डर दिया है, जिसकी कीमत करीब 8,400 करोड़ रुपये है। इस टैंक को 14 फरवरी, 2021 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश को समर्पित किया था। उस मौके पर प्रधानमंत्री द्वारा दिया गया भाषण आत्मनिर्भर भारत के उद्देश्य के सारांश जैसा है।

अंतत: यह जानना भी जरूरी है कि व्यवस्था तंत्र को झकझोरने और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए की जाने वाली इस कवायद का उद्देश्य क्या है, इसके लाभ क्या हैं। एक मोटे अनुमान के अनुसार भारत का आॅटोमोबाइल उद्योग करीब 50-60 लाख रोजगार पैदा करता है और 2-3 करोड़ देशवासियों की जीवनयापन में सहायता करता है। इसी प्रकार  रक्षा उपकरणों का व्यापार भी विश्व की एक बड़ी जनसंख्या के लिए रोजगार के मौके मुहैया कराता है। यदि भारत इस विश्व व्यापार में निर्यातक के रूप में सामने आना चाहता है तो उसे सर्वप्रथम इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना होगा। प्रधानमंत्री मोदी का यही दूरगामी सोच उन्हें एक विशिष्ट दर्जा प्रदान करता  है। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता एक ऐसा मजबूत कदम है जो देश को विश्व में एक ऊंचा ओहदा प्रदान करेगा। यह नए भारत की ऐसी नींव बनने जा रहा है, जिस के ऊपर रक्षा उपकरण निर्यात की शानदार इमारत बनेगी, रोजगार के अनगिनत अवसर पैदा होंगे और जो देश की प्रस्तावित 5 खरब डालर की अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बनेंगे।
(लेखक सचिव, रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग तथा अध्यक्ष, डीआरडीओ के प्रौद्योगिकी सलाहकार हैं)