सेकुलर मीडिया की धूर्तता पर चुप्पी

    दिनांक 24-फ़रवरी-2021
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धर्म और मजहब के आधार पर खबरों से पक्षपात पर पत्रकारों की जेबी संस्थाएं कभी नहीं बोलतीं

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भारत का वामपंथी मीडिया हिंदुओं के प्रति किस हद तक दुराग्रही है, इसके उदाहरण हर दिन सामने आते रहते हैं। दिल्ली के मंगोलपुरी में रिंकू शर्मा की बर्बर हत्या की खबर उन चैनलों व अखबारों को महत्वपूर्ण नहीं लगी जो लिंचिंग के नाम पर देश के चेहरे पर कालिख पोतने का प्रयास करते हैं। कुछ ने छापा भी तो यह सफाई देते हुए कि यह कोई सांप्रदायिक घटना नहीं है। किसी ने भी दिल्ली पुलिस व प्रशासन पर सवाल नहीं उठाया, क्योंकि मरने वाला हिंदू था और मारने वाले उस मजहब के, जिनके हर कुकृत्य को छिपाना सेकुलर मीडिया अपना परम कर्तव्य मानता है। अति तब होती है, जब मीडिया का यही वर्ग धूर्तता से अपराधियों को बचाने का प्रयास शुरू कर देता है। विवादित पत्रकार शेखर गुप्ता की वेबसाइट ‘द प्रिंट’ ने छापा कि रिंकू शर्मा ने ही झगड़ा शुरू किया था और चाकू भी उसी का था। पुलिस जांच में ऐसी कोई बात सामने नहीं आई। यही काम पालघर में संतों की हत्या के समय भी हुआ था। उस समय कई अखबारों ने उन्हें बच्चा चुराने वाला बताया था। जानबूझकर जांच की दिशा को भटकाने के लिए भी ऐसा किया जाता है।

उत्तराखंड क्रिकेट टीम के कोच वसीम जाफर के बारे में समाचार कुछ स्थानीय पत्रों में छपा। पता चला कि वह टीम का इस्लामीकरण करने में जुटे थे। स्टेडियम में मौलवी बुलाकर नमाज कराते थे। टाइम्स आॅफ इंडिया ने कार्टून छापा कि वसीम को उनके मजहब के कारण परेशान किया जा रहा है। यह सुविधा सिर्फ मुसलमानों को प्राप्त है। चाहे वह आतंकी हो या कट्टरपंथी, मुख्यधारा मीडिया का एक बड़ा वर्ग हमेशा उनके मजहबी अधिकारों को लेकर बेहद सतर्क रहता है। ऐसी ही संवेदनशीलता वामपंथी अराजकतावादियों के लिए भी रहती है। बेंगलुरु में दिशा रवि नामक कथित पर्यावरण कार्यकर्ता को 26 जनवरी को दिल्ली में हुई हिंसा के षड्यंत्र में पकड़ा गया। टाइम्स आॅफ इंडिया उसके नाम पर प्रतिदिन 4 से 5 पेज रंग रहा है। इतनी कवरेज तो बड़ी-बड़ी हस्तियों के भाग्य में भी नहीं होती है। इस पूरी कवरेज में यह पता नहीं चलेगा कि दिशा रवि पर क्या आरोप लगे हैं और सबूत क्या मिले हैं। इसकी जगह सारा ध्यान उसे 21 वर्ष की और पर्यावरण प्रेमी बताने पर है। मानो ये दोनों ‘योग्यताएं’ होने से उसका अपराध क्षम्य हो जाता है। भारत में हिंसा फैलाने के लिए जो शक्तियां करोड़ों रुपये खर्च कर रही हैं, उनके लिए किसी समाचारपत्र को प्रभावित करना क्या मुश्किल है?

बीबीसी हिंदी ने पाकिस्तान से जुड़े एक समाचार में मोहम्मद का कथित चित्र दिखा दिया। आएदिन हिंदू आस्था की खिल्ली उड़ाने वाले बीबीसी को शार्ली एब्दो जैसे हमले की धमकियां मिलने लगीं। वेबसाइट ने तत्काल वह वीडियो हटा दिया और क्षमा याचना शुरू कर दी। किसी को यह प्रेस की स्वतंत्रता या लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं लगा। छोटी-छोटी बातों पर बयान जारी करने वाली पत्रकारों की जेबी संस्थाएं भी चुप रहीं। वैसे बीबीसी से यह भूल कैसे हुई? ब्रिटिश सरकार के पैसे पर चलने वाली यह संस्था पूरी तरह भारत विरोधी और हिंदू विरोधी एजेंडे पर काम कर रही है। बीबीसी इन दिनों उन खालिस्तानियों को मंच दे रहा है जो ब्रिटिश सरकार से मांग कर रहे हैं कि वह किसानों के मुद्दे पर भारत सरकार से विरोध जताए। बीबीसी के एक कार्यक्रम में कहा गया कि किसानों के आंदोलन में बड़े पैमाने पर हिंसा हो रही है और भारत सरकार प्रदर्शनकारियों का दमन कर रही है।

मीडिया संस्थान होने की आड़ में बीबीसी अराजकतावादियों के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का हिस्सा बना हुआ है। भारत में बीबीसी पूरी तरह से वामपंथियों की कठपुतली है। लेकिन वामपंथी देश चीन ने ही उस पर अपने देश में प्रतिबंध लगा दिया। चीन की सरकार ने कहा है कि बीबीसी उसके बारे में झूठे समाचार फैला रहा है। हालांकि यह बदले की कार्रवाई है, क्योंकि कुछ दिन पहले ही ब्रिटिश सरकार ने अपने यहां चीन की मीडिया पर प्रतिबंध लगाया था। आश्चर्य है कि भारत में बीबीसी और चीन समर्थित तत्व आपसी गठजोड़ के साथ काम कर रहे हैं। प्रेस की आजादी की आड़ में कैसे-कैसे खेल चल रहे हैं, इसका उदाहरण है न्यूजक्लिक नामक वेबसाइट। इस पर प्रवर्तन निदेशालय का छापा पड़ा। पता चला कि न्यूजक्लिक को अमेरिका की एजेंसी ने 20 करोड़ रुपये दिए हैं। एक छोटी सी वेबसाइट को इतनी बड़ी राशि क्यों दी गई होगी, यह समझना कठिन नहीं है। न्यूजक्लिक ही नहीं, ऐसी कई झूठ फैलाने वाली वेबसाइट विदेशी पैसे पर चल रही हैं।