तिब्बत की शीर्ष धरा और वेद

    दिनांक 26-फ़रवरी-2021
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प्रो. भगवती प्रकाश


ऋग्वेद व अथर्ववेद में त्रिविष्टप के नाम से तिब्बत की चर्चा है। सांस्कृतिक रूप से तिब्बत और भारत के संबंध सदियों पुराने हैं। नेहरू की गलती से चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया।  अब चीन उसका जम कर फायदा उठा रहा है और भारत के लिए परेशानी खड़ी कर रहा है 

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तिब्बत विश्व का सर्वोच्च पठार होने के चलते पृथ्वी की छत कहलाता है। उन्नीसवीं सदी में हिमालय के सर्वोच्च शिखर ‘गौरीशंकर’ (माउण्ट एवरेस्ट) की ऊंचाई की त्रिकोणमितीय गणना के पूर्व आधुनिक भूगोलवेत्ता इस तथ्य से अनभिज्ञ थे। इससे कई सहस्राब्दी पूर्व वेदों व महाभारत आदि में तिब्बत अर्थात् त्रिविष्टप को पृथ्वी का शीर्ष धरातल और सभ्यता का उद्गम स्थल बताया गया है।

वैदिक सन्दर्भ : ऋग्वेद व अथर्ववेद में त्रिविष्टप को पृथ्वी का शीर्षतम स्थान व मानव सृष्टि का उद्गम कहा गया है। ऋग्वेद विश्व का प्राचीनतम ग्रंथ है। इसकी 1800-1500 ईसा पूर्व की 30 पाण्डुलिपियों को संयुक्त राष्टÑ आर्थिक व सामाजिक आयोग (यूनेस्को) ने विश्व विरासत में सम्मिलित किया है। इतनी प्राचीन और अक्षुण्ण पांडुलिपियां इतिहास की दुर्लभ उपलब्धि हैं।

ऋग्वेद
इमानि त्रीणि विष्टपा तानीन्द्र वि रोहय।
शिरस्ततस्योर्वरामादिदं म उपोदरे॥ (ऋग्वेद 8/91/5)
मंत्रार्थ : हे श्रेष्ठ मानव! उस त्रिविष्टप नामक स्थान को प्राप्त कर, जो सारी पृथ्वी से ऊंचा व मनुष्यों के लिए परम सुखकारी है तथा माता के उदर के समान मनुष्यों व सभी जीवों का उत्पत्ति स्थल है।

अथर्ववेद
हे मनुष्य! जिस त्रिविष्टप को स्वर्ग तुल्य माना जाता है, उस पर तू चढ़। वह पृथ्वी का सबसे ऊंचा व परम सुख देने वाला स्थान है। वह पृथ्वी पानी से सबसे पहले बाहर आई और जिसमें सब एक साथ पैदा हुए, समान मनुष्य प्रकट हुए। महान वीर्यप्राप्ति के लिए उसको तू प्राप्त कर।
साकं सजातै: पयसा सहैध्युदुब्जैनां महते वीर्याय।
ऊर्घ्वो नाकस्याधि रोह विष्टपं स्वर्गो लोक इति यं वदन्ति॥ (अथर्ववेद 11/1/7)

भौगोलिक विमर्श
भूगर्भवेत्ताओं के अनुसार हिमालय का उद्भव 5 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ था। इसलिए उसके उपरान्त पृथ्वी के जल प्लावन या जल प्रलय के उपरान्त पृथ्वी की छत कहे जाने वाले इस सर्वोच्च पठार का सबसे पहले जल से बाहर निकलने का वैदिक कथन सटीक ही लगता है।

तिब्बत : भारतीय भूभाग
पाण्डवों के अन्तिम समय में कैलाश प्रस्थान पर बद्रीनारायण से कैलाश-मानसरोवर मार्ग पर महाभारत लेखन स्थल की व्यास गुफा व गणेश गु्फा के थोड़ा आगे, सरस्वती नदी के उद्गम के बाद द्रौपदी के देहावसान स्थल पर द्रौपदी मन्दिर का होना, कैलाश पर्वत व तिब्बत के भारतीय भूभाग होने का महाभारतकालीन पुरातात्विक प्रमाण है। 51 शक्तिपीठों में से ‘मानस’ शक्तिपीठ भी तिब्बत में है, जहां माता सती की दाहिनी हथेली का निपात हुआ था।
गर्ग संहिता में कैलाश-मानसरोवर का उल्लेख 2,500 वर्ष से अक्षुण्ण अस्कोट राज्य के पाल वंश के राजाओं व कुमाऊं के राजाओं द्वारा कैलाश मानसरोवर मार्ग पर यात्रा व्यवस्था के उल्लेख और कैलाश यात्रा हेतु शुंग वंश सहित उत्तर भारत के राजाओं द्वारा व्यवस्था के प्रलेख भी उस क्षेत्र पर हमारे स्वामित्व के प्रमाण हैं। ईसा पूर्व कालिदास-विरचित रघुवंश में कैलाश-मानसरोवर का वर्णन और अन्य कई प्राचीन राज्याज्ञाओं में भी कैलाश यात्रा हेतु राजकीय व्यवस्था के महत्वपूर्ण उल्लेख हैं। उसी परम्परा में कैलाश-मानसरोवर मार्ग पर अंग्रेजों के काल व उसके बाद स्वाधीनता के बाद 1954 तक तिब्बत स्थित कैलाश पर्वत व कैलाश-मानसरोवर मार्ग भारत की प्रभुसत्ता एवं शासकीय व्यवस्था में रहा है। चीन से 1954 के पंचशील के समझौते में कैलाश-मानसरोवर और उस सम्पूर्ण मार्ग पर भारतीय नियंत्रण एवं उस पर स्थित अथितिगृहों, शास्त्रागारयुक्त रक्षाचौकियां, डाकघरों व तारघरों पर स्वामित्व व नियंत्रण सौपने का उल्लेख है। प्रधानमंत्री नेहरू की अदूरदर्शितावश तिब्बत में कैलाश पर्वत-पर्यन्त मार्गस्थ सम्पत्तियों पर देश के स्वामित्व, नियंत्रण व सहस्त्राब्दियों के इस पारम्परिक अधिकार का चीन को एकतरफा समर्पण देश की क्षेत्रीय अखण्डता से खिलवाड़ था। 1954 के उस समझौते में संलग्न ‘नोट्स एक्सचेंज्ड’ में यह उद्धृत है।

दुर्भाग्यवश 1950 में तिब्बत पर चीन के आक्रमण के बाद हजारों वर्ष के भारत के पारम्परिक अधिकार की अनदेखी कर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संयुक्त राष्टÑ संघ में 24 नवम्बर को तिब्बत पर चीन के आक्रमण के विरुद्ध होने वाली चर्चा को यह कहकर रुकवा दिया कि यह चीन का आन्तरिक मामला है और 1951 में तिब्बत पर चीन की प्रभुसत्ता की एकतरफा सन्धि करा दी। तिब्बती लामा, नेहरू से भूटान की तरह ही भारत का संरक्षित-राज्य (प्रोटेक्टोरेट स्टेट) बनने एवं 1950 के चीनी आक्रमण के विरुद्ध संयुक्त राष्टÑ में प्रस्ताव लाने का आग्रह करते रहे थे। तब चीन व तिब्बत दोनों ही संयुक्त राष्टÑ के सदस्य नहीं थे। भारत 1949-51 के बीच सुरक्षा परिषद् का भी सदस्य था। तब भी प्रधानमंत्री नेहरू ने कह दिया कि भारत का इतना सामर्थ्य नहीं है। अन्य कोई देश इस विषय को उठाएगा तो भारत उसका समर्थन करेगा। तब 15,000 किमी दूर स्थित मात्र 20,00,000 जनसंख्या वाले अल सल्वाडोर ने इसे उठाया था। तब विदेश सचिव गिरजाशंकर, उपप्रधानमंत्री सरदार पटेल, पूर्व गवर्नर जनरल राजगोपालचारी, सीडी देशमुख सहित अधिकांश केंद्रीय मंत्रियों के विरोध के उपरान्त नेहरू ने तिब्बत को चीनका आन्तरिक मामला कह कर चीन द्वारा तिब्बत को हड़पने में सहयोग दिया। 

भारत-तिब्बत सांस्कृतिक एकता
भारत व चीन के बीच स्थित उभय-प्रतिरोधी अर्थात् बफर राष्टÑ तिब्बत के होने से भारत उत्तर से पूर्ण सुरक्षित रहता। तिब्बत 1912 से 1951 तक स्वतंत्र राष्टÑ था। उसके पूर्व मई,1841 से अगस्त,1842 के बीच जम्मू के डोगरा शासक गुलाब सिंह की सेना मानसरोवर तक गई थी। तब 16-17 सितम्बर, 1842 की ‘चुशूल की संधि’ में तिब्बती संवत् के साथ भारतीय तिथि आसौज तृतीया लिखे होने से तिब्बती कलेण्डर भी भारतीय कालगणना आधारित सिद्ध होता है।
चौथी सदी में समुद्रगुप्त से 7वीं सदी में हर्षवर्धन के शासन-पर्यन्त तिब्बत से मैत्री संबंध रहे हैं। सातवीं सदी में तिब्बत नरेश स्त्रोंङगचन्स्त्राम् पो (626-98) के बौद्ध मत ग्रहण किए जाने, थोवमी-सम्भोटा जैसे तिब्बती विद्वानों के भारत में अध्ययन एवं भारतीय बौद्ध आचार्यों शान्तरक्षित व पद्मसम्भव आदि की तिब्बत यात्राओं के परिणामस्वरूप तिब्बती वर्णमाला भी देवनागरी सदृश गुप्तकालीन ‘पश्चिमी गुप्तलिपि’ से विकसित हुई है। अनेक संस्कृत ग्रंथों, जो भारत में अनुपलब्ध हैं, की मूल प्रतियां अथवा तिब्बती अनुवाद वहां उपलब्ध हैं।
शिव-पार्वती की मुद्रायुक्त कल्प विग्रह नामक विष्णु प्रतिमा, जो रेडियोकार्बन डेटिंग में 28,450 वर्ष प्राचीन सिद्घ हुई, वह भी 1959 में तिब्बत के एक बौद्ध भिक्षु से ही सीआईए के हाथ लगी थी। सीआईए के सैन्य आधार शिविर में पंजीकृत इस प्रतिमा की 1996 में चोरी हो जाने के बाद आज भी इतना ही प्राचीन उसका भारी बाक्स अमेरिका में सीआईए के पास है। अन्य अनेक महत्वपूर्ण पुरावशेष व पाण्डुलिपियां आज भी तिब्बत में विद्यमान हैं जो भारतीय इतिहास व संस्कृति पर प्रकाश डाल सकती हैं।
    (लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति हैं)