जन्मजात असाध्य रोग से ग्रस्त संगठन

    दिनांक 03-फ़रवरी-2021
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 शशांक शेखर पंडा

दक्षेस अपने जन्म काल से ही एक असाध्य रोग से ग्रस्त है, जो पाकिस्तान की देन है। उसकी फितरत से परिचित इंदिरा गांधी ने उससे किनारा करने की बजाए उसे दक्षेस का अंग बनने के लिए प्रेरित किया। वह खुद को दक्षिण एशिया या ‘इंडो पैसिफिक’ का कम और मध्य पूर्व का भाग अधिक मानता
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अपने पिता तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की तरह इंदिरा गांधी ने भी प्रधानमंत्री के नाते अपने कार्यकाल में क्षेत्रीय सहयोग की स्थापना को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई        (फाइल चित्र)

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने शुरुआती कई वर्षों तक अपने पिता पं. नेहरू की तरह क्षेत्रीय सहयोग संगठन की स्थापना पर ध्यान नहीं दिया। बाद में धीरे-धीरे उन्होंने इसके प्रस्ताव को स्वीकार किया व विभिन्न स्तरों पर विचार-विमर्श की प्रक्रिया शुरू हुई। इतिहासकार माइकल के अनुसार, इस प्रक्रिया के शुरू से अंत तक भारत के प्रभुत्व की छाप स्पष्ट दिखी, जो स्वाभाविक थी। दक्षेस का स्वरूप नेहरू द्वारा स्थापित ‘एशियाई रिलेशंस आॅर्गनाइजेशन’ की तर्ज पर उभर कर आया, जिसकी धुरी निरर्थक सिद्ध हो चुकी पंचशील विचारधारा थी। यानी दक्षेस की स्थापना हुई तो इंदिरा गांधी ने यह सुनिश्चित किया कि उसका स्वरूप पूर्णतया वैसा ही हो, जैसी कि नेहरू ने भारत की विदेश नीति के संदर्भ में परिकल्पना की थी और जैसा वे चाहती थीं। इसका मतलब यह था कि पाकिस्तान के इस संगठन से जुड़ने पर इंदिरा गांधी को कोई आपत्ति नहीं थी। आरंभिक आपत्तियों के बाद पाकिस्तान का दक्षेस का सदस्य बनना इसका प्रमाण था कि उसे भरोसा था कि उसके लक्ष्य व हित सुरक्षित हैं। इंदिरा गांधी ने स्वयं उसे दक्षेस का अंग बनने के लिए प्रेरित किया। तब तक वह भारत से दो युद्ध कर चुका था। उसका काम भारत के विरुद्ध घृणा, भारत विरोधी सैन्य, आतंकी षड्यंत्र रचना तथा उन्हें अंजाम देना था।

8 दिसंबर, 1985 को दक्षेस की स्थापना हुई और पाकिस्तान उसका स्थापक सदस्य बना। वह दक्षेस की असफलता का बीजारोपण कर चुका था। यह एक असाध्य रोग था, जिससे दक्षेस जन्मते ही ग्रस्त हो चुका था। पाकिस्तान की फितरत को जानते हुए भी इंदिरा गांधी उसे छोड़ नहीं पार्इं और दक्षेस में उसका स्वागत कर ‘आ बैल मुझे मार’ की नीति पर अग्रसर हुर्इं। ऐसा नहीं है कि आतंकवाद के विरुद्ध दक्षेस में प्रस्ताव पारित नहीं हुए। प्रस्ताव तो बहुत पारित हुए। भारतीय उपमहाद्वीप व ‘इंडो-पैसिफिक’ के साथ पूरा विश्व आतंकवाद के उद्गम, प्रचार, प्रसार व संवर्धन में पाकिस्तान की भूमिका से अवगत है। 

नेहरू की सोच से परे सुवर्णभूमि की ओर

नेहरू गुटनिरपेक्षता के ध्वज के नीचे विभिन्न राष्ट्रों को एकत्रित करने में तो सफल हुए (सफलता और उपलब्धियों के मापदंडों पर उसकी तार्किक परिणति शून्य रही, जो अलग विषय है) किंतु औपनिवेशिक शक्तियों के दंश से क्षत-विक्षत राष्ट्रों, जो एक ही तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे थे (मुख्यत: आर्थिक और सुरक्षा की दृष्टि से), को पारस्परिक राजनीतिक, आर्थिक व सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विषयों पर एकजुट कर उनके साथ क्षेत्रीय सहयोग संगठन की नींव रखने में असफल रहे। एक ओर क्षेत्रीय सहयोग के मुद्दे पर विभिन्न राष्ट्रों के मुखिया सैद्धांतिक और वैचारिक धरातल पर एकजुट होने को तत्पर थे, वहीं गुटनिरपेक्षता की मांग किसी ने की नहीं थी। इसके बावजूद गुटनिरपेक्षता की जीत हुई और क्षेत्रीयता की हार। नेहरू एक ओर गुट-निरपेक्षता की बात कर, औपनिवेशिक शक्तियों की भर्त्सना करते थे व दूसरी ओर लपक कर राष्ट्रमंडल का सदस्य बने रहकर अंग्रेजों की गोद में जा बैठते थे।

ऐतिहासिक अभिलेख इस बात के साक्षी हैं कि चीनी राष्ट्रपति चिआंग काई शेक द्वारा एशियाई वामपंथी गुट गठित करने के प्रस्ताव को अमेरिका का समर्थन हासिल था, जिसे नेहरू के ठुकरा देने से अमेरिका नाराज था। उनके पास अमेरिका का समर्थन हासिल करने का स्वर्णिम अवसर था। उनके पास दो विकल्प थे- पहला, अमेरिका और दूसरा ब्रिटेन। नेहरू ने दूसरा विकल्प चुना, जबकि भाषण वे औपनिवेशिक और वामपंथ के विरोध में देते थे। ब्रिटिश तो औपनिवेशिक ताकतों के सिरमौर थे। शेक का क्षेत्रीय सहयोग का प्रस्ताव तो वामपंथ के विरोध में था, जो चीन के तत्कालीन शीर्ष नेतृत्व से ही आया था। यह दर्शाता है कि नेहरू की कथनी व करनी में आकाश-पाताल का अंतर था। इसका मात्र एक अभिप्राय यह निकलता है कि उनकी मंशा निष्कपट नहीं थी और वे क्षेत्रीय सहयोग के मुद्दे पर देश को दिग्भ्रमित कर रहे थे।

इतिहासकार टार्लिंग और माइकल के तथ्यों (पूर्व के लेखों में विस्तार से चर्चा की गई है) से स्पष्ट है कि नेहरू ने सशक्त क्षेत्रीय संगठन की स्थापना के कई अवसरों को गंवा दिया। उनके आचरण से वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो संवाद स्मरण हो आते हैं, जो नेहरू के आचरण को समझने में सहायक हैं। पहला, इसमें मेरा क्या है? यदि नहीं है, तो इससे मुझे क्या? दूसरा, अटकाना, भटकाना और लटकाना। इन दोनों संवादों को इसी क्रम में समझने की आवश्यकता है, क्योंकि पहले संवाद में किसी कार्य को करने का सिद्धांत परिलक्षित होता है, जबकि दूसरे संवाद से ज्ञात होता है कि जिस कार्य में स्वार्थ निहित न हो तो उसे तिलांजलि दे देनी चाहिए। पर क्या कारण था कि गांधी परिवार इतने महत्वपूर्ण विषय पर उदासीन रहा?

प्रसार भारती ने 14 मई, 2019 को यूट्यूब पर नेहरू का एक साक्षात्कार डाला, जिसमें वे ब्रिटिश शैली में अंग्रेजी में एक विदेशी पत्रकार से बात कर रहे हैं। वे कहते हैं, ‘‘संपूर्ण इतिहास में जो क्षेत्र अब पाकिस्तान है, उसका अधिकांश भाग पृथक राष्ट्र नहीं था। दक्षिण भारत एक पृथक राष्ट्र था। उत्तर-भारत और पाकिस्तान भौगोलिक, ऐतिहासिक और भाषायी दृष्टि से उनकी और हमारी भाषाएं एक समान थीं। सांस्कृतिक रूप से भी अनेकों समानताएं थीं।’’ यदि भारत का प्रथम प्रधानमंत्री दक्षिण-भारत को बौद्धिक, सैद्धांतिक व वैचारिक स्तर पर भारत का अंग मानने से ही इनकार कर दे तो यह देश के लिए स्वयं में एक चुनौती बन जाती है। दक्षिण-एशिया में क्षेत्रीय सहयोग पर उनके विचार जानने से कहीं अधिक बड़ा संकट खड़ा हो जाता है। आप ऐसे प्रधानमंत्री से कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि वह दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया को भारत के नेतृत्व में संगठित करेगा? ऐसे सोच से तो मात्र विघटन के बीज ही बोये जा सकते हैं। जिस प्रकार नेहरू ब्रिटिश शैली में अंग्रेजी बोलने में रुचि रखते थे, उसी प्रकार इंदिरा परिष्कृत शैली में धाराप्रवाह फ्रेंच बोलने में। ऐसे में तो उनसे अपेक्षा और भी कम होनी चाहिए। 

वैचारिक, सैद्धांतिक तथा सामरिक पितामह
‘इंडो पैसिफिक’ में किसी भी क्षेत्रीय संगठन की सशक्त नींव रखने के लिए इस क्षेत्र में भारत के दक्षिण-पूर्व में स्थित द्वीपसमूह के प्राचीन इतिहास को जानना आवश्यक है, क्योंकि 2,500 साल से भी पहले से इस क्षेत्र के राजतंत्र और संस्कृति पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भारत में जन्मी हिन्दू और बौद्ध परंपरा ने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। यह क्षेत्र संगठित रूप से भारत में सुवर्णद्वीप या सुवर्णभूमि के नाम से विख्यात रहा है। यहां पर हिन्दू एवं बौद्ध मंदिरों-मठों के निर्माण, भारतीय हस्तशिल्प, व्यावसायिक-राजनीतिक संबंध, हिन्दू व बौद्ध रीतियों, बौद्धिक विचारों, जीवन शैली, कृषि-शैली, हिन्दू शासन प्रणाली के अनगिनत प्रमाण मिलते हैं। भारतीय संस्कृति ने सुवर्णद्वीप में किस प्रकार से स्थान बनाया, यह जानना रोचक है और संपूर्ण विश्व के लिए एक स्वर्णिम उदाहरण है। डच (नीदरलैंड) इतिहासकार जेकब वैन लेयुर के हवाले से इतिहासकार अमिताव आचार्य बताते हैं कि भारतीय संस्कृति सुवर्णभूमि में सैन्य व आर्थिक शक्ति के बल पर नहीं, बल्कि स्थानीय पहल और अनुरूपण की बदौलत स्वत: अपनाई गई। एक अन्य इतिहासकार मैकलॉड के हवाले से आचार्य बताते हैं कि सुवर्णद्वीप वासियों ने उन्हीं सांस्कृतिक विशेषताओं को अपनाया, जो उन्हें स्थानीय जीवन शैली के अनुसार उचित लगीं। इससे निष्कर्ष निकलता है कि यह अपनत्व बिना किसी विवशता, लोभ या भय के प्रगाढ़ हुआ तथा हिन्दू दर्शन के प्रत्यक्ष प्रमाण व अनुभव के सिद्धांत के आधार पर हुआ। अमिताव इतिहासकार वोल्टर्स के माध्यम से कहते हैं कि सुवर्णद्वीप के लोगों को हिन्दू संस्कृति अपनाने में अड़चन आना तो दूर, सहजता का अनुभव हुआ, क्योंकि उन्होंने पाया कि हिन्दू परंपराओं को अपनाने के लिए पूर्व से ही विद्यमान अपनी परंपराओं को छोड़ना तो दूर, वे और भी सुदृढ़ व परिष्कृत हुर्इं हैं। संस्कृति के प्रसार का इससे उत्तम उदाहरण न है और न दूसरा होना संभव है।

वहीं, ईसाइयत ने अपने जन्म के बाद जिस तरह समकालीन यूरोप की ‘पेगन’ संस्कृति को तहस-नहस किया, उसका नामोनिशान तक मिलना दुर्लभ हो गया। समूची पाश्चात्य सभ्यता को ‘पेगनिज्म’ से ईसाइयत में कन्वर्ट कर दिया। वहीं इस्लाम तलवार के बल पर पूरे विश्व, खासकर भारत में आया और फैला, हम उसके भुक्तभोगी हैं। सुवर्णद्वीप में वहां की भाषाओं पर प्राचीन भारतीय संस्कृति की छाप स्पष्ट दिखती है। ये भाषाएं संस्कृत व पालि से विकसित हुई, इसके प्रमाण मिलते हैं। बकौल अमिताव एक नवीनतम शोध में वहां की मुख्य भाषाओं में एक सामान्य भाषायी वंशावली सूत्र का पता लगा है। सुवर्णद्वीप स्थित जावा में राजा एर्लंग ने तो शासन भी कौटिल्य के अर्थशास्त्र के आधार पर किया। अन्य हिन्दू विधिक, राजनीतिक व राजनयिक शास्त्र जैसे मनुस्मृति व धर्मशास्त्र सुवर्णद्वीप में सुदूर तक पूजनीय माने जाते थे।

क्षेत्रीय सहयोग की अग्रिम रणनीति
अमिताव कहते हैं कि (राष्ट्रों से बने) क्षेत्र एक सामाजिक अवधारणा होते हैं। अत: क्षेत्रीय सहयोग के पीछे क्षेत्रीय समरूपता, समरसता महत्वपूर्ण कारक होती हैं। दूसरे शब्दों में, क्षेत्र भूमि का टुकड़ा मात्र नहीं होते। वे क्षेत्र के राष्ट्रों के पारस्परिक मेल-मिलाप, सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर निर्भर करते हैं। एक क्षेत्र बनने के लिए यह जरूरी नहीं कि वे राष्ट्र एक-दूसरे से भौगोलिक रूप से जुड़े हों। यानी सभ्यताएं पृथक राष्ट्र में बंट जाएं तो उनका डीएनए, संस्कृति, भाषा व सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक विश्वास परिवर्तित नहीं होते। भारत-सुवर्णद्वीप के विषय में वेश-भूषा, खान-पान, भाषा, बोली में व्यावहारिक भिन्नता के बाद भी धार्मिक विश्वास का सूत्र एक, सनातन, नित्य, निरंतर व अविरल है। प्राचीन और मध्यकालीन सुवर्णद्वीप में राष्ट्र की परिकल्पना भारत में राष्ट्र की परिकल्पना की प्रतिलिपि है। मंडल, जनपद और महाजनपद की प्राचीन काल से चली आ रही भारतीय अवधारणा को समझने वाले सुवर्णद्वीप की राष्ट्र की परिकल्पना को तुरंत समझ जाएंगे, क्योंकि दोनों में कोई भेद नहीं है। मंडल की परिकल्पना को समझाते हुए अमिताव कहते हैं कि मूलत: राजाओं के अधिव्याप्त प्रभावी क्षेत्र को मंडल कहते हैं, जिसमें राजा का आधिपत्य सार्वभौमिक होता है। इसमें वह अपने मित्र मंडलों के ऊपर अपने आधिपत्य का अधिकार व्यक्त कर सकता है। यानी मंडल में राजा की सार्वभौमिकता असीम और निरंकुश नहीं है। यह पारस्परिक आदर, सम्मान व विश्वास का विषय है। अन्य राजा उसकी अनुशंसा से स्वायत्त शासन करते हैं। मंडल की अवधारणा चीनी सभ्यता में राष्ट्र से एकदम भिन्न है, जहां राष्ट्र की सीमाएं कठोरता व स्पष्टता से निर्धारित होती हैं और वंशावली के नियमों का कठोरता से पालन किया जाता है। अमिताव कहते हैं कि पूरे सुवर्णद्वीप में सीमाएं होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता, सिवाए वियतनाम के। वहां 1,000 वर्ष तक चीनी शासन रहा, जिसकी शुरुआत 2,000 वर्ष पहले हुई। पाश्चात्य अवधारणा भी चीनी अवधारणा की भांति परमसत्तावाद में विश्वास रखने वाली है।

‘इंडो पैसिफिक’ नामकरण भारत और क्षेत्रीय राष्ट्रों के लिए एक स्वर्णिम अवसर है, जिसका आर्थिक, सामरिक व सांस्कृतिक लाभ के लिए उपयोग करना अगला तार्किक कदम होगा। यह नाम तभी सार्थक हो सकता है, जब उसे किसी ठोस क्षेत्रीय संगठन का स्वरूप दिया जाए। पाकिस्तान वैसे भी स्वयं को दक्षिण एशिया या ‘इंडो पैसिफिक’ का कम और मध्य पूर्व का भाग अधिक मानता है, दक्षिण पूर्व एशिया की बात तो दूर है। यदि इसे स्थायित्व प्रदान करना है तो इस रणनीति के कार्यान्वयन के मध्य में अपनी प्राचीन सभ्यता, संस्कृति और इतिहास को रखना होगा। जैसे ‘शंघाई कोआॅपरेशन आॅर्गनाइजेशन’ का नामकरण चीन के शंघाई नगर के आधार पर हुआ है। चीन द्वारा प्रेरित ‘रीजनल कोआॅपरेशन फॉर इकोनॉमिक प्रोग्रेस’ तथा वन बेल्ट वन रोड में भौगोलिक परिज्ञापक का तो कहीं चिह्न तक नहीं है।
    (लेखक साउथ एशिया डेमोक्रेटिक फोरम, ब्रुसेल्स के फेलो रहे हैं)