संस्कृति सह संस्कार की सरिता

    दिनांक 03-फ़रवरी-2021   
Total Views |
हरिद्वार स्थित शांतिकुंज की गंूज आज पूरे विश्व में सुनाई देती है। सेवा, स्वावलंबन, संस्कृति और संस्कार की जो सरिता यहां से बह रही है, उसमें प्रतिदिन करोड़ों लोग डुबकी लगाकर अपने जीवन में आमूलचूल परिवर्तन ला रहे। जन सहयोग से कोई संगठन कितना बड़ा हो सकता है, इसका उदाहरण है शांतिकुंज
35_1  H x W: 0
शांतिकुंज में देशभर से आए साधक

आज के वातावरण में किसी भी संगठन द्वारा अपनी स्वर्ण जयंती मनाना एक बड़ी उपलब्धि माना जाता है। इस वर्ष ऐसी ही उपलब्धि हासिल की है हरिद्वार स्थित गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज ने। वही शांतिकुंज, जहां से ‘अखिल विश्व गायत्री परिवार’ का संचालन होता है।


इन दिनों शांतिकुंज अपनी 50वीं वर्षगांठ यानी स्वर्ण जयंती मना रहा है। वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने 1971 में इसकी स्थापना की थी। हरिद्वार-ऋषिकेश मार्ग पर हरिद्वार रेलवे स्टेशन से लगभग छह किलोमीटर दूर गंगा जी के पावन तट पर स्थित शांतिकुंज 22 एकड़ में बसा है। गायत्री मंत्र के साधकों के लिए स्थापित शांतिकुंज आज भारत ही नहीं, विश्व के 90 देशों में भारतीय संस्कृति, अध्यात्म, ज्ञान, परंपरा और संस्कार आदि को बढ़ाने का एक सशक्त माध्यम बन गया है। इन 50 वर्ष की अवधि में शांतिकुंज ने अपने को इतना बढ़ा लिया है कि इसकी छांह तले करोड़ों लोग प्रतिदिन साधना करके मानसिक शांति प्राप्त करते हैं और हजारों लोग विभिन्न तरह के संस्कार संपन्न कराते हैं। यहां गायत्री माता का भव्य मंदिर और सप्तऋषियों की प्रतिमाएं स्थापित हैं। यहां तीन बड़ी-बड़ी यज्ञशालाएं हैं, जिनमें प्रतिदिन हजारों लोग यज्ञ करते हैं।

शांतिकुंज मुख्य रूप से साधना, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन, पर्यावरण संरक्षण, महिला जागरण एवं युवा उत्कर्ष और व्यसन उन्मूलन के लिए कार्य करता है। साधना इसलिए कि व्यक्ति में आत्मबल जाग्रत हो। युवाओं को समाजनिष्ठ बनाने और प्राचीन ज्ञान के साथ-साथ आधुनिक विषयों की शिक्षा के लिए देव संस्कृति विश्वविद्यालय 2002 से ही चल रहा है। 75 एकड़ में फैले इस विश्वविद्यालय में छात्रों को बहुत ही कम शुल्क पर हर तरह की शिक्षा मिलती है। यहां से निकले छात्र आज पूरी दुनिया में भारतीयता के विचारों को फैला रहे हैं। जीवन में स्वच्छता रहे, उपयुक्त और संतुलित खानपान हो, इसके लिए स्वास्थ्य आंदोलन के जरिए लोगों में जागरूकता पैदा की जा रही है। लोगों को स्वावलंबी बनाने के लिए शांतिकुंज निरंतर कुटीर उद्योगों का प्रशिक्षण देता है। पर्यावरण की रक्षा के लिए गायत्री परिवार समय-समय पर सफाई अभियान चलाता है। इसीलिए गायत्री मंत्र के साधक शांतिकुंज को दिव्य एवं जीवंत-जागृत तीर्थ मानते हैं।

शांतिकुंज में एक समय में 15,000 साधकों के ठहरने की व्यवस्था है और प्रतिदिन लगभग 5,000 साधक नि:शुल्क भोजन करते हैं। यहां से निकलने वालीं ज्ञान की विभिन्न धाराएं आज चारों दिशाओं में प्रवाहमान हैं। 15 करोड़ से अधिक साधक इन धाराओं को प्रवाहित करने और आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। इन साधकों के सहयोग और समर्पण से ही शांतिकुंज की गतिविधियां चलती हैं। ये साधक ‘ज्ञान घट’ और ‘धर्म घट’ के नाम से शांतिकुंज को सहयोग देते हैं। ‘ज्ञान घट’ यानी ज्ञान के लिए दान करना। कोई भी साधक अपनी इच्छानुसार प्रतिदिन 20 पैसे से लेकर एक रुपया तक दान करता है। यदि कोई साधक इससे अधिक देना चाहता है, तो वह अधिक भी दे सकता है। वहीं ‘धर्म घट’ के अंतर्गत साधक अपने घर पर प्रतिदिन एक मुट्ठी चावल जमा करते हैं और उसी को शांतिकुंज को दान देते हैं।
   

41 भवनों का परिसरशांतिकुंज में 41 भवन हैं, जिनके नाम किसी प्राचीन विदुषी, ऋषि, नदी, देवी, राजा या आचार्य के नाम पर हैं। ये भवन हैं-याज्ञवल्क्य, श्रृंगी, अथर्व, जनशताब्दी, लोपामुद्रा, आरुणि, भगीरथ, सावित्री, नालंदा, त्रिपदा, पतंजलि, ऋद्धि-सिद्धि, लक्ष्मी, मंदाकिनी, ऋतम्भरा, प्रज्ञा, अरुंधति, गार्गी, कात्यायनी, मैत्री, सरस्वती, आपला, अनसूइया, जनक भवन, अन्नपूर्णा, भगवती, व्यास, आचार्य, सूर्य, विश्वामित्र, वशिष्ठ, जमदग्नि, दुर्गा, अदिति, सुकन्या, अत्रेय भवन, उपमन्यु, तक्षशिला आदि।  



शांतिकुंज में एक शोध केंद्र है, जिसका नाम है-‘ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान’। इसके माध्यम से अध्यात्म विज्ञान के सूत्रों को भौतिक विज्ञान के आधार पर शोध और प्रयोग द्वारा पुन: स्थापित करने का कार्य किया जा रहा है।

शांतिकुज, देव संस्कृति विश्वविद्यालय और ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान को चलाने के लिए इन तीनों के परिसर में 3,000 परिवार रहते हैं। ये सभी ‘समयदानी’ कहलाते हैं। यानी ये लोग अपना पूरा समय गायत्री परिवार को ही दान करते हैं। गायत्री परिवार इनके रहने, खाने, स्वास्थ्य और बच्चों के पढ़ने की व्यवस्था करता है। श्रीराम शर्मा आचार्य का कहना था कि शांतिकुंज ‘आध्यात्मिक साम्यवाद’ का केंद्र है। इस केंद्र का उद्देश्य है व्यक्ति को कम से कम साधन में जीवन यापन करने की प्रेरणा देना और लोकमंगल के लिए अधिक से अधिक कार्य करने के लिए प्रेरित करना। शांतिकुंज से जुड़े लगभग 11,000 से अधिक प्रज्ञा संस्थान या शक्तिपीठ हैं। ये सभी शांतिकुंज की गतिविधियों को संचालित करते हैं। शांतिकुंज की तरह देश के अन्य भागों में 500 बड़े और 4,500 छोटे केद्र हैं। इनके भरोसे ही शांतिकुंज अपने अभियानों को पूरा करता है। इन दिनों गायत्री परिवार ‘आपके द्वार, हरिद्वार’ नाम से एक अभियान चला रहा है। इसके अंतर्गत देश के 10,00,000 घरों तक गंगाजल पहुंचाया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि इस वर्ष हरिद्वार में कुंभ मेला लग रहा है, लेकिन कोरोना महामारी को देखते हुए लाखों लोग चाहते हुए भी हरिद्वार नहीं आ पा रहे। गायत्री परिवार ऐसे लोगों तक गंगाजल पहुंचाने का कार्य कर रहा है, वह भी बिना किसी शुल्क के।  

गायत्री परिवार के साधक नारा लगाते हैं, ‘हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा’, ‘हम बदलेंगे, युग बदलेगा।’ इन्हीं उद्देश्यों को लेकर गायत्री परिवार के करोड़ों साधक दिन-रात काम कर रहे हैं। उन्हें पूरा विश्वास है कि आज नहीं, तो कल वे अपने नारों को पूरी तरह साकार कर सकेंगे।    
‘‘90 देशों में कार्य कर रहा है गायत्री परिवार’’

38_1  H x W: 0

पिछले कई दशक से शांतिकुंज की गतिविधियों को आगे बढ़ाने का गुरुत्तर दायित्व निभा रहे हैं अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रमुख डॉ. प्रणव पण्ड्या। प्रस्ततु हैं उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

शांतिकुंज का मूल उद्देश्य क्या है और उसे प्राप्त करने में सफलता मिली?
हमारा उद्देश्य है राष्ट्र निर्माण और नवसृजन के लिए समर्पित युग शिल्पियों (पुरुष-महिला) को तैयार करना। प्रसन्नता है कि हम इस उद्देश्य को प्राप्त करने में प्राय: सफल रहे हैं। शांतिकुंज को लोकमंगल के लिए समर्पित युग सेनानियों के प्रशिक्षण केंद्र (अकादमी एवं छावनी) के रूप में विकसित किया गया है।

शांतिकुंज की कार्यप्रणाली क्या है?
शांतिकुंज की स्थापना आस्तिकता की धुरी पर की गई है। गायत्री परिवार साधना को मूल पृष्ठभूमि में रखकर अपनी गुरुसत्ता के मार्गदर्शन में चलने में विश्वास रखता है। शुरुआत में साधकों की छोटी-सी संख्या थी, जो बाद में बढ़ती चली गई। 

 गायत्री परिवार के साथ देशी-विदेशी कितने साधक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं?
इस समय गायत्री परिवार के सदस्यों-साधकों की संख्या भारत में लगभग 15 करोड़ और अन्य देशों में करीब 50,00,000 है।

 शांतिकुंज में प्रतिदिन हजारों साधक आते हैं। इन सबके रहने या खाने की सुविधा नि:शुल्क है। इतने बड़े संस्थान को चलाने के लिए हर महीने करोड़ों रु. की आवश्यकता पड़ती होगी। आखिर इतनी बड़ी राशि का प्रबंध कैसे होता है?
लाखों साधक अपनी मेहनत की कमाई में से प्रतिदिन 20 पैसे से लेकर एक रुपया तक जमा करते हैं और उसे ही शांतिकुंज को देते हैं। श्रद्धा हो तो भोजन एवं अन्य व्यवस्थाओं के लिए कुछ ज्यादा दे देते हैं। इसी से निर्माण एवं अन्य योजनाओं की व्यवस्था होती है। हरिद्वार के आसपास के क्षेत्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के साधक नियमित रूप से अन्न भेजते हैं। गेहूं, चावल, शक्कर की पूर्ति यही लोग करते हैं। इसके अलावा र्इंटें, सीमेंट, सरिया यही लोग दान करते हैं।

भारत के सुदूर क्षेत्रों में गायत्री परिवार किस तरह का काम करता है?
गायत्री परिवार का कार्य असम, नागालैंड, झारखंड, छत्तीसगढ़ तमिलनाडु, तेलंगाना एवं गुजरात के सुदूर क्षेत्रों में भी है। छत्तीसगढ़ के बस्तर और अबूझमाड़ तथा गुजरात के डांग जिले में गायत्री परिवार बहुत ही सक्रिय भूमिका निभा रहा है। सेवा, साधना, स्वावलंबन, संस्कार, स्वच्छता, शिक्षा के कई प्रकल्प चल रहे हैं। बस्तर में तो दण्डकारण्य परियोजना विशेष रूप से चलाई जा रही है। नक्सलियों के विचार-परिवर्तन में भी गायत्री परिवार की विशेष भूमिका है।   

 आपके कार्यों की बदौलत समाज में किस तरह के परिवर्तन हो रहे हैं?
गायत्री परिवार से जुड़े लोगों के जीवन और विचारों में परिवर्तन हुए हैं। शिक्षा-पद्धति में परिवर्तन आए हैं।

 गायत्री परिवार का विश्व में कहां-कहां कार्य है और किस तरह के कार्य हैं?
भारत से बाहर गायत्री परिवार का कार्य 1972 में परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की अफ्रीका यात्रा से ही शुरू हो गया था। इसके बाद तो परिवार का विश्वव्यापी स्वरूप उभरकर आया है। अमेरिका, रूस, कनाडा, इंग्लैंड, डेनमार्क, फिजी, दक्षिण अफ्रीका, मॉरिशस, केन्या और तंजानिया में केंद्र बन चुके हैं। इन केंद्रों से वहां के मूल निवासियों को लाभ मिल रहा है। वे गायत्री मंत्र, यज्ञ, शिक्षा, संस्कार और भारतीय संस्कृति से जुड़ रहे हैं। 

शांतिकुंज के अनेक विद्वान-साधक दुनिया के अनेक देशों में कार्य कर रहे हैं। उनके कार्य का प्रभाव कैसा
रहा है?

आज दुनिया के 90 देशों में गायत्री परिवार के साधक कार्य कर रहे हैं। उनके कार्यों का प्रभाव अविस्मरणीय और अतुलनीय है। ये साधक पश्चिमी सोच को प्रभावित कर लोगों में भारतीय सोच को फैला रहे हैं। 

गायत्री परिवार शिक्षा के लिए ‘देव संस्कृति विश्वविद्यालय’ चलाता है। क्या परिवार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार पैदा करने के लिए भी कुछ किया जा रहा है?

देव संस्कृति विश्वविद्यालय में रोजगार के लिए ग्राम प्रबंधन और धर्म विज्ञान के शिक्षण की व्यवस्था है। विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को भारत के गांव-गांव में भेजा जाता है। इसके अलावा संस्कारों का बीजारोपण, भारतीय संस्कृति का शिक्षण, बाल संस्कारशाला, युवा प्रकोष्ठ आदि के माध्यम से गांव-गांव में जागरण का क्रम चल रहा है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय एवं शांतिकुंज में छत्तीसगढ़, झारखंड और मध्य प्रदेश आदि राज्यों के ग्रामीण परिजन बड़ी संख्या में प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। उन्हें स्वावलंबी बनाने के लिए विभिन्न कार्यक्रम और प्रयोग किए जाते हैं।