गेशे जम्पा : बीसवीं कड़ी (20)

    दिनांक 08-फ़रवरी-2021
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तिब्बती शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या हमारे भारत देश में है। चीन की विस्तारवादी नीति के परिणामस्वरूप एक अहिंसक धार्मिक देश तिब्बत पराधीन हो गया। 1959 में तब इसका चरमोत्कर्ष देखने को मिला जब तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष परम पावन दलाई लामा को अपने लाखों अनुयायियों के साथ अपना देश छोड़ भारत में शरण लेनी पड़ी।  भारत में रह रहा तिब्बती समुदाय तिब्बत में रह रहे चीनी सत्ता से संघर्षरत तिब्बतियों की सबसे बड़ी ताकत बना हुआ है। 19वीं सदी के अन्त तक तिब्बत स्वतंत्र था। तिब्बत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और मानवीय अधिकारों के प्रश्नों को लेकर छाई वैश्विक चुप्पी को तोड़ने और उन्हें स्वाधीनता दिलाने की जद्दोजहद करता है सुप्रसिद्ध लेखिका नीरजा माधव लिखित भारत में हिन्दी का पहला उपन्यास-गेशे जम्पा। प्रस्तुत है इस उपन्यास की बीसवीं कड़ी

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छेरिंग तोपग्याल अपनी बात समाप्त करते हुए कह रहे थे- निस्संदेह आजाद तिब्बत में निर्वासितों एवं तिब्बत में रह रहे लोगों में साम्य संस्थापन में कुछ दिक्कतें आएंगी, परंतु यह कोई दुरूह कार्य नहीं है। बैठक समाप्त होने पर गेशे जम्पा छेरिंग तोपग्याल के सामने पहुंचे— मैं जम्पा हूं। बचपन में यहां आया। पडगरचते गांव था मेरा। छेरिंग तोपग्याल एकाएक चौंक गए। उन्होंने जम्पा को देखा, मानो पहचानने का प्रयास कर रहे हों। खुशी और आश्चर्य के कारण गालों की झुर्रियों पर एक रक्ताभ प्रकाश फैल गया था। जम्पा को दोनों कंधों से पकड़कर धीरे-से दबाते हुए पूछा-चिनये के भाई जम्पा? हां, जी हां, चिनये दीदी..मेरी दीदी थीं। ओह, जम्पा! मेरा जम्पा। छेरिंग ने व्याकुल होकर गेशे जम्पा को अपनी दोनों भुजाओं में समेट लिया था। मग् पा! मग् पा हैं न आप मेरे? गेशे जम्पा आंसू भरी आंखों से उन्हें देखते हुए पूछ रहे थे। हां..हां..। आगे के स्वर अवरुद्ध हो गए थे दोनों के। सारे बंधन तोड़कर आंसू बह रहे थे दोनों की आंखों से।
ढलने से पूर्व सूरज पहाड़ी के शिखर पर चमक रहा था। छेरिंग तोपग्याल अपने कक्ष में बिस्तर पर अधलेटे-से गेशे जम्पा को अपनी पिछली कहानी बता रहे थे। गेशे जम्पा उनके पैरों के पास बैठे धीरे-धीरे प्यार से उन्हें सहला रहे थे। जैसे उनका बचपन लौट आया था। मग्-पा ने बताना शुरू किया—चमदो से कुछ ही दूर था मेरा गांव। चिनये मेरी दुर्बलता थी। छेरिंग तोपग्याल का स्वर भर्रा गया। गेशे जम्पा की आंखें भी नम हो आर्इं दीदी को याद कर। उन्होंने कहा-अधीर मत होइए मग्-पा। हमारे बलिदान व्यर्थ नहीं जाएंगे। 
अभी हाल में ही तो लामा तेनजिन की रिहाई के संबंध में अमेरिका स्थित मानवाधिकार संगठन ने जोर देते हुए कहा है कि तिब्बती समुदाय को अनावश्यक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। उनकी सजा उम्रकैद में बदल दी गई है। मानवाधिकार संगठन ने एक सौ आठ पृष्ठों में जारी अपनी रिपोर्ट में तिब्बतियों पर हो रही ज्यादतियों के आरोप लगाए हैं। यह एक तरह से हमारी जीत की पहल है— जम्पा के लोग हमारी स्थिति को समझ रहे हैं। छेरिंग तोग्याल के स्वर में उत्साह था। ऐसे में सत्तारूढ़ चीनी सरकार बड़ी सावधानी से कदम बढ़ा रही है। तिब्बत में भी थोड़ी उदारता बरतने का दिखावा हो रहा है ताकि विश्व को मुंह दिखाने लायक रहे। गेशे जम्पा का हल्का-सा आक्रोश फूट पड़ा। परम पावनजी की बात यूरोपीय देशों और अमेरिका में भी गंभीरता से सुनी जा रही है। ऐसे में भारत को भी चाहिए कि वह तिब्बत की स्वायत्तता के लिए एक अंतरराष्टÑीय पहल करे और संपूर्ण हिमालय क्षेत्र के संदर्भ में एक समग्र नीति का विकास करे। ऐसा वातावरण विकसित किया जाए जिसमें चीन सरकार, भारत सरकार और परम पावन दलाई लामाजी मिलकर तिब्बती समस्या का कोई सर्वस्वीकृत समाधान ढूंढ सकें। सबसे चिन्तनीय पहलू यह है कि तिब्बत में तमाम परमाणु कचरा फेंका जा रहा है, जो ब्रह्मपुत्र नदी से होकर भारत पहुंचता है। ऐसी ही और कई नदियां हैं। इसके अलावा खतरनाक प्रक्षेपास्त्रों का तिब्बत में जमावड़ा भी विश्व शांति के लिए खतरा बन गया है। तुम तो जानते ही हो जम्पा कि हम तिब्बतियों के लिए जंगल, पहाड़, नदी, नाले केवल पर्यावरणीय वस्तु नहीं हैं, बल्कि इनसे हमारी सांस्कृतिक अस्मिता जुड़ी है। यही हाल हमारे गुरु देश भारत का भी है। जब हम मात्र एक पेड़ काट रहे होते हैं या नदी की सहज धारा को विचलित कर रहे होते हैं तो उससे जुड़ी न जाने कितनी कथाओं, प्रथाओं, अनुष्ठानों और स्मृतियों को समाप्त करने जैसा कृत्य कर रहे होते हैं। आज तो तिब्बत में जिस तरह वनों की कटाई हो रही है, उससे लगता है कि जल्दी ही वहां की धरती मरुस्थल हो जाएगी। स्त्रियों का जबरन गर्भपात करवाकर उन्हें भी बंध्या बनाने का प्रयास हो रहा है ताकि हमारी प्रजाति लुप्त हो जाए। इसे जल्दी से जल्दी रोकना होगा, नहीं तो तिब्बत नहीं बचेगा। छेरिंग तोग्याल के स्वर में बेचैनी थी। गेशे जम्पा ने घड़ी की ओर देखा। उनकी उंगलियां देवयानी के फोन का नंबर डायल करने लगी थीं।
हैलो? देवयानी बोल रही हो? जी हां, आप कौन? मैं जम्पा बोल रहा हूं। धर्मशाला से। देखो देवयानी, मैं यहां एक हफ्ते और रुक रहा हूं। वहां की व्यवस्था माई के संग तुम देखती रहना। उन्होंने एक सांस में अपनी बात खत्म की।
शाम को छत पर खड़ी देवयानी का मन आज बहुत उद्विग्न था। सारी परिस्थितियां मिलकर उसे एकदम अकेला और उदास बना रही थीं। दो दिन पूर्व ही लामा सोनम डक्पा का निधन हो गया था। रात के सन्नाटे में एकाएक लोब्जंग और दावा की चीखों ने उसे झिंझोड़कर रख दिया था। लोब्जंग की दिल दहला देने वाली रुलाई सुनकर देवयानी का हृदय भी हाहाकार कर उठा था।
देवयानी ने आॅफिस जाने के लिए पर्स उठा लिया था। कब तक आओगी? मां ने हताश हो पूछ लिया। शाम हो जाएगी। आजकल जरा आॅफिस का भी कुछ काम देखना पड़ रहा है। गेशे जम्पाजी धर्मशाला गए हैं।  क्या और कोई नहीं है तुम्हारे संस्थान में? दीपेश का यह प्रश्न विष-बुझा था। मतलब? कहना क्या चाहते हो तुम? देवयानी तिलमिला उठी थी। वहीं जो तुम समझ रही हो। तुम्हें हो क्या गया है दीपेश? इतनी बहकी-बहकी बातें क्यों कर रहे हो? देवयानी के स्वर में पीड़ा थी। मैं नहीं, तुम्हारे संस्थान के लोग कर रहे हैं। चपरासी, चौकीदार, क्लर्क, सभी..। वह आक्रोश में था। इससे ऊपर की तुम्हारी सोसायटी है भी नहीं। वह व्यंग्य से बोलते हुए, लगभग रुआंसी-सी बाहर निकल गई थी। मां ने भी उसे रोकने का प्रयास नहीं किया।
देवयानी ने एक ठंडी सांस ली और धीमी गति से छत पर टहलने लगी। सूरज कब का पेड़ों के झुरमुट के पीछे छिप चुका था। चौखंडी स्तूप एक छाया की तरह दिखाई पड़ रहा था। आसपास के लोगों में यह स्थान सीता रसोई के नाम से प्रसिद्ध था। कई बार देवयानी के मन में कौतूहल उठा था-कब और क्यों सीताजी का नाम इस स्थान-विशेष के साथ जुड़ा होगा? कहीं लिखित इतिहास नहीं मिलता था। किंवदन्ती द्वारा ही ज्ञात हुआ कि राम और सीता कुछ समय के लिए यहां ठहरे थे। कई बार मन में आया था कि सीता रसोई को पास से जाकर देखे। पर इतने वर्षों से सारनाथ में रहते हुए और उस स्थान के पास से गुजरते हुए भी वह वहां न जा सकी थी। गेशे जम्पाजी धर्मशाला से लौटकर जाएंगे तो वह इस बार उनसे इस स्थान के इतिहास के बारे में पूछेगी। अगले ही पल वह अपनी मूर्खता पर हंस पड़ी थी। गेशे जम्पा भला क्या बता पाएंगे सीताजी के संबंध में उस घटना का इतिहास? जिसे अपने इतिहास को ही सुरक्षित रखने के लिए इतना संघर्ष करना पड़ रहा है, वह भारत के ऐतिहासिक आख्यानों के बारे में उसे क्या बताएगा?
उसने कलाई पर बंधी घड़ी देखी। सात बज रहे थे। उसे दीपेश की बात याद आ गई। क्या कहा होगा चौकीदार ने उससे? मन ही मन बुदबुदाती हुई देवयानी नीचे उतरने के लिए सीढ़ियों की ओर बढ़ी ही थी कि एकाएक मोबाइल की घंटी बजी। जी..? उसने हैलो की जगह कहा था। उसका स्वर थरथरा उठा। हैलो देवयानी? तुमने अभी फोन किया था मुझे? कोई विशेष बात? उधर से प्रश्न पूछा गया।
जी, माई अस्वस्थ हो गई हैं। दरअसल, वो जो मेरे मकान मालिक थे सोनम डक्पा जी, माई के छोटे भाई....वो दो दिन पहले...। ओह। उनका ध्यान रखना तुम देवयानी। बूढ़ी हैं। कहीं इस शॉक में...तुम्हारे ऊपर भरोसा है मुझे। गेशे जम्पा के स्वर में एक अपनत्व झलक रहा था। देवयानी ने आगे कहा, जी, बड़े बाबू और महीपाल, जो सफाईकर्मी है अपना, उन दोनों में एक दिन बुरी तरह लड़ाई हो गई थी। पूरे स्टाफ के लोग देखते रहे। किसी तरह मैंने और थपलियालजी ने महीपाल और बड़े बाबू को शांत किया। ठीक है। मैं दो-तीन दिन बाद आ रहा हूं तो देखूंगा। लामा सोनम डक्पा की पत्नी का क्या हाल है? जी, वो बहुत दुखी हैं। स्वाभाविक है। भगवान बुद्ध उन्हें शांति दें। संसार के इन्हीं दुखों को देखकर तथागत के मन में वैराग्य ने जन्म लिया होगा। गेशे जम्पा का स्वर दार्शनिक हो उठा।     (जारी)