एक गलती से उजागर हुई लुटियन जमात

    दिनांक 08-फ़रवरी-2021
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भारत को बदनाम करने में जुटे सेकुलर-लिबरल वामपंथियों की टोली का सच आया सामने
Narad_1  H x W:

भारत में कथित किसान आंदोलन के पीछे के असली कलाकार कौन हैं, किसी से छिपा नहीं था। लेकिन बीते दिनों सारे चरित्र स्वयं खुलकर सामने आ गए। पहले अमेरिकी गायिका रेहाना, फिर अश्लील फिल्मों में काम करने वाली मियां खलीफा ने इस कथित आंदोलन के समर्थन में ट्वीट किया। समझते देर नहीं लगी कि इनकी सहायता से आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय बनाने और विश्व भर में भारत को बदनाम करने का प्रयास फिर से शुरू हो गया है। तभी एक चूक हो गई और पूरे षड्यंत्र की पोल खुल गई।

अंतरराष्ट्रीय वामपंथी तंत्र द्वारा पर्यावरणविद् के रूप में स्थापित की गई ग्रेटा थनबर्ग नामक स्वीडिश लड़की ने किसान आंदोलन के नाम पर भारत विरोधी योजना की पूरी फाइल ही गलती से सोशल मीडिया पर साझा कर दी। इसी से पता चला कि भारतीय मीडिया का एक बड़ा वर्ग भी इस दुष्प्रचार का हिस्सा है। अधिकतर अंग्रेजी अखबारों ने थनबर्ग की गलती का समाचार अंदर के पन्नों में छापा, जबकि किसान आंदोलन पर उसके बयान को ऐसे जगह दी मानो वह भारतीय किसानों की सबसे बड़ी हितैषी हो। यह स्पष्ट हो चुका है कि वामपंथी, कांग्रेसी, खालिस्तानी और इस्लामी शक्तियां भारत में अराजकता फैलाने के लिए मीडिया को हथियार बना रही हैं। मीडिया का एक बड़ा वर्ग खुशी-खुशी इस अभियान में शामिल है।

जब अर्णब गोस्वामी को झूठे मुकदमे में फंसाकर जेल में डाला गया, तब जो लोग बहुत प्रसन्न थे, उन्हें अचानक लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता की चिंता हो गई। फेक न्यूज फैलाकर दिल्ली में हिंसा कराने वाले विवादित पत्रकार राजदीप सरदेसाई के पक्ष में जिस तरह की एकजुटता दिखाने का प्रयास किया गया, वह लोकतंत्र के लिए कतई शुभ संकेत नहीं है। पत्रकारों की कई संस्थाओं ने जिस तरह इस एजेंडाबाज के पक्ष में बयान जारी किए, उससे पता चलता है कि लोकतंत्र के इस चौथे खंभे में दीमक लग चुके हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि राजदीप आदतन अपराधी हैं।

वह इकलौते संपादक हैं, जिनकी हरकतों पर राष्ट्रपति भवन को वक्तव्य जारी करना पड़ा। राजदीप ही नहीं, मीडिया की ‘जेबी संस्थाओं’ ने आंदोलनकारियों के बीच रहकर दुष्प्रचार कर रहे एक फर्जी पत्रकार का भी बहुत बेशर्मी से बचाव किया। उस स्वयंभू पत्रकार पर दिल्ली पुलिस के जवानों पर हमले के प्रयास का आरोप है। झूठ और अफवाहें फैलाने का यह तंत्र इतना बड़ा और संगठित है कि इसकी परतें ढूंढना आसान नहीं रह गया है। राजदीप ने पहले एक किसान को गोली मारने की गलत सूचना फैलाई। जब रंगे हाथ पकड़े गए तो इस दुष्प्रचार तंत्र की अगली कड़ी सक्रिय हो गई।

अब ‘द वायर’ और ‘कारवां’ जैसी प्रोपेगेंडा वेबसाइटों ने बिना किसी आधार के दावा करना शुरू कर दिया कि किसान की मृत्यु गोली लगने से ही हुई है। प्रत्यक्षदर्शी, पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर और उनकी रिपोर्ट चाहे जो कहें। उन्हें इससे मतलब नहीं कि उनके इस झूठ से कानून-व्यवस्था का संकट पैदा हो सकता है। लेकिन जैसे ही उत्तर प्रदेश पुलिस ने इस अफवाहबाजी के विरुद्ध शिकायत दर्ज की, वैसे ही प्रेस की स्वतंत्रता का चिरपरिचित विलाप शुरू हो गया। मानो झूठ फैलाना लज्जा की बात नहीं, बल्कि उनका विशेषाधिकार है।

कथित टीआरपी घोटाले पर कांग्रेस प्रायोजित चैनलों के दुष्प्रचार की पोल खुल चुकी है। मुंबई पुलिस एक तरह से स्वीकार कर चुकी है कि उसके पास अर्णब गोस्वामी के विरुद्ध कोई साक्ष्य नहीं है। लेकिन प्रेस की आजादी के स्वयंभू दावेदारों ने इस पर एक शब्द नहीं कहा। जी न्यूज ने पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का साक्षात्कार प्रसारित किया। इसमें अंसारी इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाए कि उन्हें क्यों लगता है कि भारत में मुसलमान असुरक्षित हैं। अंत में वह साक्षात्कार बीच में छोड़कर भाग गए। 

जो व्यक्ति इतने वर्षों तक देश के प्रमुख संवैधानिक पदों पर बैठा रहा हो, उसकी कट्टरपंथी सोच स्पष्ट तौर पर सामने आ गई। उधर, हिंदू महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े कानून के विरोध में मीडिया का ‘जिहाद’ जारी है। आए दिन इस बारे में झूठे समाचार पहले पन्नों पर दिखेंगे। जयपुर में मुस्लिम युवक की छेड़खानी से परेशान होकर एक हिंदू लड़की ने आत्महत्या कर ली। पुलिस ने आरोपी को जेल भेज दिया, पर दैनिक भास्कर की दृष्टि में वह लव जिहादी नहीं, बल्कि ‘मनचला’ है। अक्सर मुस्लिम अपराधियों के मामले में चैनल और समाचारपत्र ऐसे हल्के शब्दों का प्रयोग करते हैं। उनका सारा जोर अपराध की गंभीरता और अपराधी का नाम छिपाने पर होता है।