फिर सिर उठा रहीं कट्टरपंथी ताकतें

    दिनांक 09-फ़रवरी-2021
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गोपाल गोस्वामी

20 साल पहले तक गुजरात और कच्छ में मुसलमान मिल-जुलकर रहते थे। इस क्षेत्र में तब्लीगी जमात व जमात-ए-इस्लामी की घुसपैठ के बाद से कट्टरपंथी से सिर उठाने लगे हैं। हाल ही में हिन्दुओं की एक धार्मिक यात्रापर मुसलमानों ने हमला किया था

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मस्जिदों पर ढेरों लाउडस्फीकर लगे दिखना आम बात हो गई है (फाइल चित्र)

पिछले सप्ताह गुजरात के एक छोटे-से नगर उपलेटा से एक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ। इसमें यह दिखाया गया कि एक घर की छत पर चारों दिशाओं में लगे लाउड स्पीकर पर दिन में पांच बार हनुमान चालीसा गुंज रही है। इस वीडियो में विशेष बात यह थी कि हनुमान चालीसा का पाठ ठीक मुसलमानों की नमाज की अजान के साथ शुरू होता है। दरअसल, मुसलमानों के पांच वक्त की अजान लाउडस्फीकरों के जरिए तेज आवाज में गुंजने से तंग आकर मेहुल चंद्रवाड़िया ने यह कदम उठाया। वे कहते हैं, ‘‘ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण कानून और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बावजूद मैं पुलिस से लेकर मजिस्ट्रेट, सब के पास दौड़ता रहा, लेकिन किसी ने मेरी मदद नहीं की। सभी ने यह कह कर हाथ खड़े कर दिए कि यह संवेदनशील मामला है। इसमें हम कुछ भी करने में असमर्थ हैं।’’ लिहाजा, उन्होंने यह निश्चय किया कि वह इसका समाधान निकाल करके रहेंगे, ऐसा समाधान जो पूरे देश के काम आ सके।

मेहुल ने जैसे को तैसा वाली रणनीति अपनाई। जैसे ही मस्जिद से तेज आवाज में अजान शुरू होती, वह अपने लाउडस्पीकर पर उतनी ही तेज आवाज में हनुमान चालीसा बजाना शुरू कर देते। लेकिन सवाल है कि क्या मेहुल भाई (जो ताकतवर अहीर समाज से आते हैं, जिनका सौराष्ट्र विस्तार में शक्तिशाली, संगठित समाज है) की तरह देश के अन्य लोग भी ऐसा साहस कर सकेंगे? दरअसल, हिन्दू समाज उसी तरह संगठित नहीं है। वह मुद्दा हद तक सेकुलर, उदार हो चुका है। वहीं मुस्लिम, संगठित हैं और हिंसक भीड़ के रूप में प्रतिक्रिया देते हैं। दूसरी ओर, अगर हिन्दू ऐसा कोई कदम उठाते हैं, तो छद्म सेकुलर गिरोह उस पर टूट पड़ेंगे और यह दिखाने का प्रयास करेंगे कि ‘हिन्दुओं के द्वारा मुसलमानों को प्रताड़ित किया जा रहा है। मजहबी स्वतंत्रता खतरे में है’, पर उन्हें यह नहीं दिखता कि लाउडस्पीकर पर तेज आवाज में अजान से समाज को कितनी परेशानी होती है। बॉलीवुड के पार्श्व गायक सोनू निगम ने जब सोशल मीडिया पर अजान से होने वाली परेशानी का मुद्दा उठाया था तो सेकुलर और वामपंथी जमात उन पर टूट पड़ी थी।  

ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए सरकार ने कानून बनाए हैं। प्रदूषण नियंत्रण कानून-2000 के तहत रिहाइशी, औद्योगिक और अन्य महत्वपूर्ण स्थानों के लिए ध्वनि की तीव्रता निर्धारित की गई है। इसके अनुसार, रिहाइशी इलाकों में 55 डेसीबल से अधिक शोर नहीं होना चाहिए, जबकि औद्योगिक क्षेत्रों के लिए ध्वनि की सीमा 75 डेसीबल तथा वाणिज्यिक क्षेत्रों के लिए 65 डेसीबल तय की गई है। इसके अलावा, स्कूल, अदालत, अस्पताल आदि से 100 मीटर के दायरे में भी शोर पर प्रतिबंध है। बिना किसी सक्षम प्राधिकार की मंजूरी के रात 10 बजे के बाद और सुबह 6 बजे के पहले लाउडस्पीकर का प्रयोग नहीं किया जा सकता। इसमें किसी को किसी तरह की छूट नहीं दी गई है। इसका उल्लंघन करने पर पर्यावरण संरक्षण कानून-1986 की धारा 133 के तहत गिरफ्तारी के बाद आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है। लाउडस्पीकर को भी हटाया जा सकता है।

सवाल यह है कि जब कानून मौजूद है तो पुलिस और स्थानीय प्रशासन इसे लागू क्यों नहीं कराता? इसी सौराष्ट्र के भावनगर जिले में पांच साल तक लाउडस्पीकर से उठने वाला शोर पूरी तरह नियंत्रित था। स्थानीय प्रशासन और पुलिस ने ईमानदारी से इस कानून को लागू कराया था। सितंबर 2004 से अगस्त 2008 तक भावनगर के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक हसमुख पटेल ने जिले की एक-एक मस्जिद और अन्य धार्मिक स्थलों पर जाकर ध्वनि मापक यंत्र से ध्वनि की सीमा को मापा था। इससे मुसलमान सकते में आ गए थे, क्योंकि उनकी मस्जिदों पर लगे लाउडस्पीकर से तय से अधिक मात्रा में शोर होता था। पुलिस ने उसे बंद कराया और पूरे शहर ने पुलिस अधिकारी का आभार माना। बाद में हसमुख पटेल का तबादला सूरत हो गया। हालांकि उनके जाने के बाद भी दो साल तक मस्जिदों में लगे लाउडस्पीकर की आवाज नियंत्रित रही, लेकिन बाद में स्थानीय प्रशासन और पुलिस ढीली पड़ गई। नतीजा, फिर शोर शुरू हो गया। यही कारण है कि आज मेहुल भाई को ऐसा कदम उठाना पड़ रहा है।

प्रश्न यह है कि एक समुदाय विशेष को क्यों इस प्रकार तुष्ट किया जाए कि कोई उसके विरुद्ध कार्रवाई ही न कर सके? उन्हें इस बात की छूट क्यों है कि वे सभ्य समाज को शांति से जीवनयापन भी न करने दें? क्यों पुलिस प्रशासन से लेकर सरकारें और राजनीतिक दल तक इनके समक्ष लाचार नजर आते हैं? वास्तव में वोटबैंक की राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों ने इन्हें इतना सिर पर चढ़ा रखा है कि कोई भी उन्हें कुछ नहीं कह सकता। यदि यही हाल रहा तो मेहुल चंद्रवाड़िया की तरह समाज के दूसरे लोग भी यही रास्ता अपनाने को विवश होंगे। कानून न्याय देने के लिए बनाए गए हैं। ये सभी भारतीयों पर समान रूप से लागू होते हैं।  अगर कानून न्याय दिलाने में असफल रहता है तो ऐसे कानून का कोई औचित्य नहीं रह जाता। गुजरात में, विशेष कर सौराष्ट्र और कच्छ में, 20 साल पहले तक ऐसी स्थिति नहीं थी।

मुसलमान यहां शांतिपूर्वक और सभी के साथ मिलजुल कर रहते थे। गोधरा कांड के समय भी सौराष्ट्र और कच्छ में कोई अप्रिय घटना नहीं घटी थी। प्रदेश में सौहार्द का वातावरण था, लेकिन तब्लीगी जमात और जमात-ए-इस्लामी के इस क्षेत्र में प्रवेश करने के बाद से सौराष्ट्र और कच्छ असामाजिक गतिविधियों का केंद्र बनने लगे। अब आएदिन कहीं न कहीं मजहबी उन्माद सामने आता रहता रहता है। कुछ दिन पहले गांधीधाम के किडाणा गांव में श्री रामजन्मभूमि निर्माण के लिए एक यात्रा निकाली गई थी, जिस पर मुसलमानों ने जानलेवा हमला किया। इस हमले में कई लोग घायल हो गए थे। पुलिस ने इस मामले में 40 से अधिक लोगों को हिरासत में ले लिया था। इसमें वे लोग भी शामिल थे, जो श्रीराम मंदिर के लिए सहयोग राशि एकत्र करने के लिए यात्रा निकाल रहे थे।

एक तो मुसलमानों ने यात्रा पर हमला किया, ऊपर से हमले के तुरंत बाद कच्छ के मुसलमानों की एक सभा हुई, जिसमें मुस्लिम नेता खुलेआम कह रहे थे कि ‘‘मुझे जिहाद के लिए 300 लोग चाहिए, बाकी खुद संभाल लूंगा। हमारा मुकदमा लड़ने के लिए वकीलों की टीम तैयार रहे, बाकी सब को हम ठीक कर देंगे। हम हिन्दुओं को सबक सिखा देंगे।’’ मुसलमान ताजिया जुलूस निकाल सकते हैं, यातायात बाधित कर नमाज पढ़ सकते हैं, लेकिन हिन्दुओं की पदयात्रा उन्हें नागवार गुजरती है।

सामरिक दृष्टि से कच्छ अत्यंत संवेदनशील जिला है। इसकी बहुत बड़ी सीमा पाकिस्तान से लगती है। सीमा से लगे सभी गांव  पूर्णतया मुसलमानों के हैं। इन इलाकों में एक भी हिन्दू घर नहीं है। इन इलाकों में जिहादी, देश विरोधी और हिन्दू विरोधी गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं, जिन पर तत्काल अंकुश लगाने की आवश्यकता है।   


‘‘लाउडस्पीकर से अजान पढ़ना इस्लाम में जरूरी नहीं’’5 मई, 2020 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि मस्जिदों में लाउडस्पीकर से अजान पढ़ना इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। दरअसल, उत्तर प्रदेश के गाजीपुर, हाथरस और फर्रुखाबाद जिले में जिलाधिकारियों ने रात 10 बजे से लेकर सुबह 6 बजे तक मस्जिदों में लाउडस्पीकर से अजान पढ़ने पर रोक लगा दी थी। इसे धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन बताते हुए इसके विरुद्ध गाजीपुर के बसपा सांसद अफजाल अंसारी, सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता सैयद वसीम कादरी और कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। इस पर अदालत ने मौखिक अजान की अनुमति दी थी, लाउडस्पीकर पर अजान की नहीं। इसी तरह, पिछले साल जुलाई में गांधीनगर के डॉ. धर्मेंद्र प्रजापति ने अधिवक्ता धर्मेश गुर्जर के माध्यम से अमदाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर मस्जिदों में अजान के लिए लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाने की मांग की थी। इसमें उन्होंने कहा था कि तड़के और देर रात को लाउडस्पीकर पर अजान से लोगों की नींद में बाधा पहुंचती है। यह संविधान प्रदत्त मूल अधिकार व अनुच्छेद 21 के तहत सम्मानपूर्वक जीने के अधिकार के विरुद्ध है। याची ने पहले गांधीनगर के सेक्टर-7 पुलिस थाने में इसकी शिकायत की थी, लेकिन कार्रवाई नहीं होने पर अदालत में याचिका दायर की।