सह सरकार्यवाह श्री सुरेश सोनी की पुस्तक ‘पंचयज्ञ से परम वैभव’ लोकार्पित

    दिनांक 19-मार्च-2021   
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विमोचन समारोह को संबोधित करते हुए डॉ. कृष्णगोपाल। मंच पर हैं (बाएं से) डॉ. ललित बिहारी गोस्वामी एवं  प्रो. पूरण चंद जोशी

गत त 9 मार्च को वाइसरीगल लॉज (दिल्ली विश्वविद्यालय) के कन्वेंशन हॉल में एक गरिमामय समारोह में रा.स्व.संघ के सहसरकार्यवाह श्री सुरेश सोनी की पुस्तक ‘पंचयज्ञ से परम वैभव’ का विमोचन हुआ। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे संघ के सहसरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल और अध्यक्षता की दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. पूरण चंद जोशी ने। कोरोना काल में संघ के एक प्रकल्प कुटुंब प्रबोधन ने श्री सोनी का वक्तव्य आयोजित किया था। अपने उस उद्बोधन में सहसरकार्यवाह ने कोरोना से उपजे विषादमय वातावरण से उबरने और समाज तथा देश के उत्थान हेतु अग्रसर होने में सहायक भारत में सदियों से कुटुंब से मिलते रहे संस्कारों का उल्लेख किया। वस्तुत: यह पुस्तक उनके उसी उद्बोधन को सहेजने का सत्प्रयास है।


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 कार्यक्रम में उपस्थित प्रबुद्धजन
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल ने कुटुंब व्यवस्था और परिवार से संस्कार अग्रसारित होने की भारतीय परंपरा का सूत्रवार विवेचन किया। उन्होेंने भारतीय परंपरा में ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, नरयज्ञ और भूतयज्ञ के पीछे का भाव स्पष्ट करते हुए कहा कि व्यक्ति का कर्तव्य है ईश्वर, संत, प्रकृति, परिवार, समाज के लिए कृतज्ञता का भाव रहे। ‘मेरे पास जो है सो मेरा नहीं, मुझे तो सूर्य, अग्नि, वायु, प्रकृति, सहयोगी आदि से मिला है’, ऐसा भाव कभी किसी को गलत मार्ग पर नहीं ले जा सकता। उन्होंने यज्ञ का भाव बताया कि यज्ञ में आहुति के बाद स्वाहा बोलने का ही अर्थ है, कृतज्ञता ज्ञापित करना।

सहसरकार्यवाह ने आगे कहा  कि आज के भौतिकतावादी काल में अधिकाधिक संसाधनों के उपभोग और अधिकाधिक पैसे के संचय की प्रवृत्ति परिवारों को बांट रही है, परिवार छोटे हो गए हैं। यह चलन गलत है। संयुक्त परिवारों में बच्चों को अपने से बड़ों के आचरण से स्वत: ही संस्कार मिलते थे, किसी को सिखाना नहीं पड़ता था कि बड़ों का सम्मान करना है, माता-पिता की सेवा करनी है, सबको बांटकर खाना है, अपने पास किसी को कुछ देने योग्य है तो वह देना है। उन्होंने कहा कि जो देता है वह देवता है और जो नहीं देता वह राक्षस। इसलिए हमें अपने परिवारों में संस्कार रोपने होंगे, बच्चों को धर्मग्रंथों से परिचित कराना होगा, उनका प्रणयन करना होगा। सबसे मिलकर, सबके साथ बांटकर चीजों का उपभोग करना होगा। यज्ञ हमारे अंदर की रिक्तता को भरता है। ये सब भाव कुटुंब से आते हैं और कुटुंब प्रबोधन प्रकल्प इसी कार्य में रत है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. जोशी ने कहा कि इस पुस्तक में भरतीय दर्शन की नए रूप में विवेचना की गई है। पुस्तक में वर्णित विषयों पर विशद् चिंतन और मनन होना चाहिए।
पुस्तक का प्रकाशन किया है सुरुचि प्रकाशन ने। 36 पृष्ठ की पुस्तक का मूल्य मात्र 30 रु. रखा गया है। विमोचन कार्यक्रम के आरम्भ में सुरुचि प्रकाशन के अध्यक्ष डॉ. ललित बिहारी गोस्वामी ने पुस्तक की विस्तृत जानकारी दी और धन्यवाद ज्ञापित किया प्रकाशन के प्रबंध निदेशक श्री रजनीश जिंदल ने।