होली के रंग को मैला करने की वामपंथी सजिश

    दिनांक 28-मार्च-2021
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 चंद्रप्रकाश
पिछले कुछ सालों  से हिंदू त्यौहारों के साथ एक गहरी साजिश की जा रही है। ये एक तरह का सांस्कृतिक जिहाद है जिसे मीडिया के माध्यम से योजनाबद्ध तरीके से चलाया जा रहा है

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टाइम्स ऑफ इंडिया होली का पारंपरिक खाना बिरयानी और कबाब बताकर लोगों को भ्रमित कर रहा है।
ईद अहिंसा और जीवों पर दया का त्यौहार है, इस दिन लोग गुझिया, मालपुए और ठंडई बनाते हैं, यह बात सुनकर आप क्या कहेंगे? यही न कि ये कोई मज़ाक़ है। लेकिन कोई बार-बार यही कहे, समाचार पत्रों में लिखे, टीवी पर भी यही बताए, तब आप समझ जाएंगे कि अवश्य ये कोई शरारत है। पिछले कुछ वर्ष में इसी तरह की शरारत हिंदू त्यौहारों के साथ चल रही है। ये एक तरह का सांस्कृतिक जिहाद है जो मीडिया के माध्यम से किया जा रहा है। होली से ठीक पहले टाइम्स ऑफ इंडिया अख़बार ने एक लेख प्रकाशित किया है, इसके साथ होली के पारंपरिक पकवानों का एक चित्र छपा है, जिसमें कबाब और बिरयानी दिखाई गई है। गुझिया, पापड़ी, पूरण पोली और मालपुए जैसे होली के वास्तविक पकवान ग़ायब हैं। लेख में बताया गया है कि कैसे जहांगीर से लेकर बहादुर शाह ज़फ़र तक मुग़लों के काल से होली का त्यौहार मनाया जा रहा है। होली पर मुशायरों का आयोजन होता है। होली का इतिहास मुग़लों से शुरू होता है और बिरयानी-कबाब जैसे लज़ीज़ पकवानों पर ख़त्म हो जाता है।
हो सकता है कि आप सोच रहे हों कि किसी नासमझ ने लिखा होगा। लेकिन ऐसा नहीं है। हिंदू पर्वों और त्यौहारों का ये सेकुलरीकरण बहुत सोच-समझकर योजना के साथ किया जा रहा है। इस अभियान में कुछ छद्म इतिहासकारों, कलाकारों और मीडिया की सहायता ली जा रही है। यदि कहें कि ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ इस सांस्कृतिक जिहाद का नेतृत्व कर रहा है तो अनुचित नहीं होगा।
वसंत पंचमी ऋतु परिवर्तन का सनातन पर्व है। पूरे देश में इसे मनाया जाता है। माता सरस्वती की पूजा की जाती है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने ऐसे किसी आयोजन का समाचार नहीं छापा। लेकिन दिल्ली की निज़ामुद्दीन दरगाह पर वसंत पंचमी कार्यक्रम का समाचार दो दिन तक प्रमुखता से छपा। इनमें बताया कि हजरत निज़ामुद्दीन औलिया के समय से ही वसंत पंचमी मनाई जा रही है। मां सरस्वती की पूजा के पर्व को अख़बार ने बड़ी सफ़ाई से निज़ामुद्दीन औलिया का त्यौहार बना दिया। यह भी बता दिया कि इस अवसर पर बड़ी संख्या में हिंदू दरगाह पर पहुंच रहे हैं।
इसी तरह रक्षाबंधन को भी धीरे-धीरे इस्लामी त्यौहार बनाया जा रहा है। पिछले रक्षाबंधन पर हिंदुस्तान टाइम्स ने राना सफ़वी नाम की विवादित वामपंथी लेखिका के हवाले से छापा कि रक्षाबंधन पर्व की शुरुआत मुग़ल राजाओं ने की थी। जिस संस्कृति में बहन के रिश्ते में भी शादी करके बच्चे पैदा करने की परंपरा रही हो, उसमें रक्षाबंधन की कल्पना किसी हास्य कथा से कम नहीं। राना सफ़वी ही दिवाली को भी लालक़िले में रहने वाले मुग़ल परिवारों का त्यौहार साबित किया था। कई चैनल भी इन दिनों दिवाली के लिए जश्न-ए-चरागां शब्द प्रयोग कर रहे हैं। यह झूठ गढ़ा जा रहा है कि पटाखों की परंपरा भी मुग़लों की ही देन है। जबकि इस बात के लिखित साक्ष्य हैं कि भारत में हज़ारों वर्ष से आतिशबाजी प्रयोग होती रही है।
क्या यह कम अपमानजनक है कि हिंदुओं को हज़ारों वर्ष पुरानी इस परंपरा को अपना सिद्ध करने के लिए भी साक्ष्य प्रस्तुत करने पड़ें? हिंदू त्यौहार केवल मौजमस्ती, बल्कि आस्था के पर्व होते हैं। उनके पीछे एक धार्मिक परंपरा और वैज्ञानिक कारण भी होते हैं। जो लोग इन परंपराओं को नहीं मानते उन्हें क्या अधिकार है कि वो हिंदू त्यौहारों में इस तरह की अनैतिक छेड़छाड़ करें? जिस तरह से मुग़लों को उदार और भारतीय सभ्यता का वास्तविक प्रतीक सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है उसे कभी स्वीकार नहीं किया जा सकता।