होली पर विशेष : प्रकृति का मंगलोत्सव

    दिनांक 28-मार्च-2021
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पूनम नेगी

प्रकृति का बदलाव मानव प्रवृत्ति को भी बदल देता है। फागुनी प्रकृति जब विविध रूपों में रंगों की छटा बिखेरती है, तब होली का रंगपर्व भारतीय जन-जीवन में अवतरित होता है और पूरी प्रकृति में मानो महारास शुरू हो जाता है। बदलते दौर में होली का पारंपरिक महत्व क्षीण न हो, इसकी चिंता करनी होगी
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बरसाने की होली: अबीर-गुलाल में भीगा माहौल, टेसू के रंग में नहाए हुरियारे और होली के गीतों के बीच मस्ती का आलम    (फाइल चित्र)


हमारे यहां ब्रह्म को सच्चिदानंद कहा गया है। आनंद से परिपूर्ण। रंगोत्सव होली का संदेश यही है। जीवन में भले कितना दुख आए, लेकिन यह भाव स्थायी नहीं होता, क्योंकि जीवन अंतत: है तो आनंद से ही परिपूर्ण। होली की खूबी यह है कि यह आने वाले के साथ-साथ जाने वाले को भी अभिनंदित करती है। यदि पतझड़ में पत्ते झड़ेंगे नहीं, तो वृक्ष पर नए पत्ते आएंगे कहां से? यही है होली का तत्वदर्शन।  

यह पर्व अन्न को संस्कारित कर ग्रहण करने का महान दर्शन स्वयं में समेटे हुए है। नवान्न की बालियों को होलिका की अग्नि में होमे जाने की वैदिक प्रथा के कारण ही इस त्योहार का नाम होली पड़ा। हिंदू संस्कृति में प्रकृति व मानव के मध्य एक गहन अन्तर्सम्बन्ध माना जाता है। इस गहनता का एक खास कारण है। दरअसल जिन पंचतत्वों (आकाश, पृथ्वी, वायु, अग्नि और जल) से इस प्रकृति का निर्माण हुआ है, उन्हीं पंचतत्वों से मानव काया का भी सृजन हुआ है। इस बात को आधुनिक विज्ञान भी स्वीकार कर चुका है। यही कारण है कि प्रकृति का बदलाव मानव की प्रवृत्ति को भी बदल देता है। फागुनी प्रकृति जब विविध रूपों में रंगों की छटा बिखेरती है, तब होली का रंगपर्व भारतीय जन-जीवन में अवतरित होता है और पूरी प्रकृति में मानो महारास शुरू हो जाता है।

रंगबिरंगे फूल और उनकी सुगंध, उन पर मंडराते भंवरे और तितलियां और खेतों में सरसों के पीले फूलों से प्रकृति सुन्दर और मादक दिखाई देती है। सौंदर्य का यह संगम पूरे जगत को मोहित करने लगता है।  होली मलिनताओं के दहन और तमस को जलाने का महा अनुष्ठान है। यह प्रेम की वह रसधारा है जिसमें समूचा समाज एक साथ भीगकर अपने अंतस के कलुष को धो डालता है। इस पर्व की राग, रंग, हंसी, ठिठोली, लय, चुहल, आनंद और मस्ती से सभी सामाजिक विषमताएं सहज ही दूर हो जाती हैं। जाति-वर्ण के भेदों को दूर करते होली के आनंदोल्लास को जन-जन में प्रवाहित होता सहज ही देखा जा सकता है। प्रकृति के प्रवाह से प्रकट यह पर्व समाज के बीच ऐसा वातावरण सृजित करता है जिसमें वर्षभर से अंतस में दबी कुंठाएं गायब हो जाती हैं। बौद्ध साहित्य में उल्लेख है कि एक बार श्रावस्ती में होली महोत्सव की ऐसी धूम मची कि गौतम बुद्ध सात रोज तक नगर के बाहर ही बैठे रहे।

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भारत के इस महोत्सव की नींव हमारे ऋषियों ने वैदिक युग में रखी थी। भक्त ह्दय प्रह्लाद के आह्वान पर भगवान नृसिंह के प्रकटीकरण और वरदानी होलिका के अग्नि में जलकर नष्ट हो जाने का इस पर्व से जुड़ा पौराणिक कथानक यही बताता है कि यदि उद्देश्य व भावनाएं कलुषित हों तो ईश्वरीय वरदान भी निष्फल हो जाते हैं। होलिका दहन के इसी प्रसंग को केन्द्र में रखकर हमारे ऋषियों ने इस पर्व परम्परा का शुभारंभ किया था। यही नहीं, हमारे तत्वदर्शी मनीषी इस तथ्य से भलीभांति परिचित थे कि शीत से ग्रीष्म में ऋतु परिवर्तन की इस अवधि में चेचक व खसरा जैसे संक्रामक रोगों की आशंका रहती है।

अत: इनसे बचने के लिए उन्होंने टेसू, केसर, मजीठ, नीम व पलाश आदि के फूलों के रोगाणुरोधी गुणों को परखकर उनका रंग बनाकर एक-दूसरे पर डालने की प्रथा शुरू की। धर्मशास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि प्राचीन काल में होलिका की हवन सामग्री में भी इन औषधीय फूलों का अधिकता होता था ताकि वायु में उपस्थित रोग के कीटाणु नष्ट हो जाएं। जानकारों की मानें तो लगभग आधी सदी पूर्व तक होली कुदरती रंगों यानी टेसू, केसर, मजीठ आदि के रंगों से खेली जाती थी। मगर बदलाव की बयार में कुदरत के ये रंग आज न जाने कहां खो गये हैं। 

होली प्रकृति का मंगलोत्सव है। सिर्फ रंग और पकवान ही नहीं; फाग, होरी, धमार, रसिया, कबीर, जोगिरा शैली में लोकगीतों की गायकी सदियों से इस लोकोत्सव में जीवंतता भरती रही है। इसमें ब्रज की होली की तो बात ही निराली है। अवध के रघुवीर की होली, काशी के भोलेबाबा की होली और देवभूमि उत्तराखंड की होली की महफिलें भी कम लोकप्रिय नहीं। एक दौर था जब वसंत पंचमी को डंडा गाड़ने के साथ ही होली के गीतों का सुरूर लोगों पर हावी होना शुरू हो जाता था।

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होली गीत और फाग गाने वालों की टोलियां सजने लगती थीं जो महाशिवरात्रि आते-आते बुलंदियों पर पहुंच जाती थीं। होली के उन दिनों की स्मृतियां आज भी पिछली पीढ़ी के लोगों के चेहरों पर मुस्कान ला देती हैं जब ढोल, नगाड़ा, झाल, झांझ व मंजीरे पर होली गीतों का गायन एक अलग ही समा बांध देता था। ‘आज बिरज में होरी रे रसिया...’, ‘होली खेलें रघुबीरा अवध में...’, ‘खेलें दिगंबर मसाने में होली...’ और  ‘जोगीरा -सा रा-रा...’ जैसे पारंपरिक होली गीत आज भी अलमस्ती का माहौल रच देते हैं। आज भी अनेक स्थानों पर लोग एकत्र होकर होली गीत गाते हैं। होली के दौरान गाये जाने वाले ‘चहका’ व ‘कबीर’ जैसे पारंपरिक गीतों के गायक अब भी अपनी परंपरा को सहेजने में जुटे दिखते हैं। हालांकि अब इन परंपराओं पर आधुनिकता का असर दिखने लगा है। 

पीलीभीत की राधेश्याम संगीत मण्डली के वरिष्ठ कलाकार विष्णु शर्मा की मानें तो, पहले शिवरात्रि के दिन से ही होली गीतों की शुरुआत हो जाती थी और गांव के गांव इन फागुनी गीतों की मस्ती में डूब जाते थे जो होली के बाद तक चलते थे; लेकिन अब सिर्फ इस क्षेत्र के ठेठ ग्रामीण इलाकों में होली के दिन शाम को होलिका के पास जाकर फाग गाने की परंपरा निभायी जाती है। पहले वसंत पंचमी के बाद गावों युवाओं द्वारा नगाड़े की थाप पर फाग गीत गाये जाते थे।

युवा टोलियां नगाड़े की ताल बिखेरने के लिए साल भर होली के इंतजार में रहती थीं, पर अब  ढोल, ताशा, मजीरा और डफली की वह गूंज बहुत कम सुनने को मिलती है। शहरी क्षेत्रों में तो आधुनिकता इस कदर हावी हो गयी है कि रात में होली तो जलाई जाती है, पर अगली सुबह दो घंटे के भीतर लोकाचार स्वरूप रंग लगाया जाता है। ऐसा लगता है जैसे होली के उत्सव से उमंग कहीं खो सी गयी हो। सामूहिक उत्साह और उल्लास के प्रतीक इस त्योहार को नई चाल की ऐसी नजर लगी कि मिट्टी की सोंधी महक वाले फाग और फगुआ न जाने कहां खो गये।

 ब्रजमंडल, सुदूर पर्वतीय अंचलों, ठेठ ग्रामीण व वनवासी क्षेत्रों की बात छोड़ दें तो अपनी उत्सवधर्मिता के लिए देश-दुनिया में विख्यात इस लोकपर्व की परंपराएं अब कहीं धुंधलाती जा रही हैं। इन पर कथित आधुनिकता और भौतिकता का आवरण चढ़ता जा रहा है। उन्हें बचाने हेतु हमें मिलकर प्रयास करना होगा ताकि हमारी लोक परंपराएं अपने उसी उत्साह और उत्सवधर्मिता के साथ नई पीढ़ी में भी अलौकिक आनंद बिखेरती रहें।