बीबीसी की साम्राज्यवादी घृणा

    दिनांक 08-मार्च-2021
Total Views |
बीबीसी किसी रिपोर्ट को बनाते समय अपनी श्रेष्ठता की भावना से ऊपर नहीं उठ पा रहा है 

n_1  H x W: 0 x

 अभिव्यक्ति और असहमति की स्वतंत्रता को लेकर मुख्यधारा मीडिया का पाखंड हर दिन उजागर होता रहता है। अनुराग कश्यप और तापसी पन्नू पर आयकर चोरी की जांच हो तो वह बदले की कार्रवाई है, लेकिन कंगना रनौत के घर को अवैध तरीके से तुड़वा देना प्रशासनिक कार्रवाई है। मियां खलीफा और रिहाना को भारतीय किसानों पर बोलने का अधिकार है, लेकिन लता मंगेशकर और सचिन तेंदुलकर को नहीं। दिशा रवि कुछ भी कर लें उनको ‘पर्यावरण कार्यकर्ता’ कहकर ही संबोधित किया जाएगा, लेकिन कोई सामान्य व्यक्ति सोशल मीडिया पर उनके विरोध में अपनी राय लिख दे तो वह ‘ट्रोल’ कहलाएगा। अजय देवगन की कार को रोककर उन्हें कथित किसान आंदोलन के समर्थन में बोलने के लिए धमकाना प्रदर्शन की आजादी का हिस्सा है, लेकिन हिंदूफोबिक वेब सीरीज बनाने वालों की थाने में शिकायत करना फासीवाद है। सेकुलर मीडिया का एक बड़ा वर्ग ऐसे ही ढेरों विरोधाभासी काम करता रहता है। इसके बाद भी वह चाहता है कि उसे निष्पक्ष माना जाए।

पश्चिम बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी ही नहीं, लगता है उनके द्वारा पोषित कुछ मीडिया समूहों का भी बहुत कुछ दांव पर है। उत्तर 24 परगना जिले में एक भाजपा कार्यकर्ता की 85 वर्षीय मां को तृणमूल कांग्रेस के गुंडों ने मारा-पीटा। बहुत मुश्किल से यह समाचार कुछ अखबारों और चैनलों पर दिखाया गया। पुलिस ने प्राथमिकी भी दर्ज कर ली। लेकिन अगले ही दिन इंडिया टुडे ने इस वास्तविक घटना का भी ‘फैक्ट चेक’ कर डाला। उसने छापा कि एक रिश्तेदार ने दावा किया है कि उस भाजपा कार्यकर्ता ने ही अपनी मां की पिटाई की। चैनल ने इसे ‘कहानी में बड़ा उलटफेर’ बताते हुए दिखाया। जिसके बयान के आधार पर इतना बड़ा दावा किया गया वह घटनास्थल पर मौजूद ही नहीं था।

उधर गांधी परिवार मनोरंजन की नई-नई सामग्री उपलब्ध करा रहा है। राहुल गांधी ‘पुशप्स’ लगाते हुए, समुद्र में डुबकी लगाते हुए, प्रियंका वाड्रा चाय के बागान में पत्तियां तोड़ते हुए, ऐसे ही ढेरों तमाशे चैनलों और अखबारों को मिल रहे हैं। वे ये सब पूरी वफादारी के साथ दिखाते हैं मानो कोई राजा अपनी प्रजा के बीच में आ गया हो। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी राजनीतिक बयान के नाम पर चाहे जो बोलें कोई चैनल या अखबार उनका ‘फैक्ट चेक’ नहीं करता। राहुल गांधी अब भी दोहरा रहे हैं कि वे मत्स्य पालन मंत्रालय बनाएंगे, जबकि वह पहले से है। प्रियंका वाड्रा अब भी कहती हैं कि केंद्र सरकार सबकी नागरिकता छीनने जा रही है। भारत के प्रति बीबीसी की साम्राज्यवादी घृणा कोई नई बात नहीं है। भारत से जुड़ी घटनाओं की रिपोर्टिंग करते हुए बीबीसी अपने डीएनए में छिपी श्रेष्ठता की भावना को छिपा नहीं पाता। यही कारण था कि किसानों के नाम पर चल रहे आंदोलन के एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गाली दी गई।

बीबीसी ने इस हिस्से को कार्यक्रम से हटाने की आवश्यकता नहीं समझी। बीबीसी समय-समय पर भारत की संप्रभुता को चुनौती देने का प्रयास करता रहा है। देश में जब भी शिक्षा व्यवस्था में सुधार के प्रयास किए जाते हैं वामपंथी मीडिया का एक वर्ग अनावश्यक विवाद खड़ा करने का प्रयास करता है। टाइम्स आॅफ इंडिया फर्जी खबर छापी कि मदरसों में अब से गीता और रामायण पढ़ाई जाएगी। अभी तक सामान्य स्कूलों में ही दी जा रही ‘मजहबी शिक्षा’ को पूरी तरह हटाया नहीं जा सका है, दूसरी तरफ मदरसों में गीता, रामायण पढ़ाने की कल्पना करना भी हास्यास्पद है। लेकिन टाइम्स आॅफ इंडिया के संपादकों को भली-भांति पता होगा कि यह हास्यास्पद और शरारतपूर्ण समाचार क्यों छापा गया। संभवत: ऐसा करके वे दिखा रहे थे कि जब कुछ न हो तब भी विवाद पैदा किया जा सकता है।

टाइम्स आॅफ इंडिया वह समाचार पत्र है जो एक तरफ भाजपा शासित राज्य सरकारों के सरकारी विज्ञापन छापता है और उसके ठीक बगल में उसी राज्य सरकार को बदनाम करने के लिए कोई झूठी खबर भी लगा देता है। लेकिन यही काम वह कभी किसी कांग्रेस या आम आदमी पार्टी सरकार के विज्ञापनों के साथ नहीं करता। ऐसी शरारतपूर्ण फर्जी खबर भाजपा शासित राज्यों के लिए ही आरक्षित हैं। महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े लव जिहाद कानून को लेकर जितना झूठ टाइम्स आॅफ इंडिया ने फैलाया उतना

कांग्रेसी दुष्प्रचार तंत्र के ‘द वायर’, ‘द क्विंट’ और ‘स्क्रोल’ ने नहीं फैलाया होगा।