इन दो पक्षियों से सीखें हिन्दू

    दिनांक 01-अप्रैल-2021
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आर.डी. अमृते की फेसबुक वॉल से 

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हिंदुओं को दो पक्षियों के उदाहरण से सीखने की जरूरत है- पहला, डोडो और दूसरा केसोवरी। डोडो मॉरीशस व हिंद महासागर के मेडागास्कर जैसे द्वीपों में पाया जाता था, जहां पहले इनसानी आबादी नहीं थी। इन द्वीपों में इनका शिकार करने वाला कोई जीव-जंतु भी नहीं था, इसलिए ये पक्षी पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी रक्षात्मकता और आक्रामकता को भूल चुके थे। इन द्वीपों में इन्हें भरपूर खाना मिलता था, इसलिए ये आराम से वहां रहते थे। इन्हें तेज भागना, दौड़ना या दौड़ाना या उड़ना नहीं पड़ता था। इससे धीरे-धीरे इनकी टांगों की हड्डियां कमजोर हो गर्इं।
16वीं सदी के शुरू में डच लोग मॉरीशस पहुंचे। वे यह देखकर हैरान रह गए कि इन पक्षियों को मनुष्य आराम से पकड़ लेता था। फिर डच लोगों ने इनका शिकार करना शुरू कर दिया। चूंकि डच अपने साथ कुत्ते-चूहे आदि लेकर गए थे, इसलिए धीरे-धीरे कुत्ते भी डोडो का शिकार करने लगे और चूहों ने उनके अंडों को खाना शुरू कर दिया। डोडो बिल्कुल भी रक्षात्मक नहीं रह गए थे, क्योंकि वे जिस माहौल में पीढ़ी दर पीढ़ी पल रहे थे, वहां उन्हें आक्रामक होने की जरूरत नहीं थी। लेकिन जब उन्हें आक्रामक होने की जरूरत पड़ी, तब वे यह भूल गए कि हमला कैसे करते हैं और तेज कैसे भागते हैं। 
नतीजा, सन् 1710 तक डोडो धरती से पूरी तरह विलुप्त हो गए। इस पक्षी के दो ‘ममी’ बनाकर उन्हें ब्रिटेन के ‘रॉयल म्यूजियम’ और मॉरीशस यूनिवर्सिटी में रखा गया है।
दूसरा पक्षी है केसोवरी। यह पापुआ न्यू गिनी, आॅस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड यानी प्रशांत महासागर और कैरेबियन महासागर के कई द्वीपों में रहता था। यह भी शुतुरमुर्ग, एमु और डोडो के परिवार का ही पक्षी था। लेकिन इसे ऐसे माहौल में रहना पड़ा, जहां इसके कई शिकारी थे। यहां तक कि मनुष्य भी इसका शिकार करने की कोशिश करते थे। केसोवरी ने  पीढ़ी दर पीढ़ी अपने अंदर बेहद तेज आक्रामकता, गुस्सैल स्वभाव जैसे रक्षात्मक हथियार विकसित कर लिए।
 आज स्थिति यह है कि केसोवरी मनुष्यों को देखते ही उन्हें दौड़ाकर अपने पंजों से फाड़ देते हैं। ये 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकते हैं। इनके नाखून 8 इंच लंबे और किसी चाकू की धार की तरह पैने होते हैं। अंग्रेजों ने जब पापुआ न्यू गिनी, न्यूजीलैंड और आॅस्ट्रेलिया पर कब्जा किया तब वे इनका शिकार भी करना चाहते थे, लेकिन केसोवरी पहले से ही प्रतिकूल माहौल में रहे थे। इसलिए उन्होंने जमकर प्रतिकार किया और झुंड में रहकर हमला करना भी सीख लिया, क्योंकि बाद में अंग्रेज गोली से इनका शिकार करने की कोशिश करते थे, तब इनके समूह का दूसरा पक्षी पीछे से आकर शिकारी पर हमला कर देता था। आज जिन जंगलों में  केसोवरी पक्षी पाए जाते हैं, वहां पर चेतावनी वाले बड़े-बड़े बोर्ड लगे होते हैं, क्योंकि ये मनुष्य को देखते ही हमलावर हो जाते हैं। केसोवरी धरती से विलुप्त नहीं हुए, बल्कि आराम से अपने प्राकृतिक वास में फल-फूल रहे हैं।
 निष्कर्ष: दोनों पक्षियों के उदाहरण से यह सीख मिलती है कि जो प्रजाति पीढ़ी दर पीढ़ी अपने संतानों को प्रतिकार करना नहीं सिखाएगी, वह पीढ़ी विलुप्त हो जाएगी। पाकिस्तान में हिंदुओं ने बड़ी-बड़ी हवेलियां बनार्इं। नतीजा क्या हुआ? उन हवेलियों में अब ‘शांतिदूत’ रहते हैं। कश्मीर में भी उन्होंने बड़ी-बड़ी हवेलियां बनार्इं। आज उन हवेलियों में भी ‘शांतिदूत’ रहते हैं। केरल के कासरगोड सहित कई जिलों में हिंदुओं ने बड़ी-बड़ी हवेलियां बनार्इं, जिनमें आज ‘शांतिदूत’ रहते हैं। अगर हिंदुओं ने केसोवरी से प्रेरणा लेते हुए पहले ही आक्रामकता दिखाई होती तो आज ऐसे हालात नहीं होते।    
    —फेसबुक वॉल से