भटकाने में माहिर सेकुलर मीडिया

    दिनांक 01-अप्रैल-2021
Total Views |
जब भी कांग्रेस की कोई सरकार मुसीबत में फंसती है, मीडिया का एक धड़ा उसे बचाने को कूद पड़ता है

narad_1  H x W:

कांग्रेसी सरकारें जब भी अपने अंतर्विरोधों में ्रफंसती हैं तो उनके बचाव में सबसे पहले मीडिया का एक बड़ा वर्ग सामने आता है। महाराष्ट्र में वही हो रहा है। महाराष्ट्र सरकार के वसूली गिरोह का भंडाफोड़ आपसी लड़ाई में हुआ है, पर मीडिया का एक वर्ग लगातार यह लिख और बता रहा है कि भाजपा महाराष्ट्र सरकार को अस्थिर करना चाहती है। टाइम्स आॅफ इंडिया समूह हो या इंडिया टुडे समूह, दोनों पर महाराष्ट्र की वर्तमान सरकार के बहुत एहसान हैं। इसलिए दोनों के स्वर शुरू से ही बहुत नरम हैं। शेखर गुप्ता जैसे लोग भी यह समझाने में जुटे हैं कि सुशांत सिंह राजपूत, कंगना रनौत व कोरोना वायरस के बाद यह भाजपा की नई चाल है, ताकि उद्धव ठाकरे सरकार को गिराया जा सके। कुछ ऐसी ही लंगड़ी कवरेज बंगाल चुनाव को लेकर हो रही है। ममता बनर्जी की चोट को ‘हमला’ बताने वाले चैनलों को सहानुभूति बटोरने का उनका नाटक अभी तक नहीं समझ में आया है। कूचबिहार में भाजपा के मंडल अध्यक्ष अमित सरकार का फांसी पर लटकता शव मिला, लेकिन वह तो सामान्य बात है। हिंदूवादी नेताओं की हत्याएं मीडिया के लिए न तो पहले महत्वपूर्ण रहीं, न अब चुनाव के समय।
ब्रिटिश सरकार के पैसों पर चलने वाले बीबीसी का भारत में फेक न्यूज फैलाने का अभियान जारी है। योगी आदित्यनाथ सरकार के 4 वर्ष पूरे होने पर वेबसाइट ने दावा किया कि उत्तर प्रदेश में देश के कई बड़े राज्यों से अधिक दंगे हो रहे हैं। इसके लिए राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों में ही फेरबदल कर दिया। तथ्य यह है कि 4 वर्ष में उत्तर प्रदेश में कोई सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ। प्रदेश की छवि बिगाड़ने के लिए गढ़े गए इस झूठ को फैलाने में गूगल व फेसबुक जैसे सोशल मीडिया ने पूरी सहायता की। उत्तर प्रदेश पुलिस ने बीबीसी का झूठ उजागर किया।
अंतर्धार्मिक विवाह मीडिया का प्रिय विषय है। बशर्ते लड़का मुस्लिम व लड़की हिंदू होनी चाहिए। दिल्ली के सराय काले खां क्षेत्र में हिंदू अनुसूचित जाति के एक लड़के और मुस्लिम लड़की ने भागकर शादी कर ली। बदला लेने के लिए भीड़ ने गली में तोड़फोड़ मचाई। उत्तर प्रदेश में लव जिहाद की खबरें पहले पन्ने पर छापने वाले टाइम्स आॅफ इंडिया ने देश की राजधानी का यह समाचार अंदर के पन्नों में छिपा दिया। ‘दलित-दलित’ की रट लगाने वाले मीडिया ने यह भी छिपा लिया कि पीड़ित परिवार दलित है। सोचने की बात है कि अनुसूचित जातियों पर आए दिन होने वाले मुसलमानों के हमलों को मीडिया ‘दलित अत्याचार’ की अपनी परिभाषा में क्यों नहीं मानता?
उत्तर प्रदेश में डासना के मंदिर में पानी के लिए मुस्लिम लड़के की पिटाई की मीडिया की कहानी ध्वस्त हो चुकी है। इस घटना को जिस तरह उछाला गया, उससे लगता है कि ‘असहिष्णुता’ के अगले भाग की पटकथा पहले से लिखी हुई थी। मीडिया का बड़ा वर्ग इस योजना का हिस्सा था। टाइम्स आॅफ इंडिया ने एक आपत्तिजनक रिपोर्ट छापी कि डासना देवी मंदिर को मुसलमानों ने ही बनाया है और अब हिंदू उन्हें मंदिर में घुसने नहीं दे रहे। पूरी रिपोर्ट में इसके समर्थन में कोई साक्ष्य नहीं दिया गया। यह पानी पीने के लिए पिटाई का मामला नहीं था, यह सिद्ध हो चुका है। किंतु अखबार व चैनल आज भी अपनी उसी पुरानी कहानी पर टिके हुए हैं। आश्चर्य नहीं होना चाहिए यदि वे ऐसा करने के लिए कहीं ऊपर से निर्देशित हों।
राजस्थान में अनुसूचित जाति की बच्ची से सामूहिक बलात्कार की घटना सामने आई, उसी समय दिल्ली की सेकुलर मीडिया ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के एक बयान को लपक लिया। फटी जींस पहनने को नारी स्वतंत्रता का प्रतीक बना दिया गया। सारा हंगामा राजस्थान की बर्बर घटना को छिपाने के लिए किया गया, क्योंकि उस घटना में सभी आरोपी मजहब विशेष से हैं। राजस्थान में कुछ समय में ऐसी घटनाएं बार-बार हो रही हैं। लेकिन इन पर तथाकथित राष्ट्रीय चैनलों व अखबारों में चर्चा नहीं होती। कोरोना वायरस टीकाकरण पर कुछ समाचार संस्थान लगातार झूठ फैलाने में जुटे हैं। एनडीटीवी ने बताया कि राजस्थान में वैक्सीन की आपूर्ति नहीं हो रही है, जिससे इसकी कमी हो गई है। एनडीटीवी अभी तक यह स्वीकार नहीं कर पाया है कि भारत, चीन की सहायता के बिना भी कोरोना वायरस का मुकाबला कर सकता है। यह संयोग मात्र नहीं कि कोरोना वायरस पर उसके अधिकतर सत्य-असत्य समाचार चीन को लाभ पहुंचाने की मंशा से होते हैं।    ल्ल