ध्येयनिष्ठ जीवन के धनी

    दिनांक 14-अप्रैल-2021
Total Views |
डॉ. अशोक मोडक

सयाजीराव गायकवाड़ से भीमराव ने कहा था विदेश जाने का मेरा उद्देश्य दलित भाई बहनों का उत्थान करने के लिए आवश्यक अर्हता प्राप्त करना है। सन् 1952 में बाबासाहेब ने कहा कि सयाजीराव कोजो वचन दिया था, वह मैंने पूरा किया है। bb_1  H x W: 0

पिछले तीन दशकों में देश में मध्यमवर्गीय नागरिकों की संख्या लगभग पच्चीस करोड़ हो गई है और सन् 2015 तक यह संख्या पचास करोड़ से ज्यादा होगी, यह अनुमान एशियन डेवलपमेंट बैंक ने निकाला है। दुर्भाग्य से इसी कालावधि में उपभोगिता, स्वच्छंदता और संस्कृतिहीनता की विकृतियां हम सबको अस्वस्थ कर रही हैं। मध्यवर्गीय समाज इन विकृतियों का गुलाम हो रहा है। इस वातावरण में डॉ. आंबेडकर जी की ध्येयवादिता से भूले-भटके नागरिकों को रास्ते पर लाने का, उनकी घरवापसी का मार्गदर्शन होता है। आंबेडकर जी ने तो भारत के दलितों और पंडितों के उद्धार का ध्येय अपनी आंखों के सामने रखा था। उन्होंने अथक परिश्रम से अपने जीवन में इस ध्येय की पूर्ति भी की। यदि हम इसी आदर्श की निजी और सार्वजनिक व्यवहार में निरपेक्ष पूजा करेंगे तो खुद को भी कृतार्थ करेंगे तथा समाज को भी समृद्ध करेंगे।

वैश्वीकरण के कारण दुनिया के भिन्न-भिन्न देशों की हर तरह की चीजें अपने देश के छोटे गांव में भी विपुल मात्रा में उपलब्ध हैं। इन चीजों के उत्पादन और प्रभावी विज्ञापन करने में एक-दूसरे से स्पर्धा है। साधारण मध्यमवर्गीय समाज पड़ोसी को अपना वैभव दिखने की तमन्ना रखता है। किसी विचारक ने लिखा है- जो पड़ोसी मुझे अप्रिय है उसे प्रभावित करना यही मेरी तमन्ना है, और इसी उद्देश्य से वे चीजें खरीदना मेरी चाह है, जिनकी मेरे लिए जरूरत नहीं है। नतीजतन उपभोगप्रियता बेहद बढ़ रही है। यानी स्वच्छंदता भी असीम मात्रा में बढ़ रही है। कोई छात्र आईटीआई की परीक्षा में पास होने के बाद किसी फैक्ट्री में अप्रेन्टिस बनता है। उससे सुबह नौ से शाम छह बजे तक प्रामाणिक काम करने की अपेक्षा की जाती है। वह सुबह ग्यारह बजे कारखाने में आता है और दोपहर दो-तीन बजे घर वापस लौटता है। आश्चर्य इस बात का है कि जो चार घंटे वह कारखाने में बिताता है, तब भी अधिकांश समय कैंटीन में होता है। और ज्यादा आधा घंटा मशीन के इर्द-गिर्द गपशप लगाता है। और विस्मय की बात यह है कि दो साल का अप्रेन्टिसशिप समय समाप्त होने के पूर्व वह मैनेजर महोदय से कैरेक्टर सर्टिफिकेट देने की प्रार्थना करता है। विडंबना यह कि मैनेजर साहेब सर्टिफिकेट दे देते हैं।

संस्कृतिहीनता भ्रष्टाचार, महिलाओं पर बलात्कार और करुणाहीन, लज्जाहीन स्वैरता के रूप में प्रकट हो रही है। खाओ, पियो, ऐशोआराम, मौजमस्ती करो- यही मानव जीवनदृष्टि बनी है। डॉ. आंबेडकर जी के ध्येयवादी जीवन के बारे में चिंतन-मंथन करने से वर्तमान विकृतियों को मात देने का उचित मार्ग प्राप्त होता है। किसी ने लिखा है: उदात्त ध्येयपूर्ति के लिए जीवनभर स्वयंप्रेरणा से कठोर साधना करने वाले बाबासाहेब आंबेडकर इस परिस्थिति में शाश्वत मार्गदर्शन कर सकते हैं।

इस ध्येयसाधना के बीज बाबासाहेब के बाल्य जीवन में ही बोए गए हैं। विदेश यात्रा पर जाने से पहले, सन् 1893 में बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ से उनकी मुलाकात हुई। सयाजीरावजी ने भीमराव से पूछा: क्यों जाना चाहते हैं विदेश? भीमराव ने उत्तर दिया कि अमरीका और ब्रिटेन जाने का मेरा हेतु केवल उच्च शिक्षा प्राप्त करने तक सीमित नहीं है। जीवन में मेरे दलित भाई-बहनों का उत्थान करने के व्यापक हेतु की पूर्ति के लिए आवश्यक अर्हता प्राप्त करना ही विदेश जाने का मेरा उद्देश्य है। सन् 1952 में यानी अपनी मृत्यु से चार साल पूर्व बाबासाहेब ने बंबई में भाषण देते समय श्रोताओं को जानकारी दी कि सन् 1893 में मैंने सयाजीराव महाराज को जो वचन दिया था, उसे मैंने पर्याप्त मात्रा में पूरा किया है। एक हिन्दी पद की पंक्ति हमें कंठस्थ है ‘शपथ लेना तो सरल है, पर निभाना कठिन है।’ वचन देना तो सरल होता है, पर निभाना कठिन होता है। यह पंक्ति भी इस सन्दर्भ में उपयुक्त है।
बाबासाहेब मानो बीसवीं सदी के राजा हरिश्चंद्र थे। वचनपूर्ति करने के लिए उनको कितनी और कैसी यातनाओं से जूझना पड़ा, इसका हिसाब असंभव है।

उन दिनों दलित परिवारों की अवस्था पूर्णरूपेण क्लेशदायक थी। हर तरह की प्रतिकूलता थी। वीर सावरकर जी के शब्दों में हिन्दू समाज ने खुद के पैरों में सात शृंखलाएं जकड़कर बांधी थी। वेदाक्तबंदी, व्यवसायबंदी, स्पर्शबंदी, रोटीबंदी, बेटीबंदी, शुद्धिबंदी और सिंधुबंदी-यह थी सप्त शृंखलाएं। दलित बहनों और भाइयों को हर बेड़ी की भीषण यातनाएं  भुगतनी पड़ती थीं। भीमराम आंबेडकर ने नन्ही-मुन्नी उम्र में तो ये यातनाएं बर्दाश्त की ही, किन्तु सर्वोच्च शिक्षा पाकर, विदेश से लौटकर और महत्वपूर्ण पदों पर बैठकर भी इन यातनाओं से उन्हें मुक्ति नहीं मिली। हमेशा उपेक्षा और उपहास। लेकिन वे इन विपत्तियों से जूझते रहे।

महाभारत के कर्ण ने नियति को बताया था ‘स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पूज्यते।’ अर्थात् विद्वत्व हासिल करके मैं पूजनीय और सम्मानीय बनूंगा- यह संकुचित इच्छा- आकांक्षा नहीं थी। मेरा विद्वत्व दलितों के उत्थान के लिए उपकरण साबित होगा। मेरी पूजनीयता सवर्णों को इन्साफ और इनसानियत के रास्ते पर चलने की प्रेरणा देगी और फलत: जो दलित, इन्साफ और इनसानियत के धनी होंगे वे भी दलितोत्थान के यज्ञ में सहभागी होंगे, यह विश्वास आंबेडकरजी के हृदय में था।

आंबेडकरजी ने केवल छात्र अवस्था में नहीं, अपितु संपूर्ण जीवन कठोर अध्ययन किया, चिंतन और लेखन किया। उनका हरेक लेख हमें बताता है कि वहां तर्क शुद्ध विवेक है। पूर्वाग्रहों और आग्रहों से ऊपर उठकर सप्रमाण निष्कर्ष निकालने का दृढ़ निश्चय हर लेख और पुस्तक में प्रतिबिम्बित है। सन् 1943 में न्यायमूर्ति रानाडेजी की जन्मशती के अवसर पर आंबेडकर जी ने जो मार्मिक भाषण दिया, उसमें उन्होंने रानाडे, तिलक, गोखले आदि पूर्वजों के प्रति भावभीनी भक्ति व्यक्त की और वर्तमान में कितनी गिरावट आई है- यह व्यथा भी मुखरित की। वह पीढ़ी तो चली गई, जो सार्वजनिक कार्य करते समय निजी अध्ययन के पथ पर डटकर चलती थी। अध्ययन-चिंतन उनका स्थायी भाव था।

छात्र अवस्था में भीमराव जी न चित्रपट देख सके, न साइट सीइंग कर सके। न किसी के साथ फालतू गप-शप कर सके। वीर अर्जुन के एकाग्र चित्त की तरह भीमराव जी भी एकाग्र बुद्धि से, निष्ठा से अध्ययन कार्य में जुटे रहे। उनके लिए सामान्य जरूरतों की पूर्ति भी संभवनीय नहीं थी। उनको जो छात्रवृत्ति मिलती थी, उसी धनराशि में से पत्नी के लिए कुछ हिस्सा नियमित भेजना अपरिहार्य था। परिणामत: दिनभर में चाय या काफी का एक कप मिला तो भी पढ़ाई चालू रखते थे। रोज अट्ठारह- उन्नीस घंटे पढ़ाई में व्यतीत करना, भूखे पेट दिन गुजारना। यह साधना दो साल बाद फलद्रुप हुई, लेकिन अल्पतुष्ट होकर विश्राम लेना उन्हें नापसंद था। इसीलिए ‘नेशनल डिवाइन्ट आॅफ इंडिया’ इस नाम का रिसर्च प्रोजेक्ट कुछ महीनों में ही पूर्ण करके और उसे कोलंबिया विश्वविद्यालय में प्रस्तुत करके आंबेडकर ने नया साहस दिखाया। यही रिसर्च प्रोजेक्ट सन् 1924 में इसी नाम की पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ। भारत स्वतंत्र हुआ और इसी पुस्तक की नींव पर आजतक फाइनांस कमीशन गठित हुए हैं।

आंबेडकर इस साधना में अमरीका में डूबे थे। तब लाला लाजपतराय ने इस मेधावी छात्र को राजनीति में आने का निमंत्रण दिया। तो भारतमंत्री मांटेग्यू ने इस छात्र को बंबई आने का प्रस्ताव दिया। लेकिन आंबेडकर ने दोनों प्रस्ताव नामंजूर कर दिए। कोल्हापुर के राजा शाहू छत्रपति भी बड़ौदा के राजा सयाजीराव गायकवाड़ की तरह आंबेडकरजी को भरसक सहायता देने वाले शुभचिंतक थे। उनको लिखे हुए पत्र में आंबेडकरजी ने जानकारी दी कि व्यक्तिगत कीर्ति प्राप्त करने के बजाए अधिकाधिक ज्ञान ग्रहण करना ही मेरी तमन्ना है और इसी लिए अन्य दिशा में मार्गक्रमण मुझे मंजूर नहीं है। भारत लौटने के पश्चात सन् 1933 में एक सम्मान समारोह में भाषण करते समय डॉ.साहेब ने श्रोता समुदाय के समक्ष अपनी छात्रदशा का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया, ‘मैं विदेश में पढ़ाई कर रहा था लेकिन भारत के दलित बांधवों का स्मरण मुझे चुभता था, उनके कल्याण की दृष्टि मुझे बेचैन करती थी और पूरी ताकत तथा लगन से अध्ययन पूर्ण करने की प्रेरणा देती थी।’

सन् 1924 में बाबासाहेब भारत लौटे। उन्होंने जो वृत्तपत्र सम्पादित किए उनमें से हरेक का नाम अर्थपूर्ण था। ‘मूकनायक’, ‘बहिष्कृत भारत’, ‘समता’, और ‘जनता’। इस साधक का संकल्प था कि जनसेवा करने के लिए खुद का तन, मन और धन न्यौछावर करना चाहिए। इस संकल्पपूर्ति का प्रारंभ ‘मूकनायक’ वृत्तपत्र से हुआ, किन्तु सांगता समारोह जनता जनार्दन के चरणों में हुआ। भारत के दरिद्र नारायण ने आंबेडकरजी के रूप में अपने तारणहार के दर्शन किए। हजारों स्थानों पर आंबेडकरजी के सम्मान में समारोह संपन्न हुए। हर समारोह में आंबेडकरजी ने कृतज्ञता प्रकट की। बल्कि यह विनम्रता भी जताई कि मैं भगवान के हाथों का सामान्य उपकरण हूं, उसी की इच्छा साकार करने के लिए मैं कुछ ना कुछ कार्य कर रहा हूं। वर्तमान काल में जब उपभोगमयता बढ़ रही है, तब आंबेडकर ने पूजनीय समझकर जिस उपकरण भाव की निरंतर पूजा की, वह उपकरण भाव ही भूले-भटके युवक-युवतियों को ठीक रास्ते पर चलने की स्फूर्ति देगा।

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की जीवनयात्रा कई संस्कृत सुभाषितों को चरितार्थ करती है। ऐसा लगता है कि सुभाषित निर्माताओं ने इस ध्येयवादी साधक को आंखों के सामने रखकर ही यह विचारधन शब्दबद्ध किया है:
1 न ॠते श्रान्तस्य संख्याय देवा:
2 उद्यम साहस धैर्य बुद्धि शक्ति: पराक्रम॥
षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र देव सहायक:॥

उद्यमशीलता, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम ऐसे छह गुणों से सम्पन्न इनसान की ईश्वर सहायता करता है।
3 विद्यया विवादाय धनं मदाय। शक्ति: परेषां परपीडनाय।
खलस्य सार्धो विपरीतमेतत। ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय॥

(विद्या, धन और शक्ति ऐसे गुणों का उपयोग दुर्जनों द्वारा, विवाद छेड़ने के लिए, मदमत होने के लिए तथा औरों को तकलीफ देने के लिए होता है, जबकि सज्जन व्यक्ति इसी गुणसम्पदा को ज्ञान, दाम और रक्षण देता है।)
4 प्राब्धभुत्तभजना: न परित्यजन्ति।
(अत्युतम मनुष्य हाथ में लिया हुआ कार्य अधूरा नहीं छोड़ता।)

डॉ. आंबेडकर भारत की इस परम्परा को समृद्ध करके भारतरत्न हुए, यह निर्विवाद सत्य है। जो मनुष्य दुर्बल और अनाड़ी है, खुद की शक्ति खो बैठा है, फलत: यातनाएं भुगत रहा है, उसमें आत्मविश्वास जगाना, उसे खुद के पैरों पर खड़ा करना और भारत के स्वतंत्रता संग्राम को सर्वसमावेशक बनाकर नवभारत का निर्माण करना, यही उनके जीवन का उद्देश्य था। मैनचेस्टर गार्डियन के एक प्रतिनिधि सन् 1945 में भारत आए। उनका उद्देश्य महात्मा गांधी, मुहम्मद अली जिन्ना और डॉ़ आंबेडकर आदि नेताओं का साक्षात्कार लेना था। रात को नौ बजे वे गांधी जी से मिलने पहुंचे। गांधी जी सो रहे हैं। प्रतिनिधि महाशय तत्पश्चात मुहम्मद अली जिन्ना के निवास स्थान गए। उन्हें वहां जिन्ना के बारे में यही जानकारी मिली।

अंत में वे डॉ. बाबासाहेब के घर गए। उनको आश्चर्य हुआ, जब उन्होंने देखा कि बाबासाहेब अपने घर के अध्ययन रूम में चिंतन कर रहे हैं। गांधी जी और जिन्ना जी सो गए हैं, लेकिन आप तो नींद छोड़कर पढ़ाई कर रहे हैं- मैनचेस्टर गार्डियन के प्रतिनिधि ने बाबासाहेब से यही सवाल पूछा। बाबासाहेब का जवाब बहुत ही अर्थगर्भ था, अरे भाई, वो दोनों नेता जिनका नेतृत्व कर रहे हैं, वे समाज जाग्रत हैं। लेकिन मुझे जिनका नेतृत्व करना है, वह निंद्राधीन हैं। श्रीमद् भगवद्गीता में स्थितप्रज्ञ साधु का वर्णन किया हुआ है-यस्यां जाग्रति संयमी।

आंबेडकर ने दलित भाई-बहनों को उपदेश दिया, समाज जागरण करो। इस उद्देश्य की पूर्ति के मार्ग पर पड़ाव थे - अध्ययन, आंदोलन और संगठन। लेकिन शील-संपन्न जीवन बिताना यह अत्यावश्यक सत्कर्म था। बाबासाहेब महाराष्टÑ के एक छोटे-से देहात में दलित महिलाओं को संबोधित करने के लिए जा पहुंचे। अपने सारगर्भित भाषण में उन्होंने उपदेश दिया- ‘आप में से कोई बहन यदि वेश्या बनकर देहविक्रय करने लगे तो शायद वह ज्यादा अर्जित करेगी। दूसरी बहन उच्चवर्गीय इनसान के घर में बर्तन मांजने का, कपड़ों की धुलाई करने का काम करेगी। यह दूसरी बहन पहली की तुलना में दरिद्र रहेगी। लेकिन मेरी दृष्टि में यह दूसरी बहन ही सराहनीय, प्रशंसनीय रहेगी। शीलम परम् भूषणम्।’

डॉ. बाबासाहेब मानते थे कि भारत के सर्वसाधारण मनुष्य पर धर्म का प्रभाव है। इसी प्रभाव के कारण गरीब घर की महिला अमीरों के घर में जाकर मजदूर के नाते पसीना बहाती है, परंतु कभी चोरी नहीं करती। डॉ. साहेब की प्रिय परिभाषा थी धर्म का मतलब उदात्त जीवन मूल्यों को निजी और सार्वजनिक व्यवहार में अमल में लाना।
अपने दलित भाई-बहनों को केवल फलानी जाति-उपजाति के कल्याण का ही ख्याल करना चाहिए, व्यवहार करना चाहिए, इस आशय की क्षुद्रता बाबासाहेब को पूर्णत: नामंजूर थी। उनकी पत्रकारिता ‘मूकनायक’ वृत्तपत्र से शुरू हुई, और ‘जनता’ नामक पत्र से इस यात्रा की पूर्णता  हुई। जीवन भर संघर्ष करने वाले ये महापुरुष जीवन के अंतिम पर्व में प्रजा, शील और करुणा के मंत्रों का उच्चारण और आचरण करने वाले भगवान् गौतम बुद्ध की शरण में गए।

डॉ. आंबेडकर ने जिस ध्येयवाद के प्रकाश में अपना पूरा जीवन व्यतीत किया, वह भी बहुआयामी था। केवल किसी जाति विशेष या पंथ विशेष का ही भला हो, यह सोच गलत है। इस ध्येयवाद का पहला आयाम था सम्पूर्ण भारतवर्ष का, सम्पूर्ण मानवता का चिंतन करना। द्वेष, मत्सर, विद्रोह आदि वृत्ति-प्रवृत्तियां मनुष्य को गलत विषयों की ओर जाने की प्रेरणा देती हैं। अतएव प्रेम, बंधुता, विशालता आदि सत्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन देना चाहिए, यह इस ध्येयवाद का दूसरा आयाम है।

आंबेडकर जी का प्रिय मंत्र था बंधुता। वैयक्तिक तथा सार्वजनिक जीवन में नैतिकता की जड़ें गहराई तक जाएं, यह आंबेडकर के ध्येयवाद का तीसरा आयाम है। बाबासाहेब जब लंदन में पढ़ाई करते थे, तब फ्रांसिस्का फिटजेराल्ड नामक किसी आयरिश युवती के साथ उनका परिचय हुआ। लेकिन बाबासाहेब को इन बंधनों का ख्याल था कि मैं विवाहित हूं, मेरी पतिव्रता पत्नी भारत में नैष्ठिक जीवन बिता रही है और मुझे भी शीलसंपन्न जीवन बीतना चाहिए। फलस्वरूप फ्रांसिस्का फिटजेराल्ड के साथ जो परिचय वृद्धिगत हुआ, वह संयमित और निष्पाप रहा। चांगदेव खैरमोडे, जिनके साथ बाबासाहेब दिल खोलकर चर्चा, विमर्श करते थे, आंबेडकर के चरित्र लेखक हैं। खैरमोडे जी ने लिखा कि आंबेडकर जी और फ्रांसिस्का की मित्रता विशुद्ध थी, किसी तरह से विकारवश नहीं थी। आंबेडकर ने चांगदेव खैरमोडे को फ्रांसिस्का के बारे में जानकारी दी:-

वैयक्तिक जीवन में नैतिकता ही इस सन्दर्भ में हमारा उचित मार्गदर्शन करती है। भारतरत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी ने शाश्वत जीवनमूल्यों की हमेशा उपासना की इस कारण वे उदात्त, ध्येयनिष्ठ जीवन के धनी थे। उनका पुण्यस्मरण हम सबको निरन्तर सत्कर्म करने की प्रेरणा देगा। उनको विनम्र अभिवादन। 
(लेखक प्रख्यात चिंतक एवं मुंबई विश्वविद्यालय यूरेशियाई अध्ययन केंद्र में आमंत्रित प्राध्यापक)