स्मृति शेष : राधेश्याम खेमका : सनातन धर्म को समर्पित व्यक्तित्व

    दिनांक 15-अप्रैल-2021
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कल्याण के सम्पादक और गीता प्रेस ट्रस्ट बोर्ड के अध्यक्ष रहे राधेश्याम जी खेमका ने अपने कार्यकाल के दौरान अन्यान्य महापुराणों तथा कर्मकाण्ड के दुर्लभ ग्रन्थों के प्रामाणिक संस्करणों का सम्पादन कर उन्हें प्रकाशित कराया। ‘कल्याण’ में ज्वलंत मुद्दों पर उनके सारगर्भित विचारों से सभी परिचित हैं।वे 38 वर्षों तक कल्याण का गुरुतर दायित्व संभालते रहे। सनातन धर्म के प्रति समर्पित ऐसी महान आत्मा को विनम्र श्रद्धांजलि
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राधेश्याम खेमका (1935-2021)


श्री राधेश्यामजी खेमका मार्च 1983 से लगभग 38 वर्ष तक ‘कल्याण’ के प्रधान सम्पादक रहे। वे ‘कल्याण’ के सम्पादक ही नहीं, बल्कि गीता प्रेस ट्रस्ट बोर्ड के अध्यक्ष भी थे। उनकी जीवात्मा 3 अप्रैल, 2021 को काशी के केदार घाट पर परमात्मा में विलीन हो गई। उन्हें लगभग पंद्रह दिन पहले हृदयाघात हुआ था।

इसी केदार घाट पर उनके परम पूज्य स्वामी करपात्रीजी ने भी शरीर त्यागा था। स्वामीजी का उनके जीवन पर बहुत प्रभाव था। उन्होंने एक पुस्तक भी लिखी थी- करपात्री स्वामी: एक जीवन दर्शन। गीता प्रेस से खेमका जी को जोड़ने में करपात्री जी महाराज की बड़ी भूमिका थी।

‘कल्याण’ के संस्थापक सम्पादक थे श्री हनुमान प्रसादजी पोद्दार (1892-1971)। वे 1926 से 1971 तक लगभग 45 वर्ष इसके सम्पादक रहे।

खेमकाजी ने अपनी उक्त पुस्तक में लिखा था : ‘श्री हनुमान प्रसाद जी पोद्दार के देहांत के बाद कुछ दिनों के लिए गीता प्रेस के कार्यों में शिथिलता आने लगी थी, पुस्तकों का अभाव होने लगा था। बाजार में अधिक मूल्य में गीता प्रेस की पुस्तकें बिकने लगीं। एक दिन स्वामीजी महाराज ने मुझसे कहा-‘तुमसे कुछ आवश्यक बात करनी है।’ ... महाराजश्री ने कहा- ‘मैं सुनता हूं कि गीता प्रेस की स्थिति ठीक नहीं है। इस संस्था के द्वारा धर्म का बड़ा काम हुआ है, तुम्हें उधर ध्यान देना चाहिए। मैंने उत्तर में कहा, महाराज! मैं क्या ध्यान दे सकता हूं। वहां तो एक ट्रस्ट बना हुआ है, जो वहां के कार्य का संचालन करता है। मेरा तो कोई संपर्क है नहीं। इस पर महाराज ने कहा कि नहीं! तुम चाहो तो ध्यान दे सकते हो। तब से मेरे मन में गीता प्रेस के कार्यों में, लगाव में वृद्धि होने लगी।’ ऐसे कठिन समय में श्री राधेश्यामजी खेमका ने ‘कल्याण’और गीता प्रेस का उत्तरदायित्व संभाला। आज इस इन्टरनेट युग में भी कल्याण की हर माह दो लाख प्रतियां छपती हैं। कल्याण की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। डिजिटल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण ‘कल्याण’ ने अपना आॅनलाइन संस्करण भी प्रारम्भ कर दिया है। आज ‘कल्याण’ के विशेषांक और साधारण अंक कल्याण की वेबसाइट पर आॅनलाइन उपलब्ध हैं, ताकि देश और विदेश में ‘कल्याण’ की यात्रा अनवरत जारी रहे। ‘कल्याण’ मासिक के अंक ॅ्र३ंस्र१ी२२.ङ्म१ॅ अथवा ुङ्मङ्म‘.ॅ्र३ंस्र१ी२२.ङ्म१ॅ पर नि:शुल्क भी पढ़े जा सकते हैं।

खेमका जी ने अपने कार्यकाल के दौरान अन्यान्य महापुराणों तथा कर्मकाण्ड के दुर्लभ ग्रन्थों के प्रामाणिक संस्करणों का सम्पादन कर उन्हें प्रकाशित कराया। अब तो गीता प्रेस के प्रकाशन प्राय: सभी प्रांतीय भाषाओं में प्रकाशित हो रहे हैं जिनकी भारी मांग है। गीता प्रेस, गोरखपुर में अत्याधुनिक तकनीक की भव्य मशीनें लगाकर गत वर्षों में प्रेस की क्षमता और गुणवत्ता, दोनों में गुणात्मक सुधार किया गया है। ‘कल्याण’ में ज्वलंत मुद्दों पर उनके सारगर्भित विचारों से सभी परिचित हैं।

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ब्रह्मलीन परमपूज्य स्वामी करपात्री जी महाराज
कल्याण पत्रिका के एक विशेषांक का आवरण पृष्ठ

श्री राधेश्यामजी खेमका का जन्म 1935 में बिहार के मुंगेर जिले में एक संभ्रांत मारवाड़ी परिवार में हुआ था। आपके पिता श्री सीतारामजी खेमका सनातन धर्म के कट्टर अनुयायी तथा गोरक्षा आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर थे और माताजी एक धर्मपरायण गृहस्थ सती महिला थीं।

1956 से आपका परिवार स्थायी रूप से काशी में निवास करने लगा। काशी आने के बाद आपने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम.ए. (संस्कृत) किया और साहित्य रत्न की उपाधि भी प्राप्त की। कुछ समय आपने कानून की पढ़ाई भी की और कागज का व्यापार भी किया। आपके पिताजी की धार्मिक प्रवृत्ति और सक्रियता के कारण संतों का सत्संग और सानिध्य आपको सदैव मिलता ही था, परंतु काशी आने पर यह और सुगम हो गया। व्यवसाय के साथ-साथ आपका स्वाध्याय, सत्संग और संत समागम का व्यसन भी चलता रहा। आपका  संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेजी भाषाओं पर पूर्ण अधिकार था।

व्यवसाय के लिए उन्हें स्वामी करपात्रीजी की राय थी कि साधन रूप में व्यापार का आश्रय वैश्य ले सकता है, परंतु अर्थोपार्जन भोगविलास के लिए नहीं होना चाहिए।

बाद में व्यवसाय को पुत्र-पौत्रादि को सौंप कर अपने जीवन के अन्तिम 38 वर्षों तक खेमकाजी गीता प्रेस और कल्याण की अवैतनिक सेवा करते रहे। आप उस संस्था से कोई आर्थिक लाभ नहीं लेते थे। खेमकाजी ने काशी में 2002 में एक वेद विद्यालय की स्थापना की। इसमें आठ से बारह वर्ष आयु के बच्चों को छह वर्षीय पाठ्यक्रम में प्रवेश दिया जाता है। श्री जयदयालजी गोयन्दका (1885-1965) और श्री हनुमान प्रसादजी पोद्दार ने 1923 में गीता प्रेस की स्थापना की थी। यह संस्था अब वटवृक्ष का रूप ले चुकी है और अपने विशिष्ट सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए आज भी उत्तरोत्तर प्रगति के पथ पर अग्रसर होती जा रही है, तो इसका बहुत कुछ श्रेय पिछले 38 वर्षों से कल्याण के प्रधान सम्पादक का गुरुतर दायित्व निभाने वाले श्री राधेश्यामजी खेमका को जाता है।
    -प्रो. संतोष तिवारी