झूठ पर हाय-तौबा, सच पर चुप्पी

    दिनांक 15-अप्रैल-2021
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मीडिया का बड़ा वर्ग झूठे समाचारों को जोर-शोर से दिखाता है, लेकिन वास्तविक समाचारों पर चुप्पी साध लेता है
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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने मुस्लिम मतदाताओं से एकजुट होने की अपील की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा, ‘भाजपा के किसी नेता ने बोला होता कि हिंदुओं एक हो जाओ तो चुनाव आयोग कई नोटिस भेज देता। समाचारपत्रों में संपादकीय लिखे जाते व चैनलों पर परिचर्चाएं आयोजित हो रही होतीं।’ देश की व्यवस्थाओं पर यह सटीक टिप्पणी है। चुनाव आयोग ने तो दो दिन सोच-विचार कर ममता को नोटिस भेज दिया, पर उनके सांप्रदायिक प्रलापों पर मीडिया अब तक चुप है। वे अपनी रैलियों में प्रधानमंत्री के लिए अपशब्द बोलती हैं, भाजपा समर्थकों को बाद में देख लेने की धमकी देती हैं, पर मीडिया कान बंद कर लेता है। बंगाल चुनाव में कांग्रेस, वामपंथी व तृणमूल भले ही एकजुट नहीं हो पाए, किंतु मीडिया का सेकुलर वर्ग एकजुट है। वे भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा तृणमूल नेताओं पर हमलों की झूठे समाचार भी उड़ा रहे हैं, पर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष के काफिले पर हमले का समाचार अधिकांश चैनलों ने 1-2 मिनट में ही हटा दिया।

दूसरे चरण में असम में एक भाजपा नेता की गाड़ी से ईवीएम मिलने का समाचार मीडिया ने जोर-शोर से फैलाया। बाद में पता चला कि वैसा कुछ भी नहीं था, जैसे दावे किए गए। उसी मीडिया ने हावड़ा में तृणमूल कांग्रेस के नेता के घर ईवीएम मिलने के समाचार को लगभग दबा दिया। ममता बनर्जी की पार्टी के अघोषित प्रचारक की भूमिका निभा रहे इंडिया टुडे चैनल ने इस समाचार को भाजपा के राजनीतिक आरोप की तरह दिखाया। इसी प्रकार, छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले के बाद भी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का बंगाल में चुनाव प्रचार में व्यस्त रहना भाजपा का आरोप बताकर छापा गया। यदि ऐसी घटना किसी भाजपा शासित राज्य में होती तो मीडिया का रवैया देखने योग्य होता। वैसे भी नक्सलियों के लिए मीडिया के बड़े वर्ग की सहानुभूति किसी से छिपी नहीं है। तमाम बड़े मीडिया संस्थान आज भी नक्सली सरगना वरवर राव को ‘कवि’ व कोबाड गांधी को ‘विचारक एवं नागरिक अधिकार कार्यकर्ता’ लिखते हैं। इसमें अतिशयोक्ति नहीं कि दिल्ली की मीडिया का बड़ा वर्ग नक्सली नेटवर्क का अंग है।

हाल में दिल्ली में दंगे भड़काने के लिए झूठा समाचार फैलाने वाले दागी पत्रकार राजदीप सरदेसाई को उनके कृत्य के बदले में पुरस्कृत किया गया। हर वर्ष टेलीविजन पुरस्कारों के नाम पर समाचार चैनल बड़ी संख्या में पुरस्कार खरीदते हैं। जिस तरह पुरस्कारों की बंदरबांट होती है, उसे खरीदना ही कहा जाएगा। इंडिया टुडे समूह ने सरदेसाई के लिए चार पुरस्कार खरीदे। इनमें सर्वश्रेष्ठ पत्रकार श्रेणी भी शामिल है। यह वैसे ही है, जैसे राफेल व जज लोया पर झूठ फैलाने के बाद रवीश कुमार नामक विवादित पत्रकार को एनडीटीवी प्रबंधन ने अपने अंतरराष्ट्रीय संपर्कों की सहायता से मैगसेसे पुरस्कार दिलवा दिया था। इंडिया टुडे हो या एनडीटीवी, भूल जाते हैं कि सोशल मीडिया के युग में लोग अब उनकी व उनके एजेंडाबाज पत्रकारों की पूरी कुंडली अपने पास रखते हैं। वे पुरस्कारों के झांसे में नहीं आते।

हरिद्वार कुंभ सेकुलर मीडिया की आंखों की किरकिरी बना हुआ है। टाइम्स आॅफ इंडिया ने कोरोना वायरस संक्रमण में तेजी के समाचार के साथ कुंभ स्नान का चित्र छापा, जबकि इन दोनों के बीच कोई संबंध नहीं। कुंभ में बिना मेडिकल परीक्षण के जाने की अनुमति नहीं है। वहां पर टीकाकरण और जांच कार्य भी चल रहा है। कोरोना के समाचारों के साथ टाइम्स आॅफ इंडिया ने क्रॉस लेकर प्रार्थना करती एक महिला का चित्र छापा। कैप्शन से लगता है कि ईसा मसीह ही इस महामारी से बचा सकते हैं। इंडिया टुडे आजतक, एबीपी न्यूज और बीबीसी जैसे मीडिया संस्थानों ने फेक न्यूज चलाया कि कुंभ ‘कोरोना का सुपरस्प्रेडर’ बन गया है। जिस प्रेस वार्ता के हवाले से यह दावा किया गया, उसमें ऐसी कोई बात नहीं हुई थी। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने बयान जारी कर इस झूठ का खंडन किया। वह समय गया जब किसी चैनल या अखबार को अपनी कोई रिपोर्ट झूठ निकलने पर लज्जा आती थी। इंडिया टुडे ने इस आपराधिक व हिंदू विरोध में गढ़े गए फेक न्यूज पर खेद जताने की औपचारिकता भी पूरी नहीं की। वहीं, उत्तर प्रदेश के एक अपराधी को पंजाब से लाने की घटना को चैनलों ने ‘राष्ट्रीय उत्सव’ की तरह दिखाया। जिस प्रकार समाज के कुछ लोग खलनायकों में नायक ढूंढते हैं, उसी तरह मीडिया भी माफिया व गुंडे किस्म के लोगों का महिमामंडन अलग-अलग प्रकार से करता रहता है।