वेदों ने दिखाया कृषि को मार्ग

    दिनांक 16-अप्रैल-2021
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प्रो. भगवती प्रकाश
वेदों में वैदिक और उत्तर वैदिक काल में कृषि, इसके तौर-तरीकों और कृषि में प्रयुक्त होने वाले औजारों का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में कृषि कैसे की जाए, इसका निर्देश दिया गया है
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वैदिक युग में हल विशाल एवं उन्नत थे और खेत जोतने के लिए यह प्रमुख साधन था।

वैदिक काल से ही भारत में कृषि बहुत उन्नत थी। यहां सभी प्रकार के खाद्यान्न, दलहन, तिलहन, फलों व शाक-सब्जियों की प्रचुरता रही है। यजुर्वेद में इस प्रचुरता व फसलों की उच्च गुणवत्ता का व्यापक विवेचन मिलता है। जैसे- ब्रीहश्च मे यवाश्च मे माषाश्च में तिलाश्च मे मुद्गाश्च मे
खल्लवाश्च मे प्रियङ्गवश्च मेऽणवश्च
मे श्यामाकाश्च मे नीवारांश्च मे
गोधूमाष्च मे मसूरांश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्।
(यजुर्वेद अध्याय-18, मंत्र-12)

अर्थात् मेरे चावल, मेरे साठी के धान, मेरे जौ, अरहर, मेरे उड़द व मटर, मेरे तिल और नारियल, मेरे मूंग और चने, मेरी कंगुनी और मेरे सूक्ष्म चावल और सामा, मेरा मडुआ, पटेरा, चेना आदि छोटे अन्न, मेरे पसाई के चावल, जो कि बिना बोए उत्पन्न होते हैं, और मेरे गेहूं और मसूर सहित अन्य अन्न, फल व शाक सब संवर्धित हों और प्रचुरता में उपजें।
अथर्ववेद में भी जौ, धान, दाल और तिल आदि विविध फसलों की प्रचुरता एवं गुणवत्ता के उल्लेख हैं। जैसे-
व्रीहिमतं यव मत्त मथो माषमथों विलम्।
एष वां भागो निहितो रन्नधेयाय दन्तौ माहिसिष्टं पितरं मातरंच।।
सभी प्रकार की कृषि उपजों की प्रचुरता के कारण ही ‘भारत’ शब्द का निर्वचन या उत्पत्ति विश्व के भरण-पोषण में समर्थ राष्ट्र के रूप में की गई है। मत्स्य आदि कई पुराणों, निरुक्त व आगम शास्त्रों में भारत शब्द का यह निर्वचन प्रचुरता में मिलता है। यथा-
भरणात् प्रजानाच्चैव मनुर्भरत उच्यते।
निरुक्त यवचनैश्चैव वर्ष तद् भारत स्मृतम्।। (मत्स्य पुराण)
भरणात् प्रजानां सर्वेमहीयां शुश्रुषणं तदैव भारत अस उच्यते।। (निरुक्त)
इन श्लोकों का आशय है कि संपूर्ण विश्व का भरण-पोषण करने में समर्थ होने के कारण यह भारत कहलाता है।

कृषि में अतुल सामर्थ्य
आज भी भारत यथेष्ट उत्पादन कर विश्व की दो तिहाई आबादी को खाद्य आपूर्ति कर सकता है। यहां विश्व की सर्वाधिक 18.9 करोड़ हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि है। यह विश्व का दूसरा सर्वाधिक सिंचित क्षेत्रफल वाला देश भी है। हर साल देश का 20 करोड़ हेक्टेयर मीटर जल बहकर समुद्र में चला जाता है। इसका यथोचित उपयोग करके हम सिंचित क्षेत्र को 6.67 करोड़ हेक्टेयर के वर्तमान स्तर से 16 करोड़ हेक्टेयर तक बढ़ा सकते हैं। ऐसा करके देश न केवल विश्व की शीर्ष खाद्य शक्ति बन सकता है, बल्कि विश्व की दो तिहाई यानी 500 करोड़ की आबादी को खाद्य आपूर्ति भी कर सकता है। अभी देश में असिंचित भूमि में खाद्यान्न उत्पादकता 750 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तथा सिंचित क्षेत्र में 3 टन प्रति हेक्टेयर है। वहीं, जैविक खाद-प्रधान देश नीदरलैंड में खाद्यान्न उत्पादकता 9 टन प्रति हेक्टेयर है। देश में उपलब्ध जलराशि से सिंचाई क्षमता को बढ़ा कर कुल 16 करोड़ हेक्टेयर कर लेने पर देश के कृषि उत्पादन को सवा दो गुना बढ़ाया जा सकता है, जबकि नीदरलैंड  की तरह जैविक खाद व उन्नत कृषि पद्धतियों का समावेश कर इसे 6 गुना किया जा सकता है।

इसी तरह, कृषि आय, कृषि क्षेत्र में सकल घरेलू उत्पाद बढ़ाकर देश की सकल वार्षिक आर्थिक वृद्धि दर में तेजी लाने के साथ बढ़े हुए कृषि निर्यात से विदेश व्यापार घाटे को भी समाप्त कर सकते हैं। कृषि पर निर्भर देश की आधी से भी अधिक आबादी की आय बढ़ने पर होने वाली अतिरिक्त खरीदारी एवं मांग-वृद्धि से देश की औद्योगिक उत्पादन वृद्धि दर भी सहजता से 2 से 3 गुना हो जाएगी। अभी देश में 3-5 करोड़ टन अतिरिक्त खाद्यान्न भंडार हैं। 75 लाख टन आलू आधिक्य है। 

वैदिक कृषि की समुन्नत विधियां: वैदिक काल में पहले खेत को जोत कर बीज बोने लायक बनाया जाता था, फिर उसमें बीज बोया जाता था। इस प्रक्रिया को वपन कहा जाता था। यथा-भूमिरावपतं महत (यजुर्वेद 23/46) अर्थात् भूमि को अच्छे से जोत कर बीज बोना चाहिए। बुआई के समय बीज के साथ गोबर की खाद डाली जाती थी, जिसे करीष कहा जाता था- सजग्माना अबिश्युषीरसिमन् गोष्ठेन करीषिणी:। वैदिक युग में हल विशाल एवं उन्नत होते थे और खेत जोतने के लिए यह प्रमुख साधन था। ऋग्वेद में भी जुताई का निदेश है-

एवं वृकेणष्विना वपन्तेषं दुहंता मनुषाय दस्त्रा।
अभिदस्युं वकुरेणा धमन्तोरू ज्योतिश्चक्रथुरार्याय।।
अथर्ववेद में 6 बैलों, 8 बैलों व 12 बैलों वाले हल का उल्लेख है- इयं यवमष्टायोगै: षडयोगेभिरचरकृर्षु:। इसके अलावा वेद में विविध प्रकार के हलों को सीर, सील, लांगन आदि भिन्न-भिन्न नामों से भी जाना जाता था। पकड़ने वाली मूठ को वेद में ‘त्सरु’ कहा गया है- लांगलम् पवीरवत् सुशीमं सोमसत्सरु। किसान या कृषक के लिए वेदों में कीनाश और सीरपति आदि कई शब्द हैं। ‘कीनाश’ से ही किसान शब्द बना है। यथा- शुनं सुफाला विकृषन्त भूमिं शुनं कीनाशा अभियन्तु वाहै:।

वेदों में उन्नत कृषि शब्दावली: हल का सुंदर फाल भूमि की जुताई करने में सहायक होता था। फाल के लिए ऋग्वेद में ‘स्तेग’ शब्द प्रयुक्त हुआ है, जो भूमि में प्रविष्ट होकर खुदाई करता है- स्तेगो न क्षामत्येति पृथ्वी। हल द्वारा जुती हुई भूमि में जो रेखाएं बनती हैं, उसे ‘सीता’ कहा जाता था। यथा- इंद्र: सीतां निगृहणातु तां पूशाभिरक्षतु। इंद्र हल की रेखा को पकड़े जुते हुए खेत को वर्षा से अच्छी तरह सिंचाई करें, पूषा (देवता) उसकी रक्षा करें व हल की रेखा रसयुक्त होकर हमें आने वाले समय में अन्न रस प्रदान करे। वेदों में कर्षण अर्थात् जोतना अत्यंत महत्वपूर्ण था। भूमि को मृदु व बोने योग्य बनाने के लिए अनेक बार जुताई आवश्यक थी। जुताई से तैयार भूमि में ही बीज बोने के निर्देश हैं। वेदों में उत्तम खेती के लिए भूमि को विस्तृत रीति से तैयार करना आवश्यक बताया गया है। यथा-युनक्त सीरा वि युगातनोत कृतेयौनौ वपतेह बीजम्। प्रमाणित शब्दावली की दृष्टि से यजुर्वेद में कर्षण क्रिया से उत्पन्न अन्न के लिए ही ‘कृष्टपच्या’ शब्द का प्रयोग हुआ है। बिना जुताई उपजाए गए अन्न के लिए ‘अकृष्टपच्या’ शब्द का उल्लेख मिलता है- कृष्टपच्या मे अर्कृष्टपच्याश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्। वपन (बोने) के बाद खेत को सींचना आवश्यक था। सींचने में भी अथर्ववेद में घृत व शहद से भूमि को सम्पोषण का वर्णन मिलता है- सा न: सीते प्यसाभ्याववृत्सवोर्जस्वती घृतवत पिन्वतमाना। अर्थात् घी और शहद के द्वारा विहित रीति से सम्पोषित भूमि हमें उत्तम रस युक्त फसल से पूर्ण करे। अथर्ववेद में भी गौमय या गोबर व पंचगव्य की खाद के प्रचुर संदर्भ हैं। अधिक अन्न पैदा करने के लिए लोग खाद का भी उपयोग करते थे-

संजग्माना अबिभ्युषीरस्मिन् गोष्ठं करिषिणी।
बिभ्रंती सोभ्यं मध्वनमीवा उपेतन।।
कृषि विज्ञान व शरीर विज्ञान पर संयुक्त उन्नत चिंतन: वैदिक कृषि में केवल कृषि उत्पादन पर ही चिंतन नहीं होकर फसलों का स्वास्थ्य सुरक्षा में कैसे अधिकतम योगदान हो, इसका भी चिंतन है। अन्नादि कृषि उपजों की मृदुता, कृषि उपज उन्नत व पोषक हो, इसके अनेक मंत्रों में यजुर्वेद का मंत्र 4.10 और सातवलेकर जी का भाष्य यहां विचारणीय है-

ऊर्गस्याङ्गिरस्यूर्णम्रदाऽऊर्जं मयिं धेहि। सोमंस्य नीविरंसि विष्णो: शर्मांसि शर्म यजंमानस्येन्द्रंस्य योनिंरसि सुऽसस्या: कूषीस्कृंधि। उच्छ्रंयस्व वनस्पतऽऊर्ध्वाे मां पाह्यक्हंसऽआस्य यज्ञस्योदृच:।। (यजुर्वेद 4.10)
भावार्थ: ‘ऊर्ज’ का अर्थ ऊर्जा पूर्ण रस, जल, अन्न, शक्ति है। ‘आंगिरसी ऊर्क’ का अर्थ है ‘जो रस शरीर के अंग-प्रत्यंगों में है, उसका वीर्य और बल बढ़ाने वाला रस या अन्न।’ शरीर में बल बढ़े यह मनुष्य चाहता है, परंतु यह बल योग्य अन्न, रस के सेवन से बढ़ता है, यह भी मनुष्य को मन में धारण करना चाहिए। खाने के लिए ऐसा अन्न तैयार करना चाहिए जो मृदु हो, शुष्क व रसहीन न हो। सातवलेकर जी इसकी व्याख्या में लिखते हैं- उत्तम फल जिससे उत्पन्न होते हों, ऐसी कृषि करें। सस्य धान्य व फल का वाचक शब्द है। इसलिए ऐसी कृषि करें, जिससे उत्तम धान्य प्राप्त हों व उत्तम फल मिलें। यह इसलिए कि फलों के रस के सेवन से भी इंद्रशक्ति का विकास होता है। अत: 18 फल पूर्ण विकसित मिलें, ऐसी खेती करनी चाहिए। धान्य के विषय में भी यही बातें कही गई हैं। उत्तम कृषि से उत्तम फल मिलें, उनके रस के सेवन से अपने अंदर इंद्र की और व्यापक परमेश्वर के सुखदायक रस से हम हृष्ट-पुष्ट और निरोग रहें, इत्यादि पूर्व मंत्र भागों से संबंध यहां देखना चाहिए।

सातवलेकर जी इसकी स्पष्ट व्याख्या करते हैं कि वनस्पतियां ऊपर अच्छी तरह बढ़ें, उत्तम रसदार हों, उनके सेवन से पूर्वोक्त मंत्रों में कहे सामर्थ्य हमें प्राप्त हों और हमारा पाप से बचाव हो। इस यज्ञ की समाप्ति तक हमारा पाप से बचाव हो। एक यज्ञ होने के बाद दूसरा यज्ञ शुरू होता है व मनुष्य पूर्ण आयु भी एक शतसांवत्सरीक यज्ञ है। इस तरह विचार करने से पता लगेगा कि हमारी पाप से रक्षा सदैव होनी चाहिए। यही इस प्रार्थना का मुख्य उद्देश्य है। ऐसी ही प्रार्थनाएं स्थान-स्थान पर हैं।

वेदों में औपचारिक कृषि शिक्षण का संदर्भ: वेदों में अनेक मंत्र स्पष्ट संकेत करते हैं कि उस काल में कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के अध्यापन-अध्ययन का चलन रहा होगा। स्थान सीमावश यहां एक ही श्लोक दिया जा रहा है-
शुनांसीराविमां वाचं जुषेथां यद्दिवि चक्रथु: पय:। तेनेमामुपं सिञ्चतम्।। (ऋग्वेद 4.57.5)
अर्थात् खेती करने वाले जन पहले खेती करने की विद्या को ग्रहण करके बाद में यथायोग्य खेती कर धन और धान्य से सदा युक्त हों।।। 5।।
ऋग्वेद विश्व की प्राचीनतम पुस्तक है। इसमें कृषि विज्ञान व प्रौद्योगिकी के प्रचुर संदर्भ हैं। ऋग्वेद का चतुर्थ मंडल विशेष रूप से पठनीय है- शुनं वाहा: शुनं नर: शुनं कृषतु लांगलम्।
शनुं वरत्रा बध्यंतां शुनमष्ट्रामुदिंगय।। (ऋग्वेद 4.57.4)

अर्थात् खेती करने वाले उत्तम जन उत्कृष्ट हल आदि यंत्रों, उपकरणों अन्य सामग्रियों, बलशाली बैलों और सुपरिष्कृत बीजों से स्मयक जुताईपूर्वक उत्तम पोषक अन्न व सभी प्रकार की फसलों को उत्पन्न करें।

शुनं न: फाला वि कृषन्तु भूमिं। शुनं कीनाशा अभि यन्तु वाहै:।।
शुनं पर्जन्यो मधुना पयोभि:। शुनासीरा शुनमस्मासु धत्तम्।। (ऋग्वेद 4.57.8)
अर्थ- जैसे लोहे के फाल तथा भूमि खोदने के लिए तैयार वस्तुओं, बैलों आदि के द्वारा हम लोगों के लिए सुखपूर्वक भूमि को खोदें, कृषि कार्य करने वाले सुख को प्राप्त हों, मेघ-मधुर आदि गुण और जलों से सुख वर्षाएं, वैसे सुख देने वाले स्वामी व भृत्य कृषि कर्म करने वाले तुम दोनों हम लोगों में सुख को धारण करो।
महाभारत में कृषि व कृषकों की सम्यक चिंता: महाभारत में नारद युधिष्ठिर संवाद के 127 प्रश्नों में कृषि का पर्याप्त संदर्भ है। यहां युधिष्ठिर के उत्तरों का उल्लेख करना संभव नहीं है। नारद के कृषि पर प्रश्न निम्नानुसार थे-     क्या तुम्हारे राज्य के किसान संतुष्ट हैं? क्या तुम्हारे राज्य के सभी भागों में जल से भरे हुए बड़े-बड़े तालाब बनवाए गए हैं? केवल वर्षा के पानी के भरोसे ही तो खेती नहीं होती है? तुम्हारे राज्य के किसान का अन्न या बीज तो नष्ट नहीं होता? क्या तुम प्रत्येक किसान पर अनुग्रह करके उसे सस्ता एवं ब्याज रहित ऋण देते हो? तुम्हारे राष्ट्र में अच्छे पुरुषों द्वारा वार्ता- कृषि, गोरक्षा तथा व्यापार का काम अच्छी तरह किया जाता है न? उपर्युक्त वातार्वृत्ति पर अवलंबित लोग ही सुखपूर्वक उन्नति करते हैं। नरदेव! क्या तुम ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र- इन तीनों वर्णों की प्रजा के प्रति अपने पिता-पितामहों द्वारा व्यवहार में लाई हुई धर्मार्थयुक्त उत्तम एवं उदार वृत्ति का व्यवहार करते हो?
कृषि आज भी हमारे समावेशी आर्थिक विकास का आधार है। देश की आधी जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। भारत में 127 कृषि जलवायु प्रखंड हैं। औद्योगिक उत्पादों की मांग भी बड़ी मात्रा में किसान की क्रय क्षमता से प्रभावित होती है। इसलिए हमारी आर्थिक प्रगति बड़ी सीमा तक कृषि पर आश्रित है।
(लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति हैं)