रामनवमी (21 अप्रैल) पर विशेष : जन जन के हैं राम

    दिनांक 21-अप्रैल-2021
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पूनम नेगी

श्रीराम ने लोकमंगल के लिए ही वनवास का रास्ता चुना था। इस दौरान उन्होंने उपेक्षित और वंचित वर्ग के लोगों को गले लगाकर संदेश दिया कि समाज में सब समान हैं। इस कारण सामाजिक समरसता पनपी और पूरा भारत सशक्त बना
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निषादराज को गले लगाते श्रीराम 

भगवान श्रीराम भारत के जन-जन के मन में बसे हुए हैं। उनका पतित पावन नाम जन्म से मृत्यु तक हर सनातनधर्मी के जीवन से गहराई से जुड़ा है। राजकुमार राम से मर्यादापुरुषोत्तम बनकर उभरने की यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव उनका वनवास काल माना जाता है। 14 वर्ष के इस वनवास काल में श्रीराम के जीवन में बहुत कुछ ऐसा घटा जिसने उनके जीवन को पूरी तरह बदल दिया और वे अयोध्या के राजकुमार राम से लोकनायक राम में रूपांतरित हो गए। इस वन पथ में श्रीराम ने उत्तर से दक्षिण तक संपूर्ण भारत को एक सूत्र में बांधा। इस वन पथ में वे अपने चरित्र द्वारा एक अनोखे सेतु का निर्माण कर सारे समाज को जोड़ते दिखाई देते हैं। इसीलिए भारतीय संतों व चिंतकों का विश्वास है कि जब सारे सेतु (उपाय) टूट जाएंगे तो भी राम का सेतु सारे समाज को मिलाने के लिए सदा सर्वदा प्रस्तुत रहेगा।

भगवान राम को दैवीय शक्ति प्राप्त थी। वे चाहते तो एक इशारे में कुछ भी कर सकते थे। लेकिन नहीं; उन्होंने हर काम एक आम व्यक्ति की भांति किया जिससे लोग उनसे सीख ले सकें। तत्कालीन समाज वर्णभेद का अभिशाप भोग रहा था। वंचित वर्ग के लोगों के साथ उच्च वर्ग वालों के दुराभाव के कारण समाज के लोगों के आचरण में प्रेम, सेवा व सहयोग का अभाव था किंतु गंगा पार कर वन पथ पर बढ़ते समय वे निषादराज को हृदय से लगा लेते हैं। मकसद था सामाजिक समानता का लोकशिक्षण। 14 वर्ष के वनवास में उन्होंने अनेक ऋषि-मुनियों से शिक्षा और विद्या ग्रहण की, तपस्या की और अन्यायकारी ताकतों का दमन कर ऋषि-मुनियों और पीड़ित वनवासियों को भयमुक्त किया। एक सच्चे लोकनायक के रूप में वन प्रांत के कमजोर, गरीब और सर्वहारा वर्ग को संगठित कर उस युग की बड़ी-बड़ी आततायी ताकतों को छिन्न-भिन्न कर समाज के समक्ष एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया।

 उनके वन पथ में पग-पग पर मर्यादा, त्याग, प्रेम और अद्भुत लोक व्यवहार के दर्शन होते हैं। उनका पवित्र चरित्र लोकतंत्र का प्रहरी, उत्प्रेरक और निर्माता प्रतीत होता है। अपने सुदीर्घ वन प्रवास में वे तपस्वी ऋषि-मुनि हों या सामान्य वनवासी, नर हों या वानर; सभी से करीबी रिश्ता जोड़ लेते हैं। अपार शक्ति के बावजूद राम संयमित हैं। सारा पराक्रम स्वयं का है लेकिन सारा श्रेय वे वन के महान ऋषियों के आशीर्वाद, भक्त शिरोमणि हनुमान, मित्र वानरराज सुग्रीव और उनकी वानर सेना, शरणागत विभीषण व अनुज लक्ष्मण को देते हैं। क्षमाशील इतने हैं कि राक्षसों को भी सहज ही मुक्ति दे देते हैं। वे राज परिवार से थे। चाहते तो केवट, निषादराज या शबरी को बिना गले लगाए भी अपना वनवास गुजार सकते थे, लेकिन उन्होंने इन्हें गले लगाकर लोगों में समानता का विश्वास जगाया। 

यूं तो गुरु रूप में श्रीराम के जीवन को रूपायित करने वाली विभूतियों में ऋषि वशिष्ठ व विश्वामित्र का नाम प्रमुखता से लिया जाता है, ंिकंतु वनवास के दौरान उनकी भेंट भारद्वाज, अत्रि व अगत्स्य जैसे अनेक महातपस्वी ऋषियों से हुई जिनके परामर्श, आशीर्वाद व अनुदान-वरदान उनके वन पथ की यात्रा में बेहद उपयोगी साबित हुए। ‘मानस’ और वाल्मीकि रामायण में उल्लेख है कि श्रीराम का 14 वर्ष के वनवास का पहला ठहराव प्रयागराज स्थित भारद्वाज आश्रम था। इस आश्रम में एक रात गुजारने के पश्चात् महर्षि भरद्वाज से आशीर्वाद प्राप्त कर श्रीराम, सीता और लक्ष्मण ने गंगा-यमुना-सरस्वती की त्रिवेणी में स्नान कर चित्रकूट के लिए प्रस्थान किया था। मान्यता है कि प्रयागराज को महर्षि भारद्वाज ने ही बसाया था, इसीलिए उन्हें प्रयागराज का प्रथम वासी माना जाता है। चित्रकूट के पास ही सतना (मध्य प्रदेश) के तपोवन में अत्रि ऋषि का आश्रम था। ऋग्वेद के पंचम मंडल के द्रष्टा अत्रि ऋषि की पत्नी अनसूया दक्ष प्रजापति की 24 कन्याओं में से एक थी। सीता जी को पतिव्रत धर्म की शक्ति का बोध महासती अनुसूइया से ही हुआ था। अपने तपोबल से त्रिदेवों को बालक बना देने वाली सती अनसूया को उनके वरदान से महायोगी ‘दत्तात्रेय’  महामुनि ‘दुर्वासा’ और चन्द्रमा पुत्र रूप में प्राप्त हुए थे। कहा जाता है कि चित्रकूट में ‘मंदाकिनी’ का अवतरण देवी अनसूया के ही आह्वान पर हुआ था। अत्रि ऋषि के कहने पर श्रीराम ने उस क्षेत्र के राक्षसों  का अंत कर तपस्वियों व वनवासियों को भयमुक्त कर अपने वनवास के 11 साल उसी चित्रकूट में ही बिताए थे। तत्पश्चात् सुतीक्षण मुनि के कहने पर वे महामुनि अगस्त्य का आशीर्वाद लेने उनके आश्रम नाशिक पहुंचे।

वाल्मीकि रामायण में उल्लेख है कि महर्षि अगस्त्य ने सबसे पहले विंध्याचल को पारकर दक्षिण दिशा का द्वार ऋषियों के लिए खोला था। महर्षि अगस्त्य ने अपने आश्रम में राम का अभिनंदन किया और निकट भविष्य में उनके लंकापति रावण से होने वाले धर्मयुद्ध के लिए अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्र, अमोघ कवच और रामसेतु निर्माण हेतु जल विखंडन की विधि उन्हें प्रदान की। ‘कम्ब रामायण’ में कहा गया है कि राम-रावण के युद्ध के पहले ऋषि अगत्स्य ने श्रीराम के पास आकर उन्हें भगवान सूर्य की उपासना का ‘आदित्य हृदय स्तोत्र’ दिया था। वाल्मीकि रामायण अनुसार राम-रावण के युद्ध में जब रावण का वध नहीं हो पा रहा था तो इंद्र का सारथी माताली श्रीराम को उस बाण की याद दिलाता है जिसे अगत्स्य ऋषि ने श्रीराम को दिया था। उसी बाण का संधान कर श्रीराम रावण का संहार करते हैं। 

ऋषि अगस्त्य ने ही राक्षसों के सफाए के मकसद से राम को दंडकारण्य जाने की सलाह दी थी। आज भी यहां के नदियों, पहाड़ों, सरोवरों एवं गुफाओं में राम के रहने के सबूतों की भरमार है। वर्तमान में यह क्षेत्र दंतेवाड़ा के नाम से जाना जाता है जो नक्सलवाद की चपेट में है। इसी दंडकारण्य का एक हिस्सा है आंध्र प्रदेश का भद्राचलम शहर। गोदावरी नदी के तट पर भद्रगिरि पर्वत के ऊपर बसा यह शहर अपने भव्य सीता-रामचंद्र मंदिर के लिए देश-दुनिया में प्रसिद्ध है। श्रीराम ने अपने वनवास के कुछ दिन इस भद्रगिरि पर्वत पर ही बिताए थे।

इसी के निकट पंचवटी नामक स्थान से सीता जी के अपहरण के बाद दंडकारण्य में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआ। इसीलिए दुनियाभर में सिर्फ यहीं पर जटायु का एकमात्र मंदिर है। कहते हैं कि सीता की खोज में निकले श्रीराम जब मार्ग में कबन्ध का वध करते हैं तो वह उन्हें मतंग ऋषि के आश्रम जाने की सलाह देता है जहां वे जाति से भीलनी तपस्विनी माता शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश देते हैं। वर्तमान में माता शबरी का यह आश्रम केरल में है तथा केरल का प्रसिद्ध ‘सबरीमला मंदिर’ इसी के निकट स्थित है। माता शबरी के कहने पर श्री राम ऋष्यमूक पर्वत पर पहुंचते हैं जहां उनकी भेंट हनुमान और सुग्रीव से होती है जिनकी सहायता से उनकी लंका विजय व रावण वध के उपरांत सीता माता के साथ अयोध्या वापसी के साथ वनवास पूर्ण होता है।

सार रूप में कहें तो श्रीराम का वन पथ सच्चे लोकनायक का पथ है। वन के प्रत्येक प्राणी की मुश्किल उनकी अपनी मुश्किल है। जब राम अयोध्या से चले तो साथ में केवल सीता और लक्ष्मण थे। पर जब लौटे तो पूरी सेना के साथ; एक साम्राज्य को नष्ट कर और एक साम्राज्य का निर्माण कर।