स्वस्तिक : हिंदू एकजुटता से परास्त हुए हिन्दुत्व विरोधी

    दिनांक 30-अप्रैल-2021
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ललित मोहन बंसल, लॉस एंजेल्स
मैरीलैंड की प्रतिनिधि सभा में हिन्दुओं के मांगलिक चिन्ह ‘स्वस्तिक’ को ‘नाजी चिन्ह’ बताकर इस पर प्रतिबंध लगाने की कट्टर ईसाई तत्वों और डेमोक्रेट प्रतिनिधि की चाल हुई विफल। अमेरिका में हिन्दुओं की आस्था पर चोट करने वाले तत्वों के विरुद्ध लामबंद हिन्दू
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अष्टमी का दिन था। एक ओर बड़ी सुबह से मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की तैयारियां चल रही थी तो दूसरी ओर टीवी पर सुप्रसिद्ध गायक जगजीत सिंह के भजन चल रहे थे। इन भजनों में एक भजन ‘तम हारिणी जगदीश्वरी....’ के सुरीले बोल सुनाई दिए तो लगा जैसे मां दुर्गा कोविड काल में सभी भक्तों के दु:ख हरने के लिए धरती पर उतर आई हों। वैसे, एक मां ही नहीं, हिंदुस्थान के तैंतीस कोटि देवी-देवता पूरे जग के दु:ख हरने के लिए तत्पर रहते हैं।

अमेरिकी संविधान किसी पंथ, उसके देवी-देवताओं, आचार-विचार और पूजा पद्धति पर ओछी टिप्पणियां करने की इजाजत नहीं देता। इसके बावजूद अमेरिका में हिंदू देवी-देवताओं और हिंदू प्रतीक चिन्हों के प्रति भद्दी टिप्पणियां की जाती रही हैं। यह कोई नई बात नहीं है। रोजगार की तलाश में दुनियाभर से आए हिंदू, मुस्लिम, यहूदी, बौद्ध और जैन आदि मत-मतांतरों के अनुयायियों की नस्ल, जातीयता, रहन-सहन, खान-पान और पहनावे को लेकर प्राय: कटाक्ष किए जाते रहे हैं। इन्हीं में एक वर्ग ऐसा भी है, जो सुख-सुविधाओं के वशिभूत होकर अपनी ही सनातन संस्कृति और वैभव को दुत्कारने में गर्व का अनुभव करता है। वह  वर्ग अपनी सुख-सुविधाओं के चलते सत्य की पहचान ही नहीं कर पाता। ऐसे लोगों का साथ पाने के लिए यहां ईसाई एवं मुस्लिम समुदाय की एक दिग्भ्रमित वर्ग ‘मैं और मेरा पंथ ही श्रेष्ठ’ की होड़ में सुख-सुविधाओं के शिकार लोगों पर निगाहें रहती हैं।

देखा गया है, यही लोग बढ़ चढ़ कर अपने ही रीति-रिवाजों, पूजा-पद्धति, देवी-देवताओं और प्रतीक चिन्हों पर घृणात्मक टिप्पणियां करते हैं। ऐसे लोग भारत और भारतीय परंपराओं से चिढ़ते हैं, उन्हें भारतीय कहलाने की बजाए ‘दक्षिण एशियाई’ कहलाने में गर्व का बोध होता है।

इस वर्ग में वामपंथी और खालिस्तानी सोच के लोग आगे रहते हैं। आश्चर्य तो तब हुआ, जब प्रवासी भारतीय समुदाय के समर्थन और चंदे की मदद से केरल के एक मूल निवासी न्यूयार्क स्थित लांग आईलैंड के डेमोक्रेटिक राज्य प्रतिनिधि बन गए और उन्होंने हिन्दुओं के लिए पूज्य ‘स्वस्तिक’ चिन्ह के विरुद्ध मोर्चा खोला। ये न्यूयॉर्क सीनेट में एक बिल के पक्ष में उतर आए। भला हो न्यूयॉर्क के सजग और सक्रिय भारतवंशियों का, जिन्होंने इन महाशय पर इतना दबाव बनाया कि न्यूयॉर्क प्रतिनिधि सभा में उस बिल को आगे ले जाया ही नहीं जा सका। हिंदू संस्कृति के उपासक लॉस एंजेल्स लांग आइलैंड के निर्भीक बैंक अधिकारी विभूति झा कहते हैं: ‘हिंदू समाज ने सदैव ‘असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय...’ की शिक्षा को आत्मसात किया है। पिछले दिनों अमेरिका के पूर्वी छोर पर मैरीलैंड राज्य में न्यूयॉर्क स्टेट सीनेट में प्रेषित ‘स्वस्तिक’ विरोधी बिल की तर्ज़ पर एक बिल  (संख्या 0418) प्रतिनिधि सभा में लाने की तैयारी की गई। लेकिन मैरीलैंड के सजग भारतवंशी हिंदू इसकी भनक लगते ही इस बिल के विरोध में जुट गए। उन्होंने घरों, सामुदायिक स्थलों और हिंदू मंदिरों में बिल के खिलाफ जनजागरण अभियान चलाया। देखते ही देखते ‘हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन’ ने इस मुद्दे पर लोगों से संपर्क किया। मीडिया के जरिए इसे एक विश्वव्यापी मुद्दा बना दिया। इस बिल का मूल उद्देश्य स्कूलों में मैदानों, स्कूली बस्तों, स्कूल फोल्डर तथा अन्यान्य सामग्री पर ‘स्वस्तिक’ चिन्ह के उपयोग पर प्रतिबंध लगाना था।

उल्लेखनीय है कि भारतवंशियों के दबाव के कारण यह बिल मैरीलैंड प्रतिनिधि सभा में पेश नहीं किया जा सका है। बिल के प्रस्तावकों की मंशा थी कि वे बच्चों के मन में स्वस्तिक चिन्ह के प्रति घृणा भर दें। बताया जाता है कि हिंदू देवी-देवताओं और हिंदू प्रतीक चिन्हों के खिलाफ घृणा का बीज बोने के लिए तत्पर यह वर्ग विषय की गहराई को जाने-समझे बिना स्वस्तिक को ‘घृणा के प्रतीक नाजी प्रतीक चिन्ह’ के साथ जोड़कर पेश करना चाहता था। यह वर्ग एक बार फिर हिंदू प्रतीक चिन्ह ‘स्वस्तिक’ और नाजी ध्वज पर एक वृत्त में ‘हुक्ड क्रास’ प्रतीक चिन्ह में अंतर करना ही भूल गया। वाशिंगटन स्थित हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन ने इस मुद्दे पर त्वरित कार्रवाई की और इस स्थानीय हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म के अनुयायी एकजुट हो गए और डेमोक्रेट प्रतिनिधि इस बिल को आगे नहीं बढ़ा पाए।

मैरीलैंड में हिंदू, जैन, बौद्ध, ब्रह्मकुमारी आदि संगठन अच्छी-खासी तादाद में हैं। चीन, जापान, कोरिया, थाइलैंड, श्रीलंका आदि के बौद्ध भी बड़ी संख्या में हैं। मैरीलैंड की 60 लाख की आबादी में चार लाख एशियाई हैं, जिनमें ज्यादातर सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक हैं। यह समुदाय डेमोक्रेटिक पार्टी का मूक समर्थक ही नहीं, चुनाव में चंदे की मोटी रकम जुटाने में भी आगे रहता है। बता दें कि अमेरिका में व्हाइट सुपरमेसिस्ट और नव नाजी समूह के दक्षिणपंथी प्राय: नाजी प्रतीक चिन्ह को लेकर लोगों को गुमराह करने का काम करते हैं। बताया जाता है कि राष्ट्रपति चुनाव के समय इसी समूह ने कैपीटॉल हिल पर उत्पात मचाया था जिसमें एक पुलिस अधिकारी को अपनी जान गंवानी पड़ी थी।   

मैरीलैंड की इस घटना से उद्वेलित लॉस एंजेल्स लांग आइलैंड के विद्वान विभूति झा ने हिंदू प्रतीक चिन्ह ‘स्वस्तिक’ और नाजी ध्वज पर अंकित ‘हुक्ड क्रास’ की सुंदर शब्दों में व्याख्या करते हुए बताया कि हिंदुओं की भावनाओं से खिलवाड़ करने का यह उपक्रम कोई नया नहीं है। हिंदू धर्म के अनुयायी सर्व धर्म समभाव में विश्वास व्यक्त करते हुए अन्यान्य पंथों का भी सम्मान करते हैं, जबकि ईसाई और अब्राह्मिक पंथ विशेष के अनुयायी अपने पंथ को ही श्रेष्ठ मानते हैं और हिंदू धर्म में खामियां तलाशते हैं। यह उनकी अज्ञानता का द्योतक है। उन्होंने कहा कि इसके प्रतिकार का एक ही रास्ता है कि हिंदू एकजुट हों, सुख-सुविधाओं के प्रलोभन से बचें और अपने धर्म, पूजा पद्धति, आचार-विचार तथा देवी-देवताओं के विरुद्ध कुप्रचार करने वालों से सावधान रहें।


लॉस एंजेल्स स्थित हिंदू मंदिर के युवा पुजारी जगदीश राजगौर ने कहा कि ‘स्वस्तिक’ प्रतीक चिन्ह मंगलकारी है। इसकी तुलना अपने समाज में पारस्परिक घृणा के जनक हिटलर तंत्र के ध्वज पर अंकित प्रतीक चिन्ह से कैसे की जा सकती है! मैरीलैंड की प्रतिनिधि सभा के दो प्रतिनिधियों ने जैसे ही मंगल के प्रतीक ‘स्वस्तिक’ की तुलना नाजी तंत्र के प्रतीक चिन्ह से करने का प्रस्ताव रखा, हमारा हिंदू समाज फौरन हरकत में आया। राजगौर ने कहा कि हिंदू, जैन और बौद्ध सदियों से अपने समाज में घरों के बाहर रंगोली से और घरों के अंदर रेशम के कपड़े पर ‘स्वस्तिक’ का चिन्ह बना कर मांगलिक कार्यक्रमों में पधारने वाले आगंतुकों के लिए मंगल कामना करते हैं। 

पाठकों को याद होगा कि 2017 में कैलिफोर्निया की स्कूली पाठ्यपुस्तकों में वैदिक संस्कृति और हिंदू देवी देवताओं को लेकर अवांछित टिप्पणियां प्रकाशित करने के विरुद्ध अमेरिका में हिंदू स्वयंसेवक संघ एकजुट हो गया था। हिंदू स्वयंसेवक संघ ने कैलिफोर्निया के सैकड़ों स्कूलों में छात्र-छात्राओं के अभिभावकों में जग जागरण किया। इसके बाद ही पुस्तकों से उन सभी अभद्र टिप्पणियों को हटाया जा सका।

ऐसा ही योग के मामले में हुआ था, जिसके विरुद्ध कट्टर ईसाई लामबंद हुए थे। अमेरिका के दक्षिणपूर्व में करीब 50 लाख की आबादी वाले अल्बामा राज्य में पिछले सप्ताह एक माह की कशमकश के बाद सीनेट ने पब्लिक स्कूल की कक्षा 12वीं में योग की शिक्षा दिए जाने संबंधी बिल को मंजूरी दे दी। इसमें नमस्ते की मुद्रा पर मौजूदा प्रतिबंध जारी रहेगा। अमेरिका में अल्बामा एकमात्र राज्य है, जहां पिछले 28 वर्षों से योग, नमस्ते की मुद्रा और मंत्रोच्चारण पर प्रतिबंध है। इस विवाद में राज्य के परंपरावादी कट्टर ईसाई समुदाय का सीधा आरोप था कि योग के माध्यम से स्कूलों में हिंदू धर्म का पाठ पढ़ाया जा रहा है। लेकिन योग शिक्षक और बिल के प्रस्तावक जेरमी ग्रे इस पर सहमत नहीं थे। 12वीं कक्षा के छात्र-छात्राओं को योग सिखाए जाने पर उनका मत था कि योग तन और मन के साथ आत्मा के लिए भी उतना ही जरूरी है। इस से राज्य में युवाओं को आत्महत्या जैसे नकारात्मक विचारों से मुक्ति मिलेगी। इस बीच एक अच्छी बात यह सामने आई कि टेक्सास राज्य में हिंदू पर्व और उत्सवों की पहचान कर उन्हें पूर्ण गरिमा दिए जाने पर सहमति दे दी गई है। टेक्सास में हिंदू समुदाय बड़ी संख्या में है, जो पहले से ज्यादा सक्रिय है। अमेरिका में 40 लाख से अधिक भारतीय हैं, जो अमेरिका के सामान्य जन समुदाय में अपेक्षाकृत अधिक शिक्षित और सम्पन्न हैं।