मीडिया का हिंदूविरोधी और सांप्रदायिक नजरिया

    दिनांक 05-अप्रैल-2021
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सेकुलर मीडिया के लिए राष्टवादी संगठनों के नेताओं व कार्यकर्ताओं पर हुए हमले सामान्य घटना हैं
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यह एक विचित्र संयोग है कि जो मीडिया हिंदू त्योहारों को पुरातनपंथी और अवैज्ञानिक सिद्ध करने का प्रयास करता रहता है, वही उन्हें मुगलों की देन बताने में कोई कसर नहीं छोड़ता। टाइम्स आॅफ इंडिया और दैनिक भास्कर जैसे बड़े अखबारों से लेकर बीबीसी और द वायर जैसी प्रोपोगेंडा वेबसाइट यह काम कर रही हैं। टाइम्स आॅफ इंडिया बताता है कि होली की परंपरा मुगलों ने शुरू की, जबकि बीबीसी ने बताया कि होली सिर्फ हिंदुओं का त्योहार नहीं है। किसी त्योहार को कोई भी मनाए, इसमें क्या आपत्ति हो सकती है? लेकिन समस्या तब होती है जब त्योहारों को उनकी धार्मिक परंपरा और रीति-रिवाज से काटने का प्रयास किया जाता है। यह एक तरह का सांस्कृतिक युद्ध है जिसमें मीडिया सबसे बड़ा हथियार है। उनके निशाने पर सिर्फ हिंदू पर्व और त्योहार हैं।

महाराष्ट्र में होली के दिन हिंदू मंदिरों पर हमले की घटनाएं सामने आर्इं। मलंगगढ़ किले में बने मच्छिंद्रनाथ मंदिर में आरती के दौरान हंगामा मचाया गया। अकोला में होलिका दहन को बुझा दिया गया और वहां आए श्रद्धालुओं के साथ मारपीट की गई। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि कहीं किसी मस्जिद या चर्च में ऐसी घटना होती तो वह राष्ट्रीय हेडलाइन नहीं बनी होती। लेकिन हमला हिंदू मंदिरों पर हुआ था, इसलिए यह घटना महाराष्ट्र के स्थानीय समाचार पत्रों तक सिमटकर रह गई।

पंजाब के मुक्तसर में भाजपा विधायक अरुण नारंग पर जानलेवा हमला हुआ। अधिकांश चैनलों और अखबारों ने इसे ‘किसानों द्वारा हमला’ बताया। इस घटना का एक वीडियो सामने आया है जिसमें खालिस्तानी नारे स्पष्ट सुने जा सकते हैं। सबने इस बात को अनदेखा किया। किसी ने इसे राजनीतिक हिंसा भी नहीं माना। पंजाब में कांग्रेस पार्टी की जो सरकार उत्तर प्रदेश के माफिया सरगना मुख्तार अंसारी को सुरक्षा देने के लिए सर्वोच्च अदालत तक चली जाती है, वह एक स्थानीय विधायक को सुरक्षा नहीं दे पाती। यह विरोधाभास भी जान-बूझकर दबा दिया गया। वैसे भी मुख्यधारा मीडिया में यह अलिखित नियम है कि राष्ट्रवादी संगठनों के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर हमले और उनकी हत्याएं सामान्य घटना हैं। बंगाल चुनाव के दौरान ममता बनर्जी लगातार विपक्षी भाजपा के समर्थकों को धमका रही हैं। भाजपा उम्मीदवारों पर हमले हो रहे हैं। लेकिन ममता बनर्जी पर हुए नकली हमले पर आसमान को सिर पर उठा लेने वाला मीडिया इन सबको छोटी-मोटी बात साबित करने में जुटा है। थोड़ा-सा कुछ छापने और बहुत कुछ छिपा लेने का सेकुलर मीडिया का यह रोग बहुत व्यापक है। मुंबई के सनराइज अस्पताल में आग लगी, जिसमें 10 से अधिक रोगियों की मृत्यु हो गई। मीडिया ने जोरशोर से यह समाचार दिखाया, लेकिन यह बात छिपा ली कि अस्पताल पीएमसी बैंक घोटाले के मुख्य आरोपी का है। क्या यह प्रश्न नहीं पूछा जाना था कि भाजपा सरकार ने जब इस अस्पताल को बंद करवा दिया था, तब किस आधार पर इसे खोलने की अनुमति दी गई?

इशरत जहां मुठभेड़ मामले में 17 वर्ष के बाद तीन पुलिसकर्मी निर्दोष घोषित हुए। अधिकांश चैनलों और अखबारों ने इस समाचार को दबा दिया। आपको याद होगा कि कैसे कुछ वर्ष पहले मीडिया का एक बहुत बड़ा वर्ग इशरत जहां मुठभेड़ को लेकर झूठी कहानियां गढ़ा करता था। बात-बात पर मानवाधिकार को लेकर चीख-पुकार मचाने वाले भारतीय मीडिया ने कहीं भी नहीं पूछा कि इन पुलिसकर्मियों के जीवन के 17 वर्ष उन्हें कौन लौटाएगा। ऐसी रिपोर्टिंग अक्सर सिर्फ आतंकवाद के आरोपियों के लिए होती है। इसी तरह उत्तर प्रदेश के अपराधी सरगना मुख्तार अंसारी पर पोटा लगाने वाले पुलिस अधिकारी का समाचार सुर्खियों में आया। जिन दिनों मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे, उन दिनों भी यही मीडिया हुआ करता था। लेकिन उस अधिकारी के साथ हुए अन्याय का समाचार कभी कहीं नहीं छपा।

आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय पिछले कुछ समय से भारतीयों के प्रति नस्लभेद को लेकर चर्चा में है। यहां एक भारतीय छात्रा रश्मि सामंत के साथ हुए बर्ताव को सबने देखा। लेकिन वहीं की एक प्रोफेसर का इंटरव्यू टाइम्स आॅफ इंडिया ने संपादकीय पेज पर छापा, जिसमें उन्होंने भारत में स्त्रियों की स्थिति पर तथ्यहीन बातें कीं। प्रश्न उठता है कि किस व्यापारिक लाभ के लिए मीडिया संस्थान इन विदेशी संस्थानों के माध्यम से हो रहे भारत विरोधी दुष्प्रचार को मंच दे रहे हैं?