फिर चर्चा में दरभंगा मॉड्यूल

    दिनांक 05-अप्रैल-2021
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संजीव कुमार
उद्योगपति मुकेश अंबानी के घर के बाहर विस्फोटक से भरी स्कॉर्पियो की बरामदगी और इज्राएली दूतावास के पास हुए बम धमाके में दरभंगा मॉड्यूल का नाम आया है। इंडियन मुजाहिदीन और अलकायदा के आतंकी जेल के भीतर से ही एक नया संगठन खड़ा कर अपनी गतिविधियों को अंजाम दे रहे
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मुकेश अंबानी के आवास ‘एंटिलिया’ के पास से गत 25 फरवरी को विस्फोटक से भरी स्कॉर्पियो को बरामद किया गया था, इंडियन मुजाहिदीन का आतंकी तहसीन अख्तर

बिहार का कुख्यात ‘दरभंगा मॉड्यूल’ इन दिनों फिर चर्चा में है। इस बार उद्योगपति मुकेश अंबानी के घर के बाहर मिली विस्फोटक लदी गाड़ी का सूत्र इंडियन मुजाहिदीन के दरभंगा मॉड्यूल से जुड़ रहा है। इसके अलावा, इज्राएली दूतावास के सामने हुए विस्फोट में भी इसी मॉड्यूल का नाम आया है। इन दोनों मामलों में इंडियन मुजाहिदीन के आतंकी तहसीन अख्तर उर्फ मोनू का नाम उभरा है। वह समस्तीपुर के कल्याणपुर थानाक्षेत्र के मनियारपुर गांव का निवासी है।

तहसीन अख्तर की बैरक से एक मोबाइल हैंडसेट जब्त किया गया, जिसका इस्तेमाल कथित तौर पर 25 फरवरी को उद्योगपति मुकेश अंबानी के मुंबई स्थित आवास ‘एंटिलिया’ के बाहर 20 जिलेटिन छड़ों से भरी एसयूवी खड़ी करने को लेकर संदेश भेजने में किया गया था। इसके अलावा, इस मोबाइल हैंडसेट से 29 जनवरी को इज्राएली दूतावास के पास हुए विस्फोट की जिम्मेदारी लेने वाले टेलीग्राम संदेश भी भेजे गए थे। इसमें तिहाड़ जेल संख्या 8 के कैदियों में इंडियन मुजाहिदीन और अलकायदा के सदस्य शामिल हैं। इन्हें आतंकवाद से जुड़े मामलों में सजा सुनाई जा चुकी है। दरअसल, ‘एंटिलिया’ के बाहर खड़ी कार से जिलेटिन बरामद होने के मामले में तिहाड़ से तार जुड़ने के बाद दिल्ली पुलिस की आतंकरोधी इकाई सक्रिय हुई।

विशेष शाखा को इज्राएली दूतावास के पास हुए विस्फोट की जांच के दौरान पता चला कि जैश-उल-हिंद नाम के संगठन ने जिस नंबर से टेलीग्राम के जरिए धमाके की जिम्मेदारी ली थी, वह नंबर तिहाड़ जेल में सक्रिय था। यह संगठन इंडियन मुजाहिदीन और अलकायदा के आतंकवादियों ने जेल में बनाया था। दोनों मामले में एक ही मोबाइल नंबर 9311७७७७७9 का इस्तेमाल किया गया था। इस नंबर की जांच करने पर एक और संदिग्ध नंबर सामने आया। जांच में यह खुलासा हुआ कि इस नंबर से ही तहसीन अख्तर के पास से बरामद मोबाइल नंबर को चालू किया गया। विशेष शाखा ने इन तीनों मोबाइल फोन को जांच के लिए लोदी कॉलोनी स्थित फॉरेंसिक प्रयोगशाला भेज दिया।

यासीन भटकल के बाद संभाली कमान
तहसीन अख्तर बिहार के समस्तीपुर का रहने वाला है। उसने दरभंगा स्थित मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय में सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा के लिए दाखिला लिया था। 2009 में दरभंगा के अलहिरा पब्लिक स्कूल के पास स्थित एक पुस्तकालय में उसकी भेंट आतंकी गयूर जमाली से हुई। दरभंगा के एक खास समुदाय बहुल इलाके के पुस्तकालयों में जाकिर नाईक की पुस्तकें रखी रहती थीं। जमाली ने ही तहसीन को जाकिर नाईक की पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित किया। उन दिनों यासीन भटकल दरभंगा में ही सक्रिय था। वह ऐसे लोगों की तलाश करता था जो इंजीनियरिंग के विद्यार्थी हों।

2010 में जमाली ने ही तहसीन को यासीन भटकल से मिलवाया था। तहसीन ने आतंकवाद का पहला प्रशिक्षण दरभंगा में ही लिया था। इसे पटना के गांधी मैदान में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों का तथाकथित मास्टरमाइंड माना जाता है। इसके अलावा भी इसने कई धमाके किए। उसने अपनी कार्रवाइयों से शीघ्र ही पाकिस्तान में रहने वाले रियाज भटकल और यासीन भटकल का विश्वास प्राप्त कर लिया और संगठन में शीर्ष पर पहुंचने का रास्ता बना लिया। यासीन भटकल की गिरफ्तारी के बाद उसने इंडियन मुजाहिदीन की कमान संभाली। भटकल ने भी 29 अगस्त, 2013 को अपनी गिरफ्तारी के समय जांच अधिकारियों को बताया था कि तहसीन अख्तर ही अब भारत की कमान संभालेगा।

मार्च 2014 में 24 वर्षीय तहसीन को दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा ने पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से गिरफ्तार किया था। इसकी गिरफ्तारी की जानकारी पाकिस्तानी आतंकी जिया-उर-रहमान उर्फ वकास की गिरफ्तारी के तीन दिन बाद सामने आई थी। एक समय तहसीन पर 10 लाख रुपये का इनाम भी घोषित किया गया था।

कई आतंकी गतिविधियों में शामिल
तहसीन अख्तर ‘दरभंगा मॉड्यूल’ का जीता-जागता उदाहरण है कि कैसे एक युवा को इस्लाम के नाम पर आतंकवाद की घुट्टी पिलाई जाती है और बाद में आतंकी गतिविधियों के लिए तैयार किया जाता है। 2010 में तहसीन को पाकिस्तान से आने वाले आतंकियों वकास और असदुल्ला अख्तर को सही-सलामत उनके ठिकाने तक पहुंचाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। ये दोनों आतंकी काठमांडू के रास्ते भारत में घुसे थे। चूंकि तहसीन काफी लगनशील था, इसलिए यासीन भटकल ने जल्द ही उसे आईईडी (इंप्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) बनाना सिखा दिया। दरभंगा के जंगल में एक गोपनीय ठिकाने पर उसे इन सारी गतिविधियों का प्रशिक्षण मिलता रहा। कुछ ही दिनों में तहसीन बम विशेषज्ञ के रूप में कुख्यात हो गया। 2010 में वाराणसी के शीतला घाट पर हुए बम विस्फोट और इसी वर्ष जामा मस्जिद के बाहर कूकर बम विस्फोट को उसने ही अंजाम दिया। कहा जाता है कि वह मुंबई में 2011 में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों और 2012 में पुणे विस्फोट में भी शामिल था।

27 अक्तूबर, 2013 को नरेंद्र मोदी की पटना के गांधी मैदान में सभा हो रही थी। उसमें एक के बाद एक कई धमाके हुए, जिसमें 5 लोग मारे गए थे, जबकि 83 से अधिक घायल हो गए थे। तहसीन को ही इन बम धमाकों का मास्टरमाइंड माना जाता है। 2013 में ही हैदराबाद विस्फोट मामले में भी उसकी संलिप्तता थी। 2016 में एक विशेष एनआईए अदालत ने तहसीन को यासीन भटकल, हड्डी, एजाज शेख इत्यादि के साथ दोषी ठहराया था। मार्च 2014 में गिरफ्तारी के बाद भी वह आतंकी घटनाओं को अंजाम देने से बाज नहीं आया। जेल के अंदर ही उसने अलकायदा और इंडियन मुजाहिदीन के आतंकियों के साथ मिलकर जैश-उल-हिंद नामक संगठन बना लिया। अभी तक की जानकारी के अनुसार, इसी जैश-उल-हिंद संगठन के इशारे पर ‘एंटेलिया’ के समीप विस्फोटकों से भरी एसयूवी खड़ी की गई थी तथा इज्राएली दूतावास के पास धमाके किए गए थे। 

भटकल ने रखी थी दरभंगा मॉड्यूल की नींव
आतंकी गतिविधियों में दरभंगा मॉड्यूल की गिनती एक विशेष प्रकार के प्रशिक्षण और कार्यशैली को लेकर होती है। आतंकवाद से जुड़े मामलों में इस मॉड्यूल की काफी चर्चा है। इसकी शुरुआत इंडियन मुजाहिदीन के संस्थापक यासीन भटकल ने की थी। कर्नाटक के रहने वाले सामान्य पढ़े-लिखे यासीन भटकल को लगा कि दरभंगा से वह अपना काम बेहतर कर सकता है। कर्नाटक में ही उसकी दरभंगा के कुछ लड़कों से जान-पहचान हुई थी। उन लड़कों में उसे अपने काम के लिए काफी संभावनाएं दिखीं और वह दरभंगा आकर रहने लगा। गेहुंए रंग का लंबी कद-काठी वाला यासीन भटकल उर्दू, फारसी, हिन्दी और फरार्टेदार अंग्रेजी बोलता था। वह आधुनिक हथियार चलाने में माहिर था।

मिथिलांचल को केंद्र बनाकर उसने नेपाल, पाकिस्तान और बांग्लादेश में अपना मजबूत नेटवर्क खड़ा किया। वह वेश बदलने में माहिर था। कुरान, दीन और शरीयत पर उसकी तकरीर को मुसलमान बहुत पसंद करते थे। उसकी तकरीर के आगे अच्छे-अच्छे मौलाना भी नहीं टिकते थे। वह इतना शातिर था कि जिस समय वह मजहबी तकरीर कर रहा होता था, उसी समय कहीं धमाके होते थे। यासीन भटकल 2008 में दरभंगा आया था। इसके बाद से ही उसने आतंकी जाल बिछाना शुरू कर दिया था। वह अपने मॉड्यूल के लिए केवल उच्च तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने वाले तेज-तर्रार युवकों को ही चुनता था। वह स्थानीय युवकों को पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से बम बनाने और आधुनिक हथियार चलाने का प्रशिक्षण लेकर आतंकवाद के रास्ते पर चलने के लिए उकसाता रहता था। वह युवाओं को जिहाद की ऐसी घुट्टी पिलाता था, जिससे वे उसकी बातों में आ जाते थे।

जाकिर नाइक की भूमिका
दरभंगा मॉड्यूल के तहत आतंकवादियों की पौध तैयार करने में जाकिर नाईक की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। दरभंगा के एक पुस्तकालय दार-उल-किताब-सुन्ना में अक्सर इन लोगों का आना-जाना लगा रहता था। यहा से एनआईए ने जाकिर की किताबें, सीडी तथा कई तस्वीरें बरामद की थीं। मुंबई हमले में इस पुस्तकालय की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

मुंबई बम धमाकों के सिलसिले में 12 लोग गिरफ्तार किए गए थे, जिनमें असदुल्लाह रहमान उर्फ दिलकश, कफील अहमद, नदीम अख्तर, अशफाक शेख, मो. आदिल, इसरार, मो. तारिक अंजुमन, हारून रसीद नाईक, वसी अहमद, नकी अहमद, मो. इरशाद, गयूर अहमद जमाली और आफताब आलम उर्फ फारुख शामिल थे। मो. आदिल को छोड़कर शेष सभी लोग दरभंगा के थे। एनआईए को शक था कि इंडियन मुजाहिदीन इसी पुस्तकालय से दरभंगा मॉड्यूल का संचालन करता था। इंडियन मुजाहिदीन के जो आतंकी गांधी मैदान बम विस्फोट मामले में पकड़े गए थे, उनके पास से भी जाकिर के भड़काऊ साहित्य बरामद किया गया था। 2012 में जाकिर नाईक ने किशनगंज जिले में एक रैली भी की थी।

दरअसल, दरभंगा मॉड्यूल में दो बातें होती थीं। एक तो युवाओं के मन-मस्तिष्क में ठूंस-ठूंस कर जिहाद भरा जाता था ताकि उन्हें आसानी से आतंकी गतिविधियों के लिए तैयार किया जा सके। उन्हें यह घुट्टी पिलाई जाती थी कि आतंकवाद के जरिए ही इस्लाम की विजय हो सकती है। इस काम में सबके सहयोग की बात कही जाती थी। खासतौर से जो तेज-तर्रार होते, उन्हें बम बनाने और आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने के लिए तैयार किया जाता था, जबकि कुछ लोगों को संदेशवाहक या सूचना इकट्ठा करने के लिए रखा जाता। दरभंगा मॉड्यूल में स्लीपर सेल महत्वपूर्ण होते हैं।

पहले इन्हें आतंकवाद के लिए मानसिक रूप से तैयार किया जाता है, फिर आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। इसके बाद इन्हें या तो आतंकी मुहिमों में भेजा जाता है या सामान्य काम करने के लिए कहा जाता है। इन कामों की एवज में उन्हें वेतन के तौर पर काफी पैसे दिए जाते हैं। स्लीपर सेल को कई बार सामान्य रूप में लोगों के बीच रहने के लिए भी कहा जाता है ताकि सूचनाएं प्राप्त की जा सकें। चंद प्रमुख लोगों को ही नेटवर्क की पूरी जानकारी होती है। प्रमुख आतंकवादियों के जेल में जाने के बावजूद भी यह सिस्टम चलता रहता है।

हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकियों ने देश में 300 से अधिक धमाके किए हैं। 2008 में जयपुर में विस्फोट, इसी वर्ष दिल्ली और सूरत में विस्फोट, 2010 में जामा मस्जिद, जर्मन बेकरी, चिन्ना स्वामी स्टेडियम के अलावा शीतल घाट धमाका और बेंगलुरू में भी बम धमाके हुए। विश्व प्रसिद्ध बोध गया मंदिर में हुए बम विस्फोट के पीछे भी इन्हीं लोगों की साजिश बताई जाती है।