लोकतंत्र पर खतरे की छद्म रपटें

    दिनांक 05-अप्रैल-2021
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डॉ. अश्विनी महाजन

भारत को अस्थिर करने के लिए चल रहे कुछ अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्रों के क्रम में कुछ देशों की संस्थाएं भारत में लोकतंत्र पर खतरे की रपटें छाप रही हैं। दिलचस्प यह है कि इन सुनियोजित रपटों का आधार कार्यवाही के कारण की जांच-पड़ताल के बजाय मात्र कार्रवाई है जिसका उद्देश्य जनता में भ्रम फैलाना और दुष्प्रचार करना है
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पिछले कुछ समय से भारत में लोकतंत्र के तथाकथित ह्रास की रपटें कुछ ‘खास’ अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के माध्यम से आ रही हैं। हाल ही में स्वीडन की एक एजेंसी वी-डैम (वैरायटी आॅफ डेमोक्रेसी) इंस्टीट्यूट ने यह रपट प्रकाशित की है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र नहीं, चुनावी निरंकुश देश बन गया है। इंस्टीट्यूट ने मीडिया के साथ दुर्व्यवहार और मानहानि और देशद्रोह के कानूनों के ज्यादा इस्तेमाल को अपनी रपट का आधार बनाया है।

गौरतलब है कि इससे एक सप्ताह पहले अमेरिका की एक एजेंसी ‘फ्रीडम हाउस’ ने भारत की स्थिति को नीचे गिराकर ‘पार्टली फ्री’ यानी ‘आंशिक स्वतंत्र’ कर दिया था। एजेंसी का मानना है कि वर्ष 2013 में भारत का स्कोर सबसे अधिक 0.75 था, जो 2020 के अंत तक घटकर 0.34 ही रह गया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि रैंकिंग में यह सब गिरावट 2014 से नरेन्द्र मोदी की भाजपा सरकार के आने के साथ शुरू हुई। यहां तक कहा गया है कि भारत सरकार ने राष्ट्रद्रोह,मानहानि और आतंकवाद के कानूनों का बेजा इस्तेमाल करते हुए अपने आलोचकों को चुप कराने की कोशिश की है।

रपटों की उलटबांसी
सबसे मजेदार बात तो यह है कि इस रपट में भारत को पाकिस्तान के बराबर रख दिया गया है और उनकी मानें तो बंगलादेश और नेपाल भारत से ऊपर हो गए हैं। रिपोर्ट का कहना है कि विश्व में अब मात्र 32 देश ही मुक्त लोकतंत्र बचे हैं। यह संख्या एक दशक पहले 41 थी। वैश्विक तौर पर लोकतंत्र का स्तर 2020 तक आते-आते 1990 के स्तर तक पहुंच गया है। दिलचस्प बात यह है कि यह रिपोर्ट मानती है कि चुनावी निरंकुश लोकप्रिय शासक बने हुए हैं। रिपोर्ट का कहना है कि निरंकुशता 25 देशों में फैली है जहां दुनिया की जनसंख्या के एक तिहाई यानी 260 करोड़ लोग रहते हैं। इन देशों में ब्राजील, भारत, टर्की और अमेरिका शामिल हैं।

महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत में मोदी सरकार को चुनावी निरंकुश मानने वाली यह रपट खुद स्वीकार करती है कि मोदी अत्यधिक लोकप्रिय हैं। इस बात की पुष्टि बार-बार हो रहे जनमत सर्वेक्षणों के माध्यम से भी होती है। इसका मतलब यह है कि देश में अधिकांश लोग यह मानते हैं कि इस सरकार की नीतियां सही दिशा में है। अपने आलोचकों पर राष्ट्रद्रोह और मानहानि के कानूनों के तहत कार्रवाई करने से ये एजेंसियां इस सरकार को निरंकुश मानने लगी हैं, तो यहां यह समझने की जरूरत होगी कि भारत की वर्तमान परिस्थितियों में यह वास्तव में सच है या नहीं।

विधिसम्मत कदमों को बताया निरंकुश
रिपोर्ट में नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने को आधार बनाया गया है। देखा जाए तो नागरिकता संशोधन कानून लाने के पीछे स्पष्ट मंशा भारत के किसी पंथविशेष के खिलाफ मानी ही नहीं जा सकती। नागरिकता संशोधन कानून लाने के पीछे मंशा यह है कि पूर्व के अविभाजित भारत में रहने वाले गैर-मुस्लिम नागरिकों, जिन्हें पाकिस्तान और बंगलादेश में मजहबी कट्टरता, विद्वेष और आतंक के कारण मुसीबतों से गुजरना पड़ रहा था, और जिन्होंने इस कारण से भारत में शरण ले ली थी, उन्हें भारत की नागरिकता दी जाए।

ऐसे में विरोधियों का यह कथन कि पाकिस्तान और बंगलादेश के मुस्लिमों को भी भारत में शरण लेने का बराबर अधिकार हो, किसी भी हालत में औचित्यपूर्ण नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वे उन देशों के बहुसंख्यक वर्ग में आते हैं और उनकी प्रताड़ना के कोई उदाहरण भी नहीं हैं। ऐसे में भारत के मुस्लिमों को भड़काकर जो आंदोलन किया गया, उसे भी देश की जनता ने महीनों तक झेला और सरकार ने उसमें कोई रुकावट भी नहीं डाली।

लेकिन उस विरोध की आड़ में जब कुछ राजनीतिक दलों के कुछ व्यक्तियों ने हिंसा भड़काने का काम किया तो ऐसे में नागरिकों की जानो-माल की सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु, हिंसा में लिप्त लोगों के खिलाफ सरकार द्वारा उठाए गए विधिसम्मत कदमों के कारण उसे चुनावी निरंकुश घोषित कर दिया जाए, इसे किसी भी स्थिति में औचित्यपूर्ण नहीं कहा जा सकता। यहां फ्रांस का उदाहरण उल्लेखनीय है, जब संप्रदाय विशेष के एक व्यक्ति द्वारा मजहबी उन्माद के कारण एक नागरिक का कत्ल कर दिया गया, तो फ्रांस सरकार ने उस मजहब विशेष के खिलाफ कई प्रतिबंध लगा दिए। लेकिन आश्चर्य का विषय यह है कि स्वीडन की इस एजेंसी ने फ्रांस के उस मामले का जिक्र तक नहीं किया।

यदि नजदीक से देखा जाए तो कुछ पत्रकारों और अन्य व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई जरूर हुई है। लेकिन यह कानूनी कार्रवाई बिना कारण से नहीं हुई। एक पत्रकार (जिसे अपनी नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा) के खिलाफ कार्रवाई इसलिए हुई क्योंकि उसने बिना कारण यह समाचार प्रसारित कर दिया कि किसान आंदोलन के समय एक किसान की पुलिस की गोली के कारण मृत्यु हो गई। इसके कारण हिंसा भड़क सकती थी। जबकि सत्य यह था कि वह किसान खुद अपनी गलती से दुर्घटनावश मारा गया था। इसी प्रकार कुछ तथाकथित ‘सामाजिक कार्यकर्ताओं’ के खिलाफ कानूनी कार्यवाही इसलिए हुई क्योंकि वे या तो स्वयं हिंसा में लिप्त थे या हिंसक गतिविधियों को बढ़ावा दे रहे थे।

आपत्तिजनक कार्यों में लिप्त एनजीओ से प्रभावित रपटें
अपने देश में लाखों की संख्या में गैर सरकारी संस्थाएं कार्यरत हैं। उनमें से अनेक गृह मंत्रालय की अनुमति के साथ विदेशी फंडिंग प्राप्त करती हैं। सरकारी या गैर सरकारी संस्थाएं देश में विकास एवं गरीब-वंचितों के उत्थान हेतु विदेशी सहायता प्राप्त करती रही हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से यह महसूस किया जाता रहा है कि कुछ गैर- सरकारी संस्थाएं विदेशी फंडिंग प्राप्त कर विदेशी ताकतों का एजेंडा आगे बढ़ा रही हैं।

कई स्थानों पर ये विकास परियोजनाएँ रोकने, धर्मांतरण करवाने, देश विरोधी आंदोलनों को हवा देने समेत कई आपत्तिजनक कार्यों में संलग्न हैं। ऐसी संस्थाओं की विदेशी फंडिंग की जांच-पड़ताल करने के बाद लगभग 15,000 एनजीओ की विदेशी फंडिंग के लाइसेंस पर रोक लगाई गई है। कई विदेशी एजेंसियां जो वैश्विक स्तर पर झूठ फैलाने का काम करती हैं, वे भी स्वीडन के वी-डैम इंस्टीट्यूट और अमेरिका की फ्रीडम हाउस जैसी संस्थाओं की रपटों को प्रभावित कर रही हैं।

किसी भी देश में कानून और व्यवस्था बनाए रखना सरकार का दायित्व होता है। उस कानून व्यवस्था में बाधक किसी भी व्यक्ति के खिलाफ विधिसम्मत कार्रवाई करना सरकार का कर्तव्य होता है। लेकिन पिछले कुछ समय से कुछ अराजक तत्व अनावश्यक रूप से देश की जनता को गुमराह ही नहीं कर रहे बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा एवं कानून व्यवस्था के लिए बाधा बन रहे हैं। यही नहीं, आम जनता को भी उसके कारण असुविधाओं का सामना करना पड़ रहा है। विरोध और आंदोलन, ये दोनों लोकतांत्रिक व्यवस्था का अभिन्न अंग हैं। लेकिन ये दोनों कानून के दायरे में बिना लोगों को असुविधा दिए, कानून व्यवस्था और शांति बनाए रखते हुए होने चाहिए। किसी भी सभ्य समाज में सामाजिक ताने-बाने को भंग करने,  पंथ-मत-मजहब और जाति के आधार पर हिंसा करने, हिंसा को बढ़ावा देने को किसी भी स्थिति में सही नहीं ठहराया जा सकता। ऐसे में बिना इस बात की तह में जाए कुछ लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई को यह कहकर अलोकतांत्रिक नहीं ठहराया जा सकता कि वे पत्रकार हैं या राजनीतिक कार्यकर्ता हैं।

दिल्ली हिंसा के दौरान कुछ राजनीतिक दलों द्वारा पहले एक राजनीतिक दल के जनप्रतिनिधि के विरूद्ध कार्रवाई किए जाने के खिलाफ राजनीतिक माहौल बनाने का प्रयास किया गया। सरकार द्वारा ऐसे हिंसक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं है बल्कि मजहब आधारित हिंसा किए जाने के आरोप सिद्ध हो जाने के बाद भी उस राजनीतिक दल की चुप्पी वास्तव में लोकतंत्र के लिए खतरा है। ऐसे अनेक उदाहरण पिछले कालखंड में मिलते हैं।

अच्छा हो राजनीतिक दल मुद्दों के आधार पर राजनीति करें, किसी वर्ग के तुष्टिकरण की राजनीति देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा उत्पन्न करती है। राजनीतिक दल सरकार की नीतियों का समुचित रूप से विश्लेषण करें, नए कानूनों के प्रभावों पर राष्ट्रीय बहस हो, लोक कल्याण हेतु नीतियां बनें और अच्छी नीतियों के लिए सरकार का समर्थन हो और गलत नीतियों की आलोचना भी हो, तभी अपना लोकतंत्र और पुष्ट हो सकता है।

लोकतंत्र के नाम पर हिंसा और कानून व्यवस्था पर चोट की अनुमति नहीं दी जा सकती। हमें यह समझना होगा कि हमारे देश में पिछले 70 साल से ज्यादा समय में (आपातकाल के 19 महीने छोड़) लगातार निर्विघ्न शांतिपूर्ण तरीके से चुनाव होते रहे और सरकारें बनती-बिगड़ती रहीं। कभी भी सेना का शासन नहीं आया। ऐसे में स्वीडन की उस एजेंसी की समझ पर सवालिया निशान लगता है कि भारत जैसे देश, जहां हर छह माह में कोई न कोई बड़ा चुनाव होता है और शांतिपूर्ण तरीके से सत्ता हस्तांतरण होता है, ऐसे देश की पाकिस्तान जैसे देश के साथ तुलना को मूर्खता के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता।