जय श्रीराम! उद्घोष से क्यों उखड़ती हैं दीदी

    दिनांक 08-अप्रैल-2021
Total Views |
देबजानी भट्टाचार्य


बंगाल सरकार पर कठमुल्लों का नियंत्रण है। कट्टरपंथी मुसलमान हिंदुओं के धर्म-संस्कृति से नफरत करते हैं। अपने वोटबैंक को खुश करने के लिए ममता वही करती हैं, जैसा वे चाहते हैं
p24_1  H x W: 0
ममता बनर्जी की राजनीति ही मुस्लिम तुष्टिकरण पर टिकी है

सकारात्मक राजनीति भूल चुकी पश्चिम बंगाल की राजनीति अलग-अलग नारों के साथ फिर से नकारात्मक रूप से आवेशित है। ‘जय श्रीराम’ के नारे से अतिसंवेदनशील हो उठने वाली राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके समर्थक ‘जय बांग्ला’ के नारे लगा रहे हैं, जबकि यह बांग्लादेश का राष्ट्रीय नारा है। ममता ने गत 23 जनवरी को कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल में आयोजित नेताजी सुभाषचंद्र बोस जयंती समारोह में भी बांग्लादेश की सराहना की थी। यद्यपि यह सच है कि नेताजी ने अविभाजित भारत के लिए संघर्ष किया था और नेताजी का बंगाल अविभाजित बंगाल था, किंतु बांग्लादेश ने नेताजी को अपने राष्ट्रीय नायकों की श्रेणी में नहीं रखा है। दूसरी तरफ, ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल को शेष भारतवर्ष की तुलना में बांग्लादेश से ज्यादा जोड़ने की अपनी इच्छाशक्ति को हर संभव तरीके से संप्रेषित करने की कोशिश करती रहती हैं।

श्रीराम से चिढ़
जिस समाचार ने राष्ट्रव्यापी सनसनी पैदा की, वह थी बंगाल की मुख्यमंत्री द्वारा विक्टोरिया मेमोरियल में नेताजी जयंती समारोह पर भाषण देने से मना करना। हालांकि कुछ लोगों ने उनके इस व्यवहार को अमर जननायक का अपमान माना, लेकिन ममता ने यह तर्क दिया कि समारोह में भाग लेने से पहले ही उन्होंने राज्य सरकार की ओर से नेताजी बोस को श्रद्धांजलि अर्पित कर दी थी। साथ ही, उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि एक सरकारी कार्यक्रम में पार्टी विशेष का राजनीतिक नारा लगाए जाने से वह व्यथित हैं। विक्टोरिया मेमोरियल में लगाए गए तीन अलग-अलग नारों में से केवल ‘जय श्रीराम’ का उद्घोष ही था, जिसे ‘भाजपा का नारा’ कहा जा सकता था। अन्य दो नारे ‘भारत माता की जय’ और ‘जय हिंद’ थे।

ममता बनर्जी को राम नाम से इतनी चिढ़ क्यों होती है, यह सवाल बहुतायत लोगों को परेशान करता है। भारत में रहने वाले विभिन्न पंथ-संप्रदाय के लोग ‘जय श्रीराम’ का उद्घोष करते रहे हैं। यह अलग मुद्दा है कि कुछ लोग पता नहीं क्यों इसे भाजपा का ‘राजनीतिक नारा’ मानते हैं। प्रभु श्रीराम भारत में केवल धर्म के ही प्रतीक नहीं हैं, वे प्रत्येक भारतीय की सामाजिक-राजनीतिक पहचान के प्रतीक भी हैं। राम और भारतवर्ष अविभाज्य रूप से जुड़े हुए हैं। फिर ‘जय श्रीराम’ का उद्घोष ममता बनर्जी को इतना क्यों परेशान करता है? हम इसके संभावित वास्तविक कारण तक पहुंचने का प्रयास करेंगे।

‘राम’ नाम की गलत व्याख्या

पश्चिम बंगाल में श्रीराम को महत्वहीन बनाने के प्रयास दशकों से लगातार चल रहे हैं। यह चलन कम्युनिस्टों के दौर में शुरू हुआ था, जो ममता बनर्जी के शासनकाल में पहले से अधिक मजबूती से जारी है। पिछले दस वर्षों से राज्य के सरकारी स्कूलों की छठी कक्षा की पाठ्यपुस्तक में रघुवीर श्री रामचंद्र को एक खानाबदोश चरित्र के रूप में दिखाया गया है। इस पुस्तक में ‘राम’ शब्द का संस्कृत में अर्थ ‘घूमना’ बताते हुए इसे अंग्रेजी शब्द ‘रोमिंग’ से विकसित हुआ बताया गया है, क्योंकि दोनों शब्दों का अर्थ एक ही है-निरुद्देश्य भटकना।

इस प्रकार, पुस्तक में चालाकी से एक नैरेटिव स्थापित करने की कोशिश की गई है श्रीराम घुमंतू खानाबदोश थे, जिन्होंने हमारे देश में घुस कर धीरे-धीरे इस भूमि के मूल निवासियों को हरा दिया। ‘ओतीत ओ ओइतिह्यो’ (अतीत और विरासत) शीर्षक वाली छठी कक्षा की इतिहास की पाठ्यपुस्तक ‘वाल्मीकि रामायण’ के किसी भी संदर्भ का विद्वतापूर्ण उल्लेख किए बिना श्रीराम को खलनायक के रूप में पेश करती है। लेकिन बंगाल में श्रीराम के प्रति ऐसा नकारात्मक भाव कहां से आया? इसका उत्तर राज्य के इतिहास में ही निहित है।

षड्यंत्र की जड़ इतिहास में
पश्चिम बंगाल के निर्माण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य 1947 में भारत विभाजन के दौरान अविभाजित बंगाल को पूर्वी पाकिस्तान में शामिल करने की मुस्लिम लीग की मूल योजना में न्यस्त है। अविभाजित बंगाल के बारे में रोचक तथ्य यह है कि 1941 की जनगणना के दौरान यहां हिंदू 41.20 प्रतिशत व मुसलमान 55.65 प्रतिशत थे, जो 1951 में क्रमश: 42.38 प्रतिशत व 56.48 प्रतिशत हो गए।

डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी तथा बंगाल की अन्य प्रतिष्ठित हस्तियों के सतत प्रयास से इस प्रांत को हिंदू राज्य के रूप में भारत में शामिल किया गया, क्योंकि बंगाली हिंदुओं के लिए इस्लामी देश में एक कबीले के रूप में अपना अस्तित्व और अपनी संस्कृति को बचाए रखना संभव नहीं था। अविभाजित बंगाल का एक हिस्सा हाथ से निकल जाने से मुस्लिम लीग राजनीतिक रूप से बहुत क्रुद्ध थी। कोलकाता पर कब्जा करना उसका मुख्य लक्ष्य था। मोहम्मद अली जिन्ना तत्कालीन ब्रिटिश साम्राज्य के दूसरे सबसे समृद्ध शहर को पाकिस्तान में शामिल करना चाहते थे। इसके अलावा, जवाहरलाल नेहरू को भी पूरा बंगाल पाकिस्तान को सौंपने में कोई आपत्ति नहीं थी।

अंग्रेज भी ऐसा ही चाहते थे। (नेहरू और अंग्रेज दोनों ऐसा क्यों चाहते थे ये दो अलग-अलग मुद्दे हैं।) चूंकि पश्चिम बंगाल का सृजन हिंदू बंगालियों के लिए हिंदू मातृभूमि के रूप में हुआ था, लेकिन मुस्लिम लीग की कुदृष्टि इस राज्य पर हमेशा बनी रही। 1947 में अविभाजित बंगाल को इस्लामी राष्ट्र में मिलाने की लड़ाई हार जाने के बाद भी यह चेष्टा जारी रही और वे किसी भी समय येन-केन-प्रकारेण राज्य पर कब्जा करने का सपना देखते रहे।

मुस्लिम लीग के उत्तराधिकारियों ने पश्चिम बंगाल के राज्य विधानमंडल के साथ घातक समझौता किया। चूंकि 1960 के दशक की शुरुआत से ही यहां कम्युनिस्टों का प्रभाव रहा, इसलिए यह समझौता आसानी से हो गया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भारत की स्वतंत्रता की पूर्व शर्त के रूप में इस्लामी पाकिस्तान के निर्माण के पक्ष में मुखर तर्क देने वालों में शामिल थी। ऐसे में भारतीय कम्युनिस्टों का मुस्लिम लीग के हितों का पोषक होना कोई काल्पनिक बात नहीं है। 2216.7 किलोमीटर लंबी पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश सीमा पार कर मुसलमान इस राज्य में घुसपैठ करते रहे। इस दौरान कम्युनिस्टों ने अपनी आंखें बंद रखीं। उन्होंने परोक्ष रूप से बंगाली हिंदुओं की मातृभूमि के जनसांख्यिकीय परिवर्तन का मौन समर्थन किया। भारत-बांग्लादेश सीमा से मुसलमानों की घुसपैठ वास्तव में पश्चिम बंगाल पर कब्जा करने की मुस्लिम लीग के उत्तराधिकारियों की छापामार योजना का ही एक हिस्सा थी। वही कट्टरपंथी श्रीराम के विरुद्ध विषवमन करते हैं, क्योंकि वे भारत की एकरूपवादी संस्कृति के विरोधी हैं।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम को भारतीय पुरुष के वैचारिक प्रतीक के रूप में पूजा जाता है। उनका चरित्र सक्षम, सशक्त, साहसिक, रणनीतिक, समावेशी, अनुशासित व सामाजिक रूप से जिम्मेदार है। वे सामाजिक हित के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे। यह श्रीराम ही हैं, जिन्होंने गलतियां की, लेकिन उन आरोपों को कभी नकारा नहीं। वे हिंदू समाज के पौरुष का आधार हैं। ‘हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे, हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे’ बंगाल के आम आदमी का मंत्र है। इनमें से बहुतों को राम मंत्र अपने दीक्षा मंत्र के रूप में भी मिला है। ऐसे प्रतीक पुरुष के रहते आम बंगाली समाज की वैचारिक रूपावली का इस्लाम की ओर प्रवृत्त होना असंभव होगा। इसलिए पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों व उनकी उत्तराधिकारी ममता बनर्जी, दोनों ने श्रीराम के प्रति पूरी तरह उदासीनता दिखाई। श्रीराम उनके प्रिय इस्लामीकरण एजेंडे के लिए एक वैचारिक बाधा के रूप में खड़े दिखाई देते हैं।

बंगाली परंपरा को हतोत्साहित किया
भगवान राम न केवल आध्यात्मिक शक्ति, बल्कि असीम शारीरिक शक्ति, वीरता व नायकत्व का प्रतीक भी हैं। यदि सामान्य लोग इन गुणों को धारण करने की कोशिश करेंगे तो यह कट्टरपंथी इस्लामवादियों के लिए ठीक नहीं होगा। शारीरिक रूप से मजबूत लोगों को आसानी से न तो वश में किया जा सकता है, न उनसे अपनी बात मनवाई जा सकती है और न ही उनके खिलाफ इस्लामिक शैली का नरसंहार आसान होगा। इसीलिए फरवरी 2018 में पश्चिम बंगाल के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी ने कहा कि स्कूलों में शारीरिक शिक्षा के रूप में ‘लाठी खेला’ की अनुमति नहीं दी जाएगी। ‘लाठी खेला’ को उन्होंने ‘धार्मिक कट्टरता’ करार दिया। कम्युनिस्टों ने भी कुश्ती, ‘लाठी खेला’ और शारीरिक योग्यता की बंगाली परंपरा को हतोत्साहित किया। क्यों? शायद आम बंगाली पुरुषों को इरादतन कमजोर और डरपोक बनाने के लिए। यही परम्पराएं ममता बनर्जी के शासनकाल में भी दोहराई जाती रहीं।

अभी भी मुस्लिम लीग के कट्टरपंथी उत्तराधिकारी राज्य पर कब्जा करने के लिए तैयार बैठे हैं। कम्युनिस्टों ने राज्य में कट्टरपंथी मुसलमानों के प्रवेश का मार्ग प्रशस्त किया था तो ममता बनर्जी ने इन लोगों को सीधे तौर पर खुश करने का खतरनाक रास्ता अपनाया, जिससे उन्हें चुनाव जीतने में मदद मिली। राज्य में अवैध तरीके से इन्हें लाकर बसाया गया, जो आज ममता बनर्जी के वोटबैंक बने हुए हैं। इसके बदले वे अविभाजित बंगाल को हथियाने की अपनी मूल योजना आगे बढ़ाने के लिए पश्चिम बंगाल का क्रमिक सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक इस्लामीकरण करना चाहते हैं। पिछले छह दशकों से कम्युनिस्टों की राजनीति-प्रेरित सार-संभाल के प्रभाव में बंगाली भद्रलोक हिंदू के रूप में अपनी मूल धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान के खिलाफ सम्मोहित रहा है।

नतीजतन, वे या तो इतने बौने हो गए कि राज्य में कट्टरपंथी इस्लाम के आसन्न खतरे को पहचानने में विफल हो गए या चांदी के जूतों के बदले इसकी अनदेखी करते रहे। कम्युनिस्टों ने इस्लामी लॉबी का बहुत महीन तरीके से तुष्टिकरण किया और अपने लिए उपजाऊ जमीन तैयार की, जबकि ममता बनर्जी तुष्टिकरण करने में धृष्टतापूर्ण तरीके से आक्रामक रहीं। इनके शासनकाल में बंगाली भाषा में मनमाने तरीके से अरबी और उर्दू शब्दावली ठूंसे जाने से बंगाली भाषा का सौंदर्य नष्ट हुआ है।

राज्य सरकार ने आधिकारिक तौर पर बांग्ला भाषा का ध्वन्यात्मक, आध्यात्मिक और गुणात्मक विरुपण स्वीकार करते हुए स्कूली पाठ्यक्रम में भाषा के विकृत प्रारूप को शामिल किया। वास्तव में, इस्लामवादियों और ममता बनर्जी के बीच एक सहजीवी संबंध है। यहां अक्तूबर 2018 की उस घटना की याद दिलाना अप्रासंगिक नहीं होगा, जिसमें पश्चिम बंगाल के इमाम एसोसिएशन ने कोलकाता में एक मुस्लिम पुलिस आयुक्त तैनात करने और इमामों के भत्ते में 100 प्रतिशत बढ़ोतरी की मांग की थी। कोविड-19 महामारी के दौरान इमामों ने सुझाव दिया था कि ईद-उल-फितर के दौरान लॉकडाउन जारी रह सकता है, लेकिन महामारी के बावजूद बकरीद मनाने पर कोई रोकटोक न हो। ऐसी हर मांग के लिए इन तत्वों ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर उन्हें अपने विचारों से प्रभावित करने का प्रयास किया।

इस तरह से बनर्जी के कार्यकाल में पश्चिम बंगाल व्यावहारिक रूप से इस्लामी कठमुल्लों के नियंत्रण वाले राज्य में बदल गया। इमामों ने ऐसी हिम्मत की, क्योंकि उन्होंने बनर्जी की जीत के लिए वोटबैंक खड़ा किया था। इसीलिए इस संरक्षक लॉबी के प्रति निष्ठा दिखाने के क्रम में ममता बनर्जी को ‘जय श्रीराम’ के प्रति चिढ़ का प्रदर्शित करने के लिए बाध्य होना पड़ता है।     (लेखिका कोलकाता निवासी स्तंभकार हैं)